गुरुवार, 17 जनवरी 2019

सड़क पर प्रसव


वक़्त का विप्लव 

सड़क पर प्रसव 

राजधानी में 

पथरीला ज़मीर 

कराहती बेघर नारी 

झेलती जनवरी की 

ठण्ड और प्रसव-पीर 

प्रसवोपराँत 

जच्चा-बच्चा 

18 घँटे तड़पे सड़क पर 

ज़माने से लड़ने 

पहुँचाये गये

अस्पताल के बिस्तर पर

चिड़िया चहचहायी होगी 

विकट विपदा देखकर 

गाड़ियाँ और लोग

निकले होंगे मुँह फेरकर 

हालात प्रतिकूल 

फिर भी टूटी नहीं 

लड़खड़ाती साँसें

करती रहीं 

वक़्त से दो-दो हाथ  

जिजीविषा की फाँसें   

जब एनजीओ उठाते हैं 

दीनहीन दारुण दशा का भार 

तब बनता है 

एक सनसनीखेज़ समाचार।  

© रवीन्द्र सिंह यादव 

15 टिप्‍पणियां:

  1. नारी का दर्द,पुरुष की जुबानी आँखें बरस गई
    सादर

    जवाब देंहटाएं
  2. यही सच है ...मर गई मानवता .....बहुत मर्मस्पर्शी।

    जवाब देंहटाएं
  3. मनुजता विहीन समाज का मार्मिक चित्रण ,सादर नमन आप को और आप की लेखनी को

    जवाब देंहटाएं
  4. जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना शुक्रवार १८ जनवरी २०१९ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं...धन्यवाद।

    जवाब देंहटाएं
  5. बहुत ही मर्मस्पर्शी रचना...
    कराहती बेघर नारी
    झेलती जनवरी की
    ठण्ड और प्रसव-पीर
    दिल को झकझोरती मार्मिक एवं सटीक प्रस्तुति...

    जवाब देंहटाएं
  6. बहुत शर्मनाक बहुत दर्दनाक किन्तु कटु सत्य ! आज महा-प्राण निराला होते तो लिखते -
    वह जन्मतीं हैं शिशु, महानगरों की सड़कों पर,
    कलंकित देश होता है, महानगरों की सड़कों पर !

    जवाब देंहटाएं
  7. शर्मनाक मानवता विहीन समाज का मार्मिक चित्रण

    जवाब देंहटाएं
  8. आदरणीय सर आपकी इस मर्मस्पर्शी रचना ने विह्वल कर दिया और ये संकेत भी दे दिया की इंसानियत अब अपाहिज हो चूकी है

    जवाब देंहटाएं
  9. संवेदनहीन होते समाज की मार्मिक तस्वीर आदरणीय रवीन्द्र जी |
    सनसनी का भूखा मीडिया और कर भी क्या सकता है ? गरीबी में
    हालत से लड़ने की हिम्मत भी कुछ ज्यादा ही आ जाती है | सादर

    जवाब देंहटाएं
  10. निःशब्द !!!! दिल दहला देने वाली वास्तविक घटना पर आधारित रचना।

    समाज का एक चेहरा यह भी है जो सत्य है।

    जवाब देंहटाएं

विशिष्ट पोस्ट

ख़िज़ाँ ने फिर अपना रुख़ क्यों मोड़ा है?

मिटकर मेहंदी को रचते सबने देखा है, उजड़कर मोहब्बत को रंग लाते देखा है? चमन में बहारों का बस वक़्त थोड़ा है, ख़िज़ाँ ने फिर ...