शुक्रवार, 24 अप्रैल 2020

युद्ध


अतीत में युद्ध हुए हैं 


महत्त्वाकाँक्षा मुनाफ़ा का

 

मातमी मुकुट धरकर 


या अपमान और कुंठाओं से त्रस्त 


मानवीय प्रकृति की 


बिडंबनाओं में उलझकर 


करोना-काल में स्थगित है


युद्ध-सामग्री क्रय-विक्रय 


संयुक्त युद्धाभ्यास 


परमाणु बम परीक्षण


अवैध हथियारों की खेप


मौन है विप्लवी लय


मानवता को आहत करने 


कैसे रचें महाभीषण   

  

युद्धक-षड्यंत्र


गोपनीय मंत्रणाओं को 


कैसे आयोजित करे 


हलकान शासन-तंत्र 


अलसाई सरहदों पर 


सन्नाटा और शांति


शिद्दत से महसूसकर


प्रबुद्ध मानवता लेती है  


पुरसुकून की सांस


बेज़मीरी इंसान की 


बन गयी है तारीख़ी फांस। 


 ©रवीन्द्र सिंह यादव  


4 टिप्‍पणियां:

  1. युद्ध शब्द ही अमंगलकारी विभीषिका का संकेत है।
    युद्ध की कल्पना मात्र मानवता की दुर्दशा चित्रित करती है। महामारी से आक्रांत दुनिया युद्ध से कम त्रासदी नहीं झेल रही।
    -----
    समसामयिक परिस्थितियों पर आपकी चिंतनशील रचनाएँ
    विचारणीय एवं सराहनीय है।
    सार्थक सृजन करते रहिये।
    सादर।

    जवाब देंहटाएं
  2. आज जिस अदृश्य शत्रु से युद्ध चल रहा है काश यह रणभूमि में होने वाले भीषण युद्ध के दुष्परिणाम से मनुष्य को पुनः अवगत करा कर समस्त देशों की युद्ध की लालसा को ही भंग कर दे और अमन की महत्ता सिखला दे।
    बहुत खूब लिखा आपने आदरणीय सर। यह रचना आज वर्तमान की आवश्यकता है। आपको और आपकी कलम को मेरा सादर प्रणाम 🙏

    जवाब देंहटाएं
  3. युद्ध कौन चाहता है सिवाय सत्त्लोलुप और विकृत मानसिकता वाले आततायी लोगों के | कोरोना काल ने मौत के सौदागरों को भी ,अपने भीषण म्रत्युदंश के भय से पस्त कर दिया है | मानवता को सताने के उनके षड्यंत्र रचे के रचे रह गये |सचमुच इतिहास ही इसका विश्लेषण करेगा |
    विचारणीय मार्मिक विषयात्मक रचना के लिए साधुवाद और शुभकामनाएं आदरणीय रवीन्द्र जी |

    जवाब देंहटाएं
  4. A good informative post that you have shared and thankful your work for sharing the information. I appreciate your efforts and all the best Aaj Ka Suvichar in Hindi this is a really awesome and i hope in future you will share information like this with us

    जवाब देंहटाएं

विशिष्ट पोस्ट

कल-आज-कल / लघुकथा

          वह एक   शांत  सुबह थी जेठ मास की   जब बरगद की छांव में स्फटिक - शिला   पर बैठा वह सांस्कृतिक अभ्युदय की कथा ...