सोमवार, 16 दिसंबर 2019

फ़ासले


फ़ासले 

क़ुर्बतों में बदलेंगे 

एक रोज़, 

होने नहीं देंगे 

हम 

इंसानियत को 

ज़मीं-दोज़। 


फ़ासले 

पैदा करना तो 

सियासत की 

रिवायत है,

अदब को 

आज तक 

अपनी 

ज़ुबाँ की 

आदत है। 



आग 

बाहर तो दिखती है 

अंदर भी 

रहा करती है,

भूमंडलीकरण का 

बे-हया धुआँ है

चिड़िया 

ख़ौफ़ में 

उड़ा करती है। 



प्रियंवदा/ प्रियंवद की 

तलाश 

जारी रहेगी जहां में 

अनवरत,

ज़माने की 

बेरहम हवाएँ 

कर लें 

पुरज़ोर 

जी भरकर ख़िलाफ़त। 
   
© रवीन्द्र सिंह यादव 

शब्दार्थ /Word Meanings 

फ़ासले = दूरी, दूरियाँ, अंतर / Distance 
क़ुर्बतों में = नज़दीकियों में, निकटताओं में / In Nearness   
ज़मीं-दोज़ = भूमिगत, ज़मीन के अंदर / Underground  
सियासत = राजनीति / Politics 
रिवायत = परंपरा / Tradition 
प्रियंवदा/ प्रियंवद = प्रिय बोलने वाली / वाला, मृदुभाषी   



7 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (18-12-2019) को    "आओ बोयें कल के लिये आज कुछ इतिहास"   (चर्चा अंक-3553)     पर भी होगी। 
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है। 
     --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' 

    जवाब देंहटाएं
  2. वाह!
    आदरणीय सर बहुत खूब लिखा आपने।
    सटीक।
    सादर प्रणाम 🙏

    जवाब देंहटाएं

  3. जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना शुक्रवार २० दिसंबर २०१९ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं...धन्यवाद।

    जवाब देंहटाएं
  4. आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज रविवार 29 दिसम्बर 2019 को साझा की गई है...... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

    जवाब देंहटाएं
  5. प्रियंवदा/ प्रियंवद की
    तलाश
    जारी रहेगी जहां में
    अनवरत,
    सही कहा बहुत ही सुन्दर सार्थक सृजन..
    वाह!!!
    नये साल की अग्रिम शुभकामनाएं

    जवाब देंहटाएं

विशिष्ट पोस्ट

चींटियाँ

देख रहा हूँ चींटियों को कतारबद्ध चलते हुए  कुछ जातीं चींटियाँ  कुछ आतीं चींटियाँ सोच रहा हूँ  कितनी दिमाग़दार हैं चींटियाँ अपनी ...