सोमवार, 5 नवंबर 2018

भौतिक विकास

लोग कहते हैं

ज़िन्दगी की रफ़्तार

तेज़ हो गयी है

बढ़ते पेड़-पौधे

सूरज-चाँद-तारे

दिन-रात

घोंसलों में लौटते पक्षी

गर्भावस्था

जंगल का स्वाभाव

आदर्शवाद से लगाव 

नदी का बहाव

समुद्री ज्वार-भाटा  

साँसों की गति

ह्रदय की धड़कन 

जैसे थे कम-ओ-बेश वैसे हैं

अहम् का टकराव

कृत्रिमता का फैलाव

लोभ की रफ़्तार

भौतिकता का पड़ाव

प्राकृतिक संसाधनों का दोहन 

कृत्रिमता का आरोहण 

पर्यावरण पर उदासीनता 

प्रदूषण पर दीनता 

का प्रभाव 

इतना तेज़ हुआ है

कमाने पैसा दो-चार

इंजेक्शन से बढ़ाते हैं

सब्ज़ियों  का  भार

भौतिक विकास की आँधी में

संस्कारविहीनता के अंधड़ में 

मानवता रही बार-बार हार

एकत्र किये हैं परमाणु हथियार 

विलुप्त हो जाय दुनिया कई बार। 

© रवीन्द्र सिंह यादव

6 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन धन्वन्तरि दिवस, धनतेरस और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

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    1. सादर आभार आदरणीय हर्षवर्धन जी. दीपावली की हार्दिक मंगलकामनाएं.

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  2. ठीक लिखा है आपने ... समय की भी वही है रफ़्तार तेज़ी आइ है तो इंसान में १ साल में कई कई साल जीना चाहता है ...
    लाजवाब रचना ... दीपावली की हार्दिक बधाई आपको ...

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. सादर आभार आदरणीय दिगम्बर जी. दीपावली की हार्दिक मंगलकामनाएं.

      हटाएं
  3. आपकी लिखी रचना "मित्र मंडली" में लिंक की गई है. https://rakeshkirachanay.blogspot.com/2018/11/95.html पर आप सादर आमंत्रित हैं ....धन्यवाद!

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    1. मेरी रचना को मित्र-मंडली में शामिल करने हेतु सादर आभार राही जी।

      हटाएं

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