गुरुवार, 4 अप्रैल 2019

नक़्शा


उस दिन बिटिया नाराज़ हुई थी 
तब चौथी कक्षा में पढ़ती थी 
भूगोल की परीक्षा में 
नक़्शा बनाने के भी नम्बर थे 
नक़्शे बनाते-बनाते 
उसे गुस्सा आया 
मेरे पास आयी 
हाथ में थे कई काग़ज़ 
जिन पर बने थे कई नक़्शे 
लेकिन नहीं थे बनाने जैसे 
बालसुलभ तमतमाहट के साथ 
पूछा मुझसे-
ये नक़्शे टेढ़े-मेढ़े क्यों होते हैं ?
बड़े होकर समझना 
नक़्शों का बदलना     
नक़्शों का मिटना 
नक़्शों में समायी भावना
नक़्शों में निहित सम्भावना  
क़ुदरत ने दिया था 
बस एक ही नक़्शा भूमि-जल से चहकता  
घुसेड़ दी है हमने नक़्शे में 
विस्तारवादी / संकीर्ण मानसिकता
राजनीति रणनीति और सुरक्षा 
नक़्शे की जड़ में छिपी है महत्वाकाँक्षा  
नक़्शों में सिमटी है आज दुनिया 
सुनते-सुनते गम्भीर हुई मुनियाँ। 
© रवीन्द्र सिंह यादव