शुक्रवार, 27 जुलाई 2018

नाम ( तीन क्षणिकाऐं )



1
वो नज़र फिरी
तो क्या हुआ
दास्तान-ए-ग़म की
लज़्ज़त तो बरक़रार है,
मेरे क़िस्से में उनका
उनके में मेरा नाम
आज भी शुमार है।


2
सहरा में
रेत का
चमकना
मानो
सितारों की
झिलमिल चिलमन
के परे हो
मेरी कहकशाँ
ख़ुश हूँ कि
उनके फ़लक़ पर है
मेरा भी नाम-ओ-निशाँ।  

3
तन्हा सफ़र
भला किस
मुसाफ़िर को  
अच्छा लगा,
वो क़हक़हे
वो दिल्लगी
जो थी दिल-नशीं
यादों में वो नाम
चलते-चलते
सच्चा लगा।
© रवीन्द्र सिंह यादव

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