यह ब्लॉग खोजें

बुधवार, 31 जनवरी 2018

बसंत (हाइकु )







छाया बसंत 
है बसंत-बहार 
मुदित जिया 


महका बाग़ 
चहकी कली-कली 
कूकी कोयल 



बौराये आम 
फूली पीली सरसों 
हँसे किसान  

मस्त फ़ज़ाऐं 
गुनगुनी है धूप 
हरे शजर 

ढाक-पलाश 
सुर्ख़ हुआ जंगल 
महके फूल 







खिला बाग़ीचा 
फूलों पे चढ़ा रंग
रंगी है भोर

दिल की लगी 
यक़ीं-वफ़ा के गीत 
भाये मन को  

सूनी है साँझ
चंदा चुपचाप क्यों
रोया चकोर 

बुझते दिये 
मायूसियों के साये 
आ जाओ पिया 

# रवीन्द्र  सिंह यादव 


विशिष्ट पोस्ट

आओ! राष्ट्रीय-चरित्र पर मंथन करें.....

आओ! मनगढ़ंत, मनपसन्द, मन-मुआफ़िक, मन-मर्ज़ी का  इतिहास पढ़ें,  अज्ञानता का विराट मनभावन  आनंदलोक गढ़ें।  आओ!  बदल डालें  सब इमारत...