गुरुवार, 27 फ़रवरी 2020

हाइकु

 1. 
जलती बस्ती~ 
खड़ा है लावारिस 
संतरा-ठेला। 

2. 
दंगे में तख़्ती~ 
एक सौ पचास है 
दूध का भाव। 

3. 
संध्या की लाली~
क्षत-विक्षत लाश 
चौपाल पर। 

4. 
अर्द्ध-यामिनी~ 
जलते घरोंदों में 
इंसानी शव। 

5. 
भोर की लाली~ 
गली में ईंट-रोड़े  
भीड़ के हाथ।  
 
© रवीन्द्र सिंह यादव 

शुक्रवार, 21 फ़रवरी 2020

असीम वेदना:दीवार / प्रकृति / मानुष


दीवार उठती है

बाँटती है

आचार-विचार

रहन-सहन

दशा-दिशा

अँगारे-धुआँ

कोई सेंध लगाकर

देख लेता है आरपार

एक ओर

कलात्मक चित्रकारी की भरमार

दूसरी ओर

कीलें ठोककर अस्थायी छप्पर

हवा में हवा होती नैतिकता 


के परिवेश में

नंगनाच करती भौतिकता

बैठेंगे खग-वृन्द दीवार पर

किसी की पूँछ

किसी की चोंच

देखेंगे नौनिहाल

दीवार ढोती है

व्यक्ति की निजता

अस्थायी सुरक्षा का पता 

संकीर्णता के कीड़े-मकोड़े

सहती है महत्त्वाकाँक्षा के हथौड़े

प्रकृति सिहर उठती है

असीम वेदना से

सहती है नादान इंसान के

स्वकेन्द्रित क्रिया-कलाप

हवा-पानी धूप-चाँदनी से

कहती है-

भेदभाव हमारी नीयत में नहीं

सारमय नीरव इशारे समझने की दक्षता

उन्मादी मग़्ज़वाली खोपड़ी में नहीं।

© रवीन्द्र सिंह यादव

गुरुवार, 20 फ़रवरी 2020

हाइकु

1.
गृह-वाटिका~
बाला भरे टोकरी 
हिना-पत्तियाँ।

2.
संध्या की लाली~
मेहंदी रचे हाथ
मींचे अखियाँ।

3.
सावन-सांझ~
शिला पर पीसती
हिना बालिका।

4.
सावन-भोर ~
हिना से चाँद-फूल
रची हथेली।

5.
बसंत-सांझ~
मेहंदी से लिखती
पिया का नाम।

6.
पूस की रात~
कँबल से बाहर
मेहंदी-हाथ।

7.
शरद-सांझ~
ताके पिया हथेली
मेहंदी रची। 

8.
मेघ नभ में~
माँ रचाये मेहंदी
बेटी के हाथ।

9.
फूली मेहंदी~
डाकिया के हाथ में
चिट्ठी का थैला।

10.
गाँव का मेला~
बालिका रचवाती
हाथ पे हिना।

11.
कुआँ किनारा~
मेहंदी पत्ता तोड़े
नन्ही बालिका।

12.
गोधूलि बेला~
मेहंदी झाड़ पर
सांप का जोड़ा।

© रवीन्द्र सिंह यादव




शुक्रवार, 14 फ़रवरी 2020

एक आवारा बदली


भुरभुरी भूमि पर उगे 
किरदार-से कँटीले कैक्टस
निर्जन परिवेश पर 
उकताकर कुंठित नहीं होते
ये भी सजा लेते हैं 
अपने तन पर काँटों संग फूल   
सुदूर पर्वतांचल में 
एक मोहक महक से महकती 
स्वागतातुर वादी  
रंग-विरंगे सुकोमल सुमनों से सजीं सुरम्य क्यारियाँ 
पुकारतीं तितलियों को 
कुसुम-दलों पर छिटकीं धारियाँ 
मधुमक्खियाँ मधुर पराग पीने पधारतीं 
एक आवारा बदली 
बरसने से पहले 
निहारती दोनों दृश्य।  

© रवीन्द्र सिंह यादव  
   

शनिवार, 1 फ़रवरी 2020

बसंत तुम आ तो गये हो!
















बसंत तुम आ तो गये हो! 
लेकिन कहाँ है...
तुम्हारी सौम्य सुकुमारता ?
आओ!
देखो!
कैसे कोमल मन है हारता।

खेत, नदी, झरने, बर्फ़ीली पर्वत-मालाओं में 
फ़स्ल-ए-गुल के अनुपम नज़ारे, 
बुलबुल, कोयल, मयूर, टिटहरी 
टीसभरे बोलों से बसंतोत्सव को पुकारे। 

अमराइयों में नवोदित मंजरियों का
बसंती-बयार के साथ मोहक नृत्य,
मानव का सौंदर्यबोध से पलायन 
वर्चस्व-चेष्टा के अनेक आलोच्य-कृत्य। 

अभी गुज़र जाओ चुपचाप 
सन्नाटे में विलीन है पदचाप
बदलती परिभाषाओं की व्याख्या में 
अनवरत तल्लीन हैं बसंत-चितेरे। 
© रवीन्द्र सिंह यादव 
    

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