रविवार, 17 जनवरी 2021

पहाड़ और विकास

उस शहर के पश्चिमी छोर पर 
 
एक पहाड़ को काटकर 

रेल पटरी निकाली गई 

नाम नैरो-गेज़ 

धुआँ छोड़ती 

छुकछुक करती 

रूकती-चलती छोटी रेल 

सस्ते में सफ़र कराती 

अविकसित इलाक़ों में जाती 

तीस साल उपरांत 

पुनः जाना हुआ 

न पटरी थी न पहाड़ के अर्द्धांश

न हरियाली न कलरव के अंश

न सँकरी पथरीली पगडंडी 

न चौकीदार की लाल-हरी झंडी   

विकास की तेज़ रफ़्तार 

एक पहाड़ लील गई 

पर्यावरणीय मुग्ध आशा 

मन में ही सील गई 

पहाड़ नीस्त-ओ-नाबूद करने से निकले 

पेड़,खंडे,बोल्डर,गिट्टी,मुरम,मिट्टी,चूरा

ज्यों शाश्वत से नश्वर हो गए हैं 

वे अब समायोजित हो गए हैं   

गलियों,सड़कों,रेल पटरियों,पुलों 
 
ख़ामोश आली-शान इमारतों में 

अपरिमित इंसानी भूख को करते-करते पूरा

उस पहाड़ ने लालची इंसान से

कुछ भी तो नहीं माँगा था 

वह तो अपनी युगों से बसाई बस्ती में भला-चंगा था  

उस दिन से अस्तित्त्वविहीन हुए पहाड़ की 

सिसकियाँ रोज़-रोज़ सुन रहा हूँ... 

प्राकृतिक असंतुलन की ज़ोरदार धमक 

रोज़-रोज़ सुनता ही जा रहा हूँ!

© रवीन्द्र सिंह यादव



शब्दार्थ / WORD MEANINGS 

1. नीस्त-ओ-नाबूद = नष्ट होना, समाप्त होना / DESTRUCTION 

2. अर्द्धांश = आधा अंश, आधा भाग / HALF  PART    

3. आली-शान = शानदार, भव्य / GLORIOUS   

4. शाश्वत = सदैव रहनेवाला, नष्ट न होनेवाला / PERPETUAL 

5. नश्वर = नष्ट होनेवाला, क्षणिक, मिटने योग्य / MORTAL  


6 टिप्‍पणियां:

  1. पहाड़ के रूप में प्रकृति की पीड़ा को बहुत सटीक एवं मार्मिक ढंग से आपने प्रस्तुत किया है... बहुत सुंदर रचना 🌹🙏🌹

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  2. आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" मंगलवार 19 जनवरी 2021 को साझा की गयी है.... पाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

    जवाब देंहटाएं
  3. सुन्दर सृजन - - प्रकृति के दर्द को उजागर करती रचना, बहुत कुछ सोचने को मजबूर करती है।

    जवाब देंहटाएं
  4. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल रविवार (24-01-2021) को   "सीधी करता मार जो, वो होता है वीर"  (चर्चा अंक-3949)    पर भी होगी। 
    -- 
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है। 
    --
    नेता जी सुभाष चन्द्र बोस के जन्म दिन की
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ-    
    --
    सादर...! 
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' 
    --

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  5. सुंदर प्रस्तुति

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  6. बेहतरीन रचना आदरणीय

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