बुधवार, 20 मई 2020

ये अदाएँ हैं / लघुकथा


             एक शायरा जो हसीन थी, ज़हीन थी; टीवी पर ग़ज़ल कह

रही थी। अपनी चमकीली काली ज़ुल्फ़ों को उसने क़रीने से वाम-

पक्ष में आगे फैलाया था। घनी केश-राशि बाईं आँख का कुछ

हिस्सा बार-बार ढक रही थी। कभी दाएँ, कभी बाएँ हाथ से लटों

को कान तक खिसकाती-धकयाती थी एक मिनट में पाँच-छह बार।

           
अगस्त 2004 के इतवार की वह उमसभरी शाम असह हो

 रही थी। कूलर की हवा भी बदन में चुभ रही थी। बाहर घिरी काली

 घटाएँ बरसने के लिए उमड़ रहीं थीं। वातावरण ख़ुशनुमा होने की

आशाएँ अपने सफ़र पर थीं।   

         
मुनिया अपनी तीसरी कक्षा की नई किताबें अख़बार के साथ

कवर चढ़ाने के लिए देने आई। मेरे पीछे चुपचाप खड़ी रहकर टीवी

देखती रही। एक मिनट बाद बोली

"
बाल बाँधतीं क्यों नहीं ये मैडम?

मुझे एक शरारत सूझ रही है

टीवी में घुसकर इनके बाल बाँध दूँ!"

सहसा मेरा ध्यान उसकी बातों पर गया

मैंने उसे समझाते हुए कहा-

"
ये अदाएँ हैं। 

शब्दों पर ध्यान दो।"

©रवीन्द्र सिंह यादव
  

मंगलवार, 19 मई 2020

प्रवासी श्रमजीवी


घर-गांव से 

हज़ारों किलोमीटर दूर

अपनों से बहुत दूर 

तुम चले जाते हो 

फूस-माटी की झोंपड़ी छोड़कर

माँ-बाप,भाई-बहन,भार्या,बच्चों को छोड़कर  
  
जीविका की तलाश में

मीडिया ने नाम दिया है 

प्रवासी मज़दूर तुम्हें हुलास में  

क्रूर करोना को ज्ञात नहीं

हालात के तूफ़ान से 

सतत लड़ने की 

तुम्हारी जद्दोजेहद की ज़िद

तुम लिख रहे हो क्रान्ति-गीत

 जीवन संघर्ष की पावन प्रीत 

लहूलुहान होकर सड़कों पर 

ऐसा कहने लगे हैं वादविद  

देख रहा है भारत 

आज तुम्हारी अंत्येष्टि की दुर्दशा 

सड़ी-गली तुम्हारी लाश की वीभत्स दशा 

अंतिम संस्कार की बदलती मनोदशा

सामाजिक विसंगतियों की दशा-दिशा 

तुम्हारे ख़ून के धब्बों से 

धुँधली हो गई है कहकशाँ!

ये निरपराध थे / हैं  

मैं लिख रहा हूँ सुनो आसमाँ! 

©रवीन्द्र सिंह यादव

रविवार, 17 मई 2020

आपने देखा सड़कों पर तड़पता बिलखता आत्मनिर्भर भारत?



पत्थर हुआ जाता है

रोटी का कड़क कौर

जल के प्यासे होने का

आया है भयावह दौर

आत्मा को तलाश है 

मिले कहीं सुकून का ठौर

जहाँ स्वार्थ का हिसाब न बना हो सिरमौर  

एक अंतरध्वनि अब सोने नहीं देती

सड़कों पर तड़पते, बिलखते  

आत्मनिर्भर(?) भारत की तस्वीर...

श्रमजीवी लहू से लहूलुहान 

रेल पटरियाँ-सड़कें...

यह तो नहीं थी ख़्वाब की ताबीर...  

कचोटती है बस रोने नहीं देती 

कोविड-19 महामारी ने सिद्ध किया है कि 

समाज कितना आत्मकेन्द्रित हुआ है 

कितना संवेदनशील हुआ है 

कितना संवेदनाविहीन हुआ है 

जनहित के लिए बना शासन-प्रशासन 

कितना बेपरवाह,मूर्ख,निर्लज्ज और दुष्ट हुआ है

विज्ञान सहायक हुआ भी है 

तो बस समाज के 

अल्पसंख्यक कोने के लिए 

न बनाता हवाई जहाज़ / जलपोत 

तो करोना वायरस कैसे निकलता चीन से

खोजने होंगे अर्थ 

भविष्य के लिए कुछ समीचीन से 

इस बदलते दौर में 

महाशक्तियाँ किंकर्तव्यविमूढ़ हुईं 

क़ुदरत से राहत माँग रहीं हैं

अपनी विवशता की सीमाएँ लाँघ रहीं हैं 

जिन्हें अहंकार था सर्वेसर्वा होने का 

वे एक वायरस की चुनौती के समक्ष 

मजबूरन नत-मस्तक हुए हैं

दंभी,मक्कार, झूठे-फ़रेबी 

आज हमारे समक्ष बस मुए-से हैं।

©रवीन्द्र सिंह यादव


शब्दार्थ

सिरमौर = सिर + मौर अर्थात सर (शुद्ध रूप) का मौर (मौहर शुद्ध  रूप), सर का ताज, मुकुट /                                  CROWN  

रविवार, 10 मई 2020

ईश्वर का साक्षात रूप है माँ

माँ तो केवल माँ होती

ईश्वर का साक्षात रूप है माँ

जो हर हाल में साथ होती है

माँ की मुस्कुराहट क्या होती है

देखा एक चैनल पर

महानगर से गांव की ओर

पैदल जाती एक्सप्रेस-वे पर

दोनों कंधों पर लादे बच्चे

हाथों में बचा-खुचा सामान

थकान से चूर पैरों में छाले

फिर भी कैमरे के समक्ष

ऐसी मुस्कुराहट

जो माँ होने का गर्वीला एहसास

हमारे दिलों में उतार देती है

यह क्लिप लॉकडाउन की बिडंबना का

अविस्मरणीय चित्र उतार देती है

माँ है विशाल वट-वृक्ष की

छाई छतनारी छांव

रचती रहती है

स्पंदन-अनुभूति का

नया-नबेला गुणात्मक गांव

माँ की गोद में समाया है लोक

संतति के जीवन में बिखेरती है आलोक

माँ थमा देती है तूलिका

ख़ुद बन जाती है कैनवास

उम्रभर गूँजती रहती है

माँ की झिड़की-प्रशंसाभरी बोली

एक सुखद एहसास

अब बहुत याद आता है

माँ की लोरी का वह स्वर

जब नींद आने तक

सुनाती थी रात के पहर

मेरे साथ एक दिन

वह स्वर भी लुप्त हो जाएगा

जो बस मेरे मस्तिष्क में रिकॉर्ड है!

  © रवीन्द्र सिंह यादव       

शनिवार, 9 मई 2020

शर्म से लाल हुए गुलमोहर की छांव


जीवन के भयावह झंझावात से 

गुज़र रहे हैं हम 

उजाले धुँधले हुए जाते हैं 

छा रहा अनचीता तम ही तम

उन्हें देखो 

जो भयमुक्त होकर डट गए हैं 

सुरीला संगीत 

फूलोंभरा बिस्तर 

रिश्तों की डोर 

किताबोंभरी अलमारी

मुस्कुराती बांसुरी

शर्म से लाल हुए गुलमोहर की छांव    

परे रख 

आत्मप्रचार से परे 

करोना वायरस से लड़ने 

इस ज़मीं को बेहतर बनाने

अकेले कंधे पर हाथ रखने  

वक़्त की सलवटें मिटाने

जुट गए हैं 

दर्द की बूँदें बरसने के बाद 

इंद्रधनुषी आभा की आस में

जीवन के प्रति अनुराग के बीज  

बस्ती-बस्ती के प्रभामंडल में बोने।

© रवीन्द्र सिंह यादव  


शब्दार्थ     

झंझावात = आँधी, तूफ़ान, प्रचंड वेग से बहती वायु 

अनचीता = सहसा घटित होने वाला,अनचाहा  

गुरुवार, 7 मई 2020

संदेह और विश्वास की गलियों में

बहुत बिछाते हो 

जाल और फंदे 

कैसे हो 

उजड्ड-विवेकवान बंदे?

गिलहरी को 

अब नहीं रहा 

पार्क में 

तुम्हारी मूँगफलियों का इंतज़ार 

वह तो गूलर कुतर रही है

ईर्ष्या, छलावा, हड़बड़ाहट 

बुद्धि में उन्माद की मिलावट 

तुम्हारा ही लिबास कुतर रही है

करोना-काल की कल्पनातीत आँखमिचौनी

संदेह और विश्वास की गलियों में 

प्रतिकूलता से जूझते हुए 

अनगढ़, अनघ, अनन्यचेता की तलाश में 

शहतीर के ढेर-सी

जमावट मुर्दों की

हाहाकार के महासागर में 

नख-शिख डुबोती भौतिकता 

मार्ग की बाधा है क्या?
  
© रवीन्द्र सिंह यादव 

शब्दार्थ 

अनगढ़= जो प्राकृतिक रूप में हो जिसे तराशा, छीला, गढ़ा न गया हो,बे-डौल, अक्खड़  

अनघ = पवित्र, निरापद,निरपराध 


अनन्यचेता = जिसका चित एक में ही लगा हो      

बुधवार, 6 मई 2020

चित्रकार

रंग 

तूलिका 

कैनवास 

उँगलियाँ 

कोई कलाकृति उकेरने में अक्षम हैं 

चित्रकार का चित्त-चितवन 

सचाई तलाशने 

आदर्श-लोक के सफ़र पर हैं 

जहाँ बदलाव और विद्रोह की तड़प

ज़ख़्मी होकर सो गई है। 

© रवीन्द्र सिंह यादव      
  

मंगलवार, 5 मई 2020

काला टीका,माँ और संयोग

            प्रभात अच्छे अंकों से पाँचवीं कक्षा में उत्तीर्ण हुआ। माँ अँग्रेज़ी माध्यम के निजी विद्यालय में आगे की पढ़ाई पर ज़ोर डालते हुए बोली-
"अब मेरा बिटवा और अधिक मन लगाकर पढ़ेगा। पढ़-लिखकर गुरूजी बनेगा।"
"लेकिन अँग्रेज़ी माध्यम के विद्यालय का शुल्क वहन करने की हमारी क्षमता नहीं है। अभी तो नगर पालिका के पुराने विद्यालय में ही पढ़ने दो, दीनानाथ जी मेरे मित्र हैं तो प्रवेश आसानी से मिल जाएगा और छात्रवृत्ति भी।"
कृष्णपाल ने कांता को समझाया। 

            प्रभात पीठ पर भारी बस्ता लादे हड़बड़ी में दौड़ जाता है। माँ द्वारे से पुकारती हुई रुकने को कहती हुई उसके पीछे-पीछे सरपट चली आती है। 
"यह काला टीका कुदृष्टि से बचाता है, कुछ  पल और रुक जाता तो क्या होता? आज बिना टीका लगवाए ही भाग पड़ा।" 
कांता ने पीठ पर हौले से धौल जमाते हुए संतोष के स्वर में कहा। 

          "जाओ वहाँ मुर्गा बन जाओ! तुम तो कभी देर से नहीं आते थे आज समय से तीन मिनट पीछे..."
अध्यापक जी ने झल्लाते हुए लगातार बरसात से गीले हुए मैदान की ओर इशारा किया। 

           मुर्गा बने हुए सात-आठ मिनट बीत गए। प्रभात की पिड़लिओं,ग्रीवा और रीढ़ की हड्डी में दर्द उभर आया। तभी सन्नाटे को तोड़ता तीव्र धमाका हुआ। प्रभात चौंककर खड़ा होकर देखता है, उसकी कक्षा के जर्जर कमरे की छत,दीवारें सब धड़ाम! माहौल चीख़-पुकार,चीत्कार से डरावना हो गया। सहायता के लिए वह भी मलवे की ओर दौड़ पड़ा। 

© रवीन्द्र सिंह यादव      

सोमवार, 4 मई 2020

कोविड-19-काल का कलेवर कैसा है?

क्या सोचते हो आज

विवेकहीनता से अभिशप्त

कोविड-19-काल का कलेवर कैसा है?

कुछ भयावह कल्पनाओं से इतर

मरुस्थल में फूल खिलने जैसा है!

वो जो चमन में बिखरीं हैं फ़ज़ाएँ

फूलों को स्पर्श करतीं हैं अल्हड़ हवाएँ 
  
तुम्हारे सिवाय 

सब रसरंग में आप्लावित हैं

अच्छा लगा जब तुमने

टहनी पर खिला 

मासूम प्रफुल्लित फूल

नहीं तोड़ा बेदर्दी से

बस वहीं से 

समर्पित कर दिया है

ईष्ट के चरणों में

इस रचनात्मकता से

प्रकृति, फूल, ईष्ट और मन

संतोष की ठंडी आह नहीं भरते

भविष्य की तस्वीर के विचार पर

ललाट पर बल नहीं उभरते 
  
वे परिवर्तनगामी समय की 

शाश्वत शक्ति का वैभव

स्वीकारने की

मानस-चित्रावली पर 

मंथन चरितार्थ कर रहे हैं

अब अपने अस्तित्त्व के सवाल से 

नहीं डर रहे हैं

इस ऊहापोह के घमासान के बीच

कान में एक अपरिचित ध्वनि 

हौले से फुसफुसाती है   

सघन वन में महकते मतवाले महुए की गंध

कब तोड़ती है नासिका से नैसर्गिक अनुबंध! 

©रवीन्द्र सिंह यादव

रविवार, 3 मई 2020

वह बिजली से चलनेवाली ट्रैन

ज्ञात नहीं 

अब कहाँ हो तुम

मैं आज भी हूँ 

उसी स्मृति में गुम 

जब तुम्हें सी ऑफ़ करने

तीन मई नवासी

इकत्तीस साल पूर्व    

रेलवे स्टेशन पर 

प्लेटफ़ॉर्म चार पर 

उस ट्रैन में बैठाया था 

जो ले गयी तुम्हें 

मुझसे बहुत दूर 

वह बिजली से चलनेवाली ट्रैन 

लगी थी बड़ी क्रूर 

बस तुम्हारी झुकीं पलकें 

जादुई मुस्कुराहट

मड़राती रहती है 

आज भी मेरे आसपास दिन-रैन

 ट्रैन की खिड़की से 

निहारता मासूम मुखड़ा ले   

तीव्र गति से ओझल हो गई थी 

तुम्हें मुझसे सुदूर ले जाती   

वह लाल रंग की ट्रैन!

जो आज भी सरसराती हुई 

चल रही है मेरे ज़ेहन में

यादों की ट्रैन दौड़ रही है

नॉस्टाल्जिआ की पटरियों पर

बेधड़क धड़धड़ाती हुई 

शुक्र है कि वह बुलेट ट्रैन नहीं थी।     

© रवीन्द्र सिंह यादव

शनिवार, 2 मई 2020

कमाल का भरोसा है उनका

आप जानते हैं 

समानांतर रेल-पटरियों (ब्रॉड गेज़) के बीच की दूरी 

कितनी तय है?

1676 मिलीमीटर 

एक मीटर सरसठ सेंटीमीटर छह मिलीमीटर 

पाँच फ़ुट छह इंच

मैं यह हिसाब 

आपको क्यों समझा रहा हूँ? 

क्योंकि भारत में 

पुरुष की औसत लंबाई भी 

लगभग यही है

अब यहाँ ख़ास / ध्यानाकर्षक बात यह है कि 

आज मैंने 

रेल-पटरियों के मध्य 

एक ओर 

पटरी को सिरहाना समझ

इत्मीनान से सर रखे   

दूसरी ओर पाँव पसारे

लकड़ी / सीमेंट के स्लीपर पर 

टिकाए पीठ  

बेफ़िक्र सोते हुए

कृशकाय मज़दूर देखे

लाचारी में क़ानून तोड़ते

भारत के मजबूर देखे   

कमाल का भरोसा है उनका

नींद में भी सजग रहने पर  

सरकारी आदेश पर 

लॉक डाउन में 

रेल चक्काजाम पर

उन्हें नहीं मालूम 

बेरहम सरकार 

कब अपना आदेश बदल दे! 

कब विशेष ट्रैन चला दे!

चिरनिद्रा में न सुला दे...! 

© रवीन्द्र सिंह यादव

अपने चेहरे पर मुखौटा क्यों भला?

रेल-पटरी के ऊपर 

वर्षों पहले बने 

जर्जर ज़ंग लगे लोहे के पुल से 

गुज़रते हुए

चिंतनीय सवाल 

मुनिया ने बापू से पूछा-

"एक दिन 

यह पुल गिर जाएगा 

न जाने 

दिन का होगा कौनसा पहर 

चुपचाप अकेला गिरेगा 

या बरपाएगा 

गुज़रते लोगों पर क़हर?

फिर किसी की लापरवाही 

तय करने के लिए 

आयोग बनेगा

दोष तय करने का 

कब योग बनेगा?" 

बापू ने कहा-

"ख़ाली दिमाग़ शैतान की दुकान!

यह नहीं कोई विचार महान

कुछ और सोचो

तुम्हें बड़ा आदमी बनना है।"

"बड़ा आदमी नहीं!

संपूर्ण औरत!

अपने चेहरे पर 

मुखौटा क्यों भला?"

मुनिया चिहुँक पड़ी

मुनिया की समझदारी पर 

बापू की आँखें फटीं रह गयीं। 

© रवीन्द्र सिंह यादव

शुक्रवार, 1 मई 2020

अज्ञात सफ़र

सफ़ेद कबूतर उड़ा साहिल से 

समुद्र में डूबते सूरज को देखने 

उड़ता गया... उड़ता ही गया!

अब समंदर के ऊपर था 

बस अँधेरा...घना अँधेरा!

रेत न पीछे नज़र आया 

न बहुत आगे तक...  

सफ़ेद कबूतर ने 

लौटने का निश्चय किया

जहाँ से उड़ा था 

उस ओर मुड़ा था 

थक-हारकर 

साहिल पर आ गिरा था 

ज्वार आया तो 

सुरक्षित ज़मीन पा गया था

सांसें सामान्य हुईं 

प्राची में लालिमा देख 

नवजीवन पाकर 

जिजीविषा के साथ 

उड़ गया ज्ञात परिवेश में 

अज्ञात सफ़र के अनुभव सुनाने।  

©रवीन्द्र सिंह यादव   

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ये अदाएँ हैं / लघुकथा

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