बुधवार, 14 मार्च 2018

किसान के पैरों में छाले


सरकारी फ़ाइल में

रहती है एक रेखा

जिनके बीच खींची गयी है

क्या आपने देखा ..?


सम्वेदनाविहीन सत्ता के केंद्र को

अपनी आवाज़ सुनाने

चलते हैं किसान पैदल 180 किलोमीटर

चलते-चलते घिस जाती हैं चप्पलें

डामर की सड़क बन जाती है हीटर।



सत्ता के गलियारों तक आते-आते

घिसकर टूट जाती हैं चप्पलें

घर्षण से तलवों में फूट पड़ते हैं फफोले

सूज जाते हैं फटी बिवाइयों से भरे पाँव

रिसते हैं रह-रहकर छाले

मायानगरी की दहलीज़ पर

जहाँ उजड़ चुके हैं सम्वेदना के गाँव।


छह दिन पैदल चले

पचास हज़ार ग़रीब किसान

हौसला हो या दूसरों की परवाह

आँदोलन  में शान्ति और अनुशासन के

छोड़ गये गहरे निशान।


हमने देखा उम्मीद मरी नहीं है

मुम्बईकर निकले घरों से

खाना-पानी  और चप्पलें  लेकर

लोग सिर्फ़ सेलिब्रिटीज़ को ही टीवी पर देखना चाहते हैं

तोड़ा भरम राष्ट्रीय मीडिया को नसीहत देकर।


सरकार की नींद खुली

सभी माँगे स्वीकार कर लीं

पीड़ा के पाँवों पर मरहम लगाया

विशेष ट्रेन से

किसानों को घर भिजवाया।

@रवीन्द्र सिंह यादव

कोई टिप्पणी नहीं:

टिप्पणी पोस्ट करें

विशिष्ट पोस्ट

अपना-अपना आसमान

पसीने से लथपथ  बूढ़ा लकड़हारा  पेड़ काट रहा है शजर की शाख़ पर  तार-तार होता  अपना नशेमन  अपलक छलछलाई आँखों से  निहार रही है एक गौरैया अंतिम तिन...