मंगलवार, 22 जनवरी 2019

नारियल और बेर


नारियल बाहर भूरा
अंदर गोरा पनीला,
बाहर दिखता रुखा
अंदर नरम लचीला।

बाहर सख़्त खुरदरा
भीतर उससे विपरीत,
दिखते देशी, हैं अँग्रेज़
है कैसी जग की रीत।

युग बीत गये बहुतेरे
बदला मन का फेर,
अंदर कठोर बाहर रसीला
मिलता खट्टा-मीठा बेर।

हैं क़ुदरत के खेल निराले
जीवन का मर्म सरल-सा,
दृष्टिकोण और मंथन में
रहा उबाल गरल-सा।

© रवीन्द्र सिंह यादव


3 टिप्‍पणियां:

  1. वाह आदरणीय सर कमाल की रचना
    वास्तव में कुदरत के खेल निराले हैं
    बस देखना ये है कि कौन कैसी समझवाले हैं
    सादर नमन शुभ संध्या

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    उत्तर
    1. रचना का मर्म समझकर प्रतिक्रिया लिखने हेतु शुक्रिया आँचल जी।

      हटाएं
  2. बहुत खूब आदरनीय रवीन्द्र जी !! कुदरत के खेल निराले भी और शाश्वत भी | नारियल हो या बेर इनके स्वभाविक धर्म को कुदरत ने सदैव बरकरार रखा है |बहुत ही अलग सृजन के लिए हार्दिक शुभकानाएं और बधाई |

    उत्तर देंहटाएं

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