मंगलवार, 21 अप्रैल 2020

अवसान की अवधारणाएँ

जटिलताएँ जीवन कीं  

सापेक्ष आलोकित हैं 

अस्तित्त्व-वेदना का 
  
पराभवपरायण होना 

अनंत और विस्तृत है

अखिल व्योम में व्याप्त हैं 

अवसान की अवधारणाएँ 

मधु-मालती तो खिल उठी 

दुर्भावनाएँ आशंकाएँ परे रख 

बेरी पर बचा है बस एक बेर

बीतते बूढ़े बसंत का  

डाली झुका स्वाद चख। 

 ©रवीन्द्र सिंह यादव   

1 टिप्पणी:

  1. उस बेर का खट्टा-मीठा स्वाद जीभ की तृषा नहीं आत्मा की कलुषिता मिटा दे यही प्रार्थना है प्रकृति से।
    -----
    समसामयिक परिदृश्य से
    व्याकुलता कविमन की
    सकारात्मकता से भरी सुंदर अभिव्यक्ति।
    लिखते रहिये।
    सादर।

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