बुधवार, 4 जुलाई 2018

बचपन




बहुत याद आता है
अल्हड़पन में लिपटा बचपन
बे-फ़िक्री का आलम 
और मासूम लड़कपन  
निकलता था 
जब गाँव की गलियों से 
बैठकर पिता जी के कन्धों पर  
लगता था मानो छू लिया हो 
ऊँचा आकाश किलकारी भरकर   
खेत-हार घूमकर लौटते थे 
सवाल-जवाब के दौर चलते थे 
सुनाते थे पिता जी बोध-कथाऐं  
कैसे लड़ोगे जब आयेंगीं बलाऐं 
दोस्तों के साथ धमाचौकड़ी 
खेल-खेल में धक्कामुक्की   
अमिया इमली जामुन 
सब आपस में साझा करते 
झरबेरी के लाल-पीले बेर 
बाग़ों में मीठे अमरुद खाया करते  
अब तो बस यादों में सिमटा है बचपन 
पुनि-पुनि हम क्यों जीना चाहें बचपन?
© रवीन्द्र सिंह यादव


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