शनिवार, 22 दिसंबर 2018

वक़्त



एक शिल्पी है वक़्त 

गढ़ता है दिन-रात

उकेरता अद्भुत नक़्क़ाशी 

बिखेरता रंग लिये बहुरँगी कूची  

पलछिन पहर हैं पाँखुरियाँ 

बजतीं सुरीली बाँसुरियाँ 

सृजित करता है 

स्याह-उज्ज्वळ इतिहास 

पल-पल परिवर्तित प्रकृति 

घड़ियाँ करतीं परिहास  

नसीम-सा गुज़रता है 

हर्ष-विषाद के पड़ावों से 

मरहम हो जाता है 

आप्लावित होता है भावों से 

उजलत मानव अभिलाषा 

कोसती है वक़्त को 

ख़ुद ठहरकर 

सुबह-शाम 

दोष देती वक़्त को  

वक़्त की गर्दिश को 

सीने से लगा लेते हैं हम 

ठोकरें और थपेड़े वक़्त के 

ज़ेहन में क्यों सजा लेते हैं हम ?

© रवीन्द्र सिंह यादव


उजलत = उतावली,व्यग्र 

नसीम = जो दूसरों की सहायता करता हो  

15 टिप्‍पणियां:

  1. वक़्त की हाथों की कठपुतलियाँ सारे
    वही बुनता है सुख-दुःख के ताने बाने
    थामकर डोर जीवन की मनमर्जियाँ चलाता है
    कभी सीता है जख़्मों को कभी किर्चियाँ चुभाता है

    बहुत सुंदर शब्दों की शानदार नक्काशी रवींद्र जी..खूबसूरत रचना..वाहहह।

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    1. आपकी काव्यात्मक प्रतिक्रिया उत्साहवर्धक है आदरणीया श्वेता जी. बहुत-बहुत आभार.

      हटाएं
  2. आपकी लिखी रचना "मित्र मंडली" में लिंक की गई है. https://rakeshkirachanay.blogspot.com/2018/12/101.html पर आप सादर आमंत्रित हैं ....धन्यवाद!

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. बहुत-बहुत आभार आदरणीय राही जी रचना को मित्र-मंडली में शामिलकर विशिष्ट पाठक वर्ग तक पहुंचाने के लिये.

      हटाएं
  3. वक़्त की गर्दिश को

    सीने से लगा लेते हैं हम

    ठोकरें और थपेड़े वक़्त के

    ज़ेहन में क्यों सजा लेते हैं हम ?
    बहुत ही बेहतरीन रचना रवीन्द्र जी

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. सादर आभार आदरणीया अनुराधा जी उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया के लिये.

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  4. वक्त ही देता रहा सौगातें
    वक्त ही लेता रहा इम्तिहान
    थमा सा खडा था वक्त
    हम गुजरते रहे दरमियाँ ।
    सार्थक समय की बहती धारा सी प्रवाहमान रचना।

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    उत्तर
    1. सादर आभार आपका कुसुम जी मोहक काव्यात्मक प्रतिक्रिया के लिये।

      हटाएं
  5. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" रविवार 06 जनवरी 2019 को साझा की गई है......... http://halchalwith5links.blogspot.in/ पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  6. आपका यह शिल्पी इतना बेरहम क्यों है? वह इतना भेदभाव क्यों करता है?
    हम सब्र करें, वो ऐश करें?
    वो क़त्ल करें, हम शव ढोएँ?

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  7. भाव तो मैं उतना समझ नहीं सका...लेकिन श्बदों का बेहतरीन प्रयोग किया है आपने।

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  8. हर्ष-विषाद के पड़ावों से ,मरहम हो जाता है
    यथार्त...... बहुत खूब...... सादर नमन

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  9. वक़्त की गर्दिश को
    सीने से लगा लेते हैं हम
    ठोकरें और थपेड़े वक़्त के
    ज़ेहन में क्यों सजा लेते हैं हम ?
    बहुत सुन्दर, सार्थक एवं सटीक प्रस्तुति

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