रविवार, 23 सितंबर 2018

चिड़िया


चिड़िया हाँफती हुई 

घोंसले में दाख़िल हुई 

चोंच में दबा चुग्गा 

बच्चों को खिलाया

हालात नाज़ुक हैं 

 बसेरे के आसपास 

टीवी पर 

समाचार देख रहे 

नन्हे बच्चों ने 

चिड़िया को बताया। 


मोबोक्रेसी के 

भयावह परिवेश में 

माँ कितनी रिस्क लेकर 

चुग्गा लेने जाती हो

चिड़ीमार गिरोहों से 

ख़ुद को 

कैसे बचाकर आती हो ?


खेतों में उगने वाले 

अन्न के दानों पर 

उपयोगितावादी मनुष्य 

केवल अपना 

अधिकार समझ बैठा है

अब नयी-नयी 

तरकीबों के साथ 

चिड़ियों को उड़ाने नहीं 

जान से मारने हेतु 

प्रकृति से उलझ बैठा है। 



स्वार्थ का समुन्दर 

दिनोंदिन 

रातोंरात 

गहरा हो चला है

शयनरत शाख़ पर 

मासूम चिड़िया 

मारी जा रही है 

जैसे कोई 

अहर्निश सताती बला हो।

© रवीन्द्र सिंह यादव   


2 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (16-09-2020) को  "मेम बन  गयी  देशी  सीता"    (चर्चा अंक 3826)        पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --  
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'  
    --

    जवाब देंहटाएं
  2. आ रवींद्र सिंह यादव जी, "स्वार्थ का समुंदर, दिनों दिन रातों रात गहरा ही चला है।"
    बगुत सुंदर अभिव्यक्ति! साधुवाद!--ब्रजेन्द्रनाथ

    जवाब देंहटाएं

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