शुक्रवार, 30 नवंबर 2018

समुंदरों को दिखा रहा हूँ


मैं अपनी  कश्ती  पार लाकर, 

समुंदरों   को  दिखा  रहा  हूँ। 


जीवन   के  ये  गीत  रचे जो, 

मज़लूमों   को  सुना  रहा हूँ। 


चला हूँ जब से कँटीले पथ पर, 

पाँव   के   छाले  छुपा  रहा हूँ। 


उतर  गया  हूँ  सागर तल में, 

प्यार  के  मोती  उठा  रहा हूँ। 


अहंकार    के    दावानल   में, 

प्रेम  की  बूँदेँ  गिरा  रहा   हूँ। 


जहाँ बुझ गया चाँद फ़लक का, 

चराग़  होना  सिखा  रहा  हूँ।   


इंसानियत    के    कारवाँ   में, 

जुड़ो  अभी   मैं  बुला  रहा  हूँ। 


उदास   बैठी   सूनी  घाटी  में, 

उम्मीद के फूल खिला रहा हूँ।  


अन्धकार   से   डरना   छोड़ो, 

मैं  एक  दीपक  जला रहा  हूँ।  

© रवीन्द्र सिंह यादव


15 टिप्‍पणियां:

  1. वाह्ह्ह... वाह्ह्ह.... लाज़वाब.. शानदार.. ग़ज़ल...हर बंध बहुत ही सुंदर गेय रचना आदरणीय रवींंद्र जी..बधाई आपको बहुत सारा..।

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  2. सुंदर भावपूर्ण प्रस्तुति आदरणीय।

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  3. निशब्द हूँ. क्या कहूँ. जोश और ओज से परिपूर्ण रचना 👏 👏 👏

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  4. बहुत ही सहज और प्रेरणादायी रचना।
    "...
    इंसानियत के कारवाँ में,
    जुड़ो अभी मैं बुला रहा हूँ।
    ..."

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  5. जोश और जूनून से लबरेज़ एक जुनूनी रचना। समुंदरों को दिखा रहा हूँ ,मैं अपनी कश्ती पार लाकर ....बहुत ही बेहतरीन पंक्ति है। बहुत अच्छी लगी आपकी यह रचना। बधाई।



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  6. इंसानियत के कारवाँ में,
    जुड़ो अभी मैं बुला रहा हूँ।
    vaah...

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  7. आपकी लिखी रचना "मित्र मंडली" में लिंक की गई है. https://rakeshkirachanay.blogspot.com/2018/12/98.html पर आप सादर आमंत्रित हैं ....धन्यवाद!

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  8. वाह बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    मैं एक दीप जला रहा हूं।

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  9. बहुत लाजवाब ...
    हर शेर मुखर ... स्पष्टता से आपकी बात रख रहा है और गज़ब कह रहा है ...
    दिली दाद कबूल करें रविन्द्र जी ...

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  10. लाजवाब गजल !!!!
    एक से बढ़कर एक शेर....
    जहाँ बुझ गया चाँद फ़लक का,
    चराग़ होना सिखा रहा हूँ।
    बहुत ही उम्दा....
    वाह!!!!

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  11. सकारात्मकता की ज्योति से भरपूर अनुपम सृजन ।

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