रविवार, 26 अगस्त 2018

भेड़िया और मेमना


भेड़िया 

मेमने से 

कह रहा है 

आप मेरी शरण में 

महफ़ूज़ हैं, सलामत हैं 

मेमना समझ नहीं पाता 

वक़्त की हेरा-फेरी है 

या आयी क़यामत है 

अब शिकारी 

पैंतरे बदल रहा है 

हमदर्द बनकर 

ख़ंजर घौंप रहा है 

मेमने का योजनाबद्ध  

ब्रेन-वाश हो रहा है 

चरवाहा चादर तानकर 

बे-ख़बर सो रहा है 

चरवाहे के वफ़ादार कुत्ते भी 

आजकल भूखे रहने लगे हैं 

मजबूरन दूर-दूर तक 

भोजन तलाशने लगे हैं 

ज़माने की हवा के रुख़ में 

बदलाव का नशा समाया है 

पूछते हैं अब तक 

कैसे और कितना कमाया है?

गाँव-शहर-जंगल तक 

एक ही शोर छाया है

भविष्य की अनिश्चितता का 

ख़ौफ़नाक ख़ामोश ख़तरा क्यों मड़राया है! 

© रवीन्द्र सिंह यादव 

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