गुरुवार, 15 नवंबर 2018

आईना


छींक अचानक आयी 
सामने था आईना,
क्या रखते हो अन्दर  
धुँधला हुआ आईना।

वक़्त--तपिश 
लेकर आयी गर्म हवा,  
धुँध छँट  गयी और 
साफ़ हुआ आईना। 

देखकर ख़ुद को 
ग़ुरूर था आसमान पर,
अपने-सा दिखा तो 
ना-गवार हुआ आईना।  

दरकतीं हैं बुलंद से बुलंद 
इमारतें ज़माने में
टूटा फिर भी पहचान से 
महरूम हुआ आईना। 

सहम जाते हैं लोग 
देखकर अपनी हक़ीक़त
बेरहम कभी मुद्दई 
कभी मुंसिफ़ हुआ आईना। 

औरों की आँखों में 
देख लेते हैं अक्स अपना
फिर भी ज़माने की 
दरकार हुआ आईना। 

जमती रहती है धूल 
गर रोज़ साफ़ किया
 हो अपनी नज़रों से गिरना    
निहायत ज़रूरी हुआ आईना। 

© रवीन्द्र सिंह यादव

11 टिप्‍पणियां:

  1. "...
    दरकतीं हैं बुलंद से बुलंद
    इमारतें ज़माने में,
    टूटा फिर भी पहचान से
    महरूम न हुआ आईना।"

    प्रेरणादायक पंक्तियाँ।

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    1. बहुत-बहुत आभार प्रकाश जी आपकी सराहना मनभावन है।

      हटाएं
  2. वाहहह.. वाहहह... क्या कहने रवींद्र जी बहुत सुंदर सारयुक्त रचना..👌👌👌
    हर बंध बेहद प्रभावशाली और सीख देती सी प्रतीत हो रही..।
    कुछ लाइन मेरी भी आपके रचना के सम्मान में-

    बेरहम बेजान कहकर
    लोग उसका नाम लेंं,
    राज़ सब दिल में छुपाकर
    वफ़ा निभाये आईना

    आपकी रचना की
    ये पंक्तियाँ बहुत अच्छी लगी-

    औरों की आँखों में
    देख लेते हैं अक्स अपना,
    फिर भी ज़माने की
    दरकार हुआ आईना।

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. सादर आभार आदरणीया श्वेता जी आपकी काव्यात्मक प्रतिक्रिया ने रचना को अलंकरण प्रदान किया है।

      हटाएं
  3. वाह!!रविन्द्र जी ,क्या बात है
    बहुत ही खूबसूरत ,लाजवाब!!!

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. सादर आभार आदरणीया शुभा जी आपकी मोहक प्रतिक्रिया मनोबल बढ़ाने वाली है।

      हटाएं
  4. वाह! वाह! क्या बात है। बेरहम कभी मुद्दई, कभी मुंसिफ हुआ आइना।

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. सादर आभार आदरणीय विश्व मोहन जी उत्साहवर्धक टिप्पणी के लिये।

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  5. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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