सोमवार, 24 अगस्त 2020

किताब-ए-वक़्त

किताब-ए-वक़्त में

क्या-क्या

और लिखा जाने वाला है

किसी को ख़बर नहीं

कुछ नक़्शे बदल जाएँगे

अगर बचे

झुलसने से

चिड़ियों के घोंसले

रहेंगे वहीं के वहीं

ढोएगी मानवता

महत्त्वाकाँक्षी मस्तिष्कों की

कुंठित अराजकता

मनुष्य का

भौतिकता में

जकड़ा जाना

वक़्त का सच है

बुज़ुर्गों की उपेक्षा

मासूमों पर

क्रूरतम अत्याचार

संस्कारविहीन स्वेच्छाचारिता

समाज का सच है।

 ©रवीन्द्र सिंह यादव

शनिवार, 15 अगस्त 2020

स्वतंत्रता


चिड़िया को 

जब देखता हूँ 

तब स्वतंत्रता का 

अनायास 

स्मरण हो आता है

जब चाहे 

उड़ सकती है 

जहाँ चाहे जा सकती है

जब चाहे धूल में 

नृत्य कर सकती है 

अथवा पानी में 

नहा सकती है 

मनचाहा गीत 

गा सकती 

मुक्ताकाश में 

विचरण कर सकती है 

फिर सोचता हूँ 

वह भी कहाँ स्वतंत्र है

उत्तरदायित्वों के बंधन 

उस पर लदे हुए हैं 

उससे शक्तिशाली 

उसकी स्वतंत्रता 

हनन करने पर

अड़े हुए हैं

घोंसले में 

लौटने की 

पाबंदी है 

सोचिए 

वह स्वतंत्र है 

या बंदी है?

घोंसला बनाने

अंडे सेने

चुग्गा लाने की 

दौड़ जीतना 

चूजों को 

सक्षम बनाने

दुनिया की ऊँच-नीच से

सतर्क करना

अपनी संतति में 

जीवन के प्रति 

अनुराग भरना

अस्तित्त्व बनाए रखने के लिए 

पर्यावरण अनुकूल बनना 

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की 

परिभाषा गढ़ना

कलरव के लिए 

बस सुबह की वेला चुनना 

आत्मकेन्द्रित बंधनों में 

जकड़े रहना

फिर कैसे कहे चिड़िया 

कि वह स्व के तंत्र में 

स्वतंत्र है या परतंत्र?

समाज या सरकार को

जो रास आए

बस वही लिखना और बोलना 

अभी बाक़ी है 

स्वाधीनता को सच्चे अर्थों में तोलना

क्रांति का गीत 

दिमाग़ों में घुमड़ रहा है

कभी गूँजेगा पुरज़ोर 

आज़ादी की फ़ज़ा में

बिखरेगी ख़ुशबू 

उन फूलों से 

खिल सकेंगे जो 

वक़्त की रज़ा में!

© रवीन्द्र सिंह यादव      

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