शुक्रवार, 2 नवंबर 2018

प्रकृति को आने दो घर-द्वार

मन भर मन पर भार 

चल नहीं पाते उठाकर 

अब हम क़दम दो-चार 

पूर्वाग्रही सूचनाओं की 

आयी अजब  भरमार 

कहते फिर भी हम उसे 

निर्भीक  निष्पक्ष अख़बार 

ज़ेहनियत होती जाती बीमार 

समाया रग-रग में भ्रष्टाचार 

नैतिकता बेबस खड़ी उस पार

बदल गया है क़ायदा कारोबार

कहीं पौ-बारह कोई हुआ लाचार    

मन पर बढ़ता क्रोध का अम्बार 

परे होंगे त्रासद मनोविकार 

आओ छेड़ें सरगम के तार 

प्रकृति को आने दो घर-द्वार

सुनो बच्चों की चुलबुली पुकार

भरेगा भावुक ह्रदय  में प्यार।

© रवीन्द्र सिंह यादव



11 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत ही सुन्दर और भावपूर्ण रचना 🙏

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    1. सादर आभार आदरणीया अभिलाषा जी रचना पर अपनी पसंद ज़ाहिर करने के लिये.

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  2. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन सोहराब मोदी और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

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    उत्तर
    1. सादर आभार आदरणीय हर्षवर्धन जी रचना को ब्लॉग बुलेटिन में शामिल करने के लिये.

      हटाएं
  3. आपकी लिखी रचना "मित्र मंडली" में लिंक की गई है. https://rakeshkirachanay.blogspot.com/2018/11/94.html पर आप सादर आमंत्रित हैं ....धन्यवाद!

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  4. वाह!!रविन्द्र जी ,बेहतरीन रचना!!

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  5. बहुत खूब जो बस में न हो उसे खूबसूरत मोड दे दो।
    विचारशील रचना।
    अप्रतिम अद्भुत

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