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गुरुवार, 21 जून 2018

दिल की ख़लिश

रोते-रोते 
ख़त लिखा 
अश्क़ों का दरिया
बह गया 
हो गये 
अल्फ़ाज़ ग़ाएब 
बस कोरा काग़ज़
रह गया
दिल की 
नाज़ुक कश्ती में 
गीले जज़्बात रख  
दरिया-ए-अश्क़ में
बहा दिया 
हसरतों का 
आज भी 
अंतर में 
जल रहा दिया 
गलने से पहले 
मिल जाय गर 
सुन लेना 
सिसकती सदायें 
महसूसना 
तड़प-ओ-ख़लिश पुरअसर। 

© रवीन्द्र सिंह यादव    

शुक्रवार, 15 जून 2018

फ़िटनेस चैलेंज़



पंचतत्व से बने 
भव्य 
सुसज्जित सरकारी 
एक्यूप्रेसर ट्रैक पर
प्राकृतिक वातावरण में 
देखा फ़िटनेस चैलेंज़ 
दिल्ली में 
दम घोंटती 
ज़हरीली आबोहवा का 
देखा ख़तरनाक बैलेंस 


नंगे पाँव 
ककरीली पथरीली पगडंडियों पर 
पसीने से लथपथ 
झेलतीं झुलसाती लू के थपेड़े  
मटके में मटमैला 
पानी लेकर 
मीलों वॉक करके लौटतीं  
भारत की बेटियों को 
देखा है.....  
जो अनचाहे व्यायाम के बाद 
घर आकर 
कभी भूखे पेट भी 
सो जाया करती हैं!
#रवीन्द्र सिंह यादव 

बुधवार, 13 जून 2018

सहानुभूति...


दिनभर 
घरेलू कामकाज में 
रमी रहती बहुरिया 
एक दिन बीमार हो गयी 
घरवाले बेचैन रहे 
बच्चे परेशान रहे 
काली कुतिया 
भूखी ही सो गयी 
प्यासी चिड़ियाँ 
चहचहाती रहीं 
गमलों में कलियाँ 
इंतज़ार करती रहीं 
दवा, फल, जूस आदि का 
भरपूर इंतज़ाम हुआ 
पूरा परिवार चिंता में 
परेशान तमाम हुआ 
चलभाषी संदेशों में 
ख़ैरियत के  
ख़ूबसूरत ख़्याल 
बच्चों के मर्मस्पर्शी 
मासूम सवाल 
सहानुभूति भरे 
मीठे बोलों की 
सुहानी बौछार आयी  
ज़िन्दगी का ख़तरे में होना 
क्या यक़ीनन अच्छा है......?
सोचकर बहुरिया 
मन ही मन मुस्कायी।  

# रवीन्द्र सिंह यादव 



शनिवार, 9 जून 2018

परिवेश

खोखला बौद्धिक अहंकार 
हमें कहाँ ले आया है? 
बेसुरा छलिया राग 
सुरीले सपनों का बसंती गाँव 
कब दे पाया है ?


सृजनमय  विनिमय से 
तिरोहित हमारा मानस 
संकीर्णता की 
अभेद्य परिधि का व्यास 
विस्तृत कर गया है
ईमानदारी के 
संवर्धन हेतु 
न्यास बने 
 दीमक बन
सरेआम
भ्रष्टाचार चाट गया है

बहुत भारी हो चली है
गुनाह में लज़्ज़त की तलाश
उग आयी नाग-फनी
कभी लुभाते थे
जहाँ गहरे सुर्ख़ पलाश

विश्वबंधुत्व के बीज 
उगने से पहले ही
सड़-गल रहे हैं 
धौंस-डपट
थानेदारी के 
आक्रामक बर्बर
विचार पल रहे हैं

चिंतन का केन्द्र-बिंदु
अब सिर्फ़ 
दूसरे के खलीते से 
पैसा निकालकर 
अपनी तिजोरी में 
कैसे पहुँचे,
पर टिक गया है 
आदमी का ज़मीर
चौराहे पर बिक गया है

सम्वाद की गरिमा 
अब आयात करनी होगी 
नयी पीढ़ी में 
संस्कार-मर्यादा की 
चिरंजीवी चिप लगानी होगी
  
शीशे पर जमी है
धूल ही धूल 
पारदर्शी
पानी भी न रहा 
शक्ल अब
एक-दूसरे की
आँखों में देखो 
शर्म होगी तो
ढक लेंगीं पलकें
पुतलियों को 
आदमी की बेशर्मी का
कोई सानी भी न रहा।  

#रवीन्द्र सिंह यादव 

शनिवार, 2 जून 2018

कमाई का हक़ जब माँगता है किसान...

बाँझ हो जाती है 
ज़मीं
नक़ल बाज़ार की  
करता है 
जब किसान 
सरकार को 
आता है पसीना
पसीने की 
कमाई का भाव  
जब माँगता है किसान।  


#रवीन्द्र सिंह यादव 

गुज़रे हुए सालों की तरफ़

गुज़रे हुए 
सालों की तरफ़ 
दौड़ी है आज 
थकी बेचैन नज़र 
फ़िक़रे और तंज़ का 
वो दौर 
जिसमें नहीं था 
कोई हम-सफ़र।

चाँद से माँगी थी 
शबनम में भीगी 
ठंडी चाँदनी 
मगर सूरज 
अड़ गया 
दिखाने अपनी 
शोलों-सी मर्दानगी। 

धूप सहन न हुई 
तो आये 
पीपल के 
घने साये में 
हवा को न जाने 
क्या हुआ 
उड़ा ले गयी पत्ते 
किसी के बहकाबे में। 

शहर से 
आया था गाँव 
शुद्ध हवा की ख़ातिर 
पेड़ काटे 
ईंट-भट्टे में जला दिये 
इंसान हो गया है 
बड़ा शातिर।  


चमन तक 
साथ चले हम-नवा 
बयाबान आया 
तो किनारा कर गये 
वक़्त के साथ 
बदला है इंसान भी  
वो पीठ पर वार 
दोबारा कर गये।  

#रवीन्द्र सिंह यादव 



रविवार, 27 मई 2018

तीन क्षणिकाऐं

क्षणिकाऐं 


स्वप्न-महल  

बनते हैं महल 
सुन्दर सपनों के 
चुनकर 
उम्मीदों के 
नाज़ुक तिनके 
लाता है वक़्त 
बेरहम तूफ़ान 
जाते हैं बिखर 
तिनके-तिनके। 


सफ़र 

जीवन के 
लम्बे सफ़र में 
समझ लेता है 
दिल जिसे हमराही  
दो क़दम 
साथ चलकर 
बिछड़ जाते हैं 
बेड़ियाँ हालात की 
बनती हैं कब सवाली। 

जुदाई 

मिलन के लम्हात 
गुज़रे 
पहलू में बैठे-बैठे 
सुनते रहे 
बुलबुल की सदायें 
होंठों को दबाये-दबाये 
जब मिला 
जुदाई का ग़म 
मतलब-ए-उल्फ़त को 
समझ सके हैं हम।   
#रवीन्द्र सिंह यादव 

बुधवार, 23 मई 2018

लोगों को इंसाफ़ कैसे मिलेगा ?

दादा (पोते से ): कोई नया समाचार हो तो सुनाओ.....

पोता : सब बासी समाचार हैं, हाँ एक ताज़ा समाचार है।

दादा : क्या है, सुनाओ।

पोता : तमिलनाडु में कॉपर प्लांट का विरोध कर रही भीड़ पर पुलिस ने
            गोली चलाई,कई घायल; 11 मरे !

दादा : राम-राम !!! लोग क्यों कर रहे थे विरोध ?

पोता : फैक्टरी प्रदूषण फैला रही है। लोगों का जीना दूभर हो गया है। 

दादा : लोगों का विरोध तो जाएज़ है तो गोली क्यों चलाई पुलिस ने ?

पोता : पुलिस का कहना है कि भीड़ हिंसक होकर अनियंत्रित हो गयी थी।

दादा : हिंसक प्रदर्शन तो ना-जाएज़ है लेकिन पुलिस गोली चलाने के अलावा
           कोई और विकल्प क्यों नहीं अपनाती ?

पोता : हाँ, किन्तु लोग 100 दिन से प्लांट बंद करने की शांतिपूर्ण माँग कर रहे थे।
          प्लांट तक जाने से पुलिस ने  लोगों को रोका क्योंकि हाई कोर्ट ने प्लांट की
          सुरक्षा का आदेश दिया है।

दादा : वाह ! नागरिकों  की सुरक्षा का क्या?  सरकार अहिंसक आन्दोलनों की आवाज़
          नहीं सुनती तो लोग धैर्य खोने लगते हैं परन्तु हिंसा पर उतर आना किसी
          समस्या का हल नहीं है।

पोता : सरकार ने मुआवज़े की घोषणा कर दी है। मृतक  के परिजन को
           सरकारी नौकरी  और 10 लाख रुपये।

दादा : लोगों की जान लेकर सरकार राहत की घोषणा क्यों करती है ?

पोता: मामले को ठंडा करने और लोगों का क्रोध शांत करने के लिए।

दादा : जब सरकार को मालूम है कि प्लांट प्रदूषण फैला रहा है तो
           बंद क्यों नहीं करवाती ?

पोता :बहुराष्ट्रीय कम्पनी का प्लांट है।

दादा : तो क्या हुआ, लोगों की ज़िन्दगी से खिलवाड़ की इजाज़त उसे किसने दी ?

पोता : यह बड़ा खेल है।

दादा : कुछ समझाओ भी।

पोता : ऐसी कम्पनियाँ अधिकारियों को रिश्वत देती हैं और राजनैतिक दलों
          (सत्तापक्ष और विपक्ष ) को मुँह भरकर चंदा देती हैं तथा कुछ नेताओं
          की सिफ़ारिश पर होशियार-मज़बूर, चतुर-चालाक और  धूर्त लोगों को
           नौकरियाँ देती हैं। बदले में सरकारों से ना-जाएज़ सहूलियतें हासिल करती हैं।

दादा : फिर लोगों को इंसाफ़ कैसे मिलेगा ? चंदा सरकारों को लाचार बना देता है।

पोता : कुछ लोग एनजीओ के ज़रिये अपना और देश का हित साध रहे हैं,
           मानवाधिकारों के लिए लड़ रहे हैं। अब तो भारत सरकार ने क़ानून बना
           दिया है -
          "सन 1976 से अब तक राजनैतिक दलों द्वारा स्वीकार किये गये अवैध
           विदेशी चंदे की कोई जाँच नहीं होगी।"

दादा : तुम्हारी बातों से मेरा मन व्यथित हो चला है। अब मुझे अकेला छोड़ दो
          ताकि उन बिलखते  परिवारों, घायलों और  जान क़ुर्बान करने वालों के
          लिए प्रार्थना कर सकूँ।

( दादा जी ध्यानमग्न हो गये , पोता सोशल मीडिया पर ऑनलाइन प्रतिक्रिया लिखने में व्यस्त हो गया। )

#रवीन्द्र सिंह यादव       

शनिवार, 19 मई 2018

आओ! राष्ट्रीय-चरित्र पर मंथन करें.....

आओ!
मनगढ़ंत, मनपसन्द, मन-मुआफ़िक, मन-मर्ज़ी का 
इतिहास पढ़ें, 
अज्ञानता का विराट मनभावन 
आनंदलोक गढ़ें। 
आओ! 
बदल डालें 
सब इमारतों,गलियों,शहरों, सड़कों, संस्थानों के नाम, 
लिख दें बस अपने-अपनों के नाम। 
आओ! 
बदल डालें 
कुछ क़ानून-क़ाएदे भी, 
होंगे दूरगामी फ़ाएदे भी।  
आओ! 
पाठ्यक्रम भी बदल डालें,
अपनों को उपकृत करें और बौद्धिक विकास में भी ख़लल डालें।  
आओ! 
पेपर लीक कर लें,
प्रतिभा को रौंदकर अपनी तिजोरी भर लें। 
आओ! 
कॉर्पोरेट के तलवे चाटें, 
राष्ट्रीय सम्पदा लुटाएं और चंदे की ख़ैरात को आपस में बाँटें।  
आओ!
बहुसंख्यक-अल्पसंख्यक खेल खेलें,
काटें नफ़रत से उगाई फ़सल व  बेलें। 
   
आओ!
राष्ट्रवाद का नगाड़ा बजाएं, 
शून्य से मुद्दों को पैदाकर अखाड़ा बनाएं।  
आओ!
नई पीढ़ी का भविष्य सँवारें,  
कैसे ???????????????????????
परिष्कृत ज्ञान और दक्षता के लिए 
कब तक विदेश के पाँव पखारें ??? 
आओ!
राष्ट्रीय-चरित्र पर मंथन करें, 
कल के लिए आत्मावलोकन करें।   

#रवीन्द्र सिंह यादव  

शनिवार, 12 मई 2018

मेहमान को जूते में परोसी मिठाई.....

समाचार आया है-

"इज़राइली राजकीय भोज में जापानी प्रधानमंत्री को 
जूते में परोसी मिठाई!" 
ग़ज़ब है जूते को  
टेबल पर सजाने की ढिठाई !!

दम्भ और आक्रामकता में डूबा 
एक अहंकारी देश 
भूल गया है 
मेहमान-नवाज़ी का पाक परिवेश 

परोसता है मिठाई मेहमान को 
चॉकलेट से बने जूते में 
आधुनिकता की अंधी दौड़ में 
इस रचनात्मक (?) मज़ाक़ के 
सांस्कृतिक निहितार्थ समझना 
नहीं है इनके बूते में ! 

#रवीन्द्र सिंह यादव 

शब्दार्थ /WORD  MEANINGS 
ग़ज़ब  = क्रोध, प्रकोप, ग़ुस्सा / ANGER, FURY, RAGE 

ढिठाई = धृष्टता, ढीठपन, गुस्ताख़ी / AFFRONT, ARROGANCE 

दम्भ = पाखण्ड, ढोंग, कथनी-करनी का अलग-अलग होना  /                                  HYPOCRISY 

मेहमान-नवाज़ी = अतिथि-सत्कार  / HOSPITALITY 

पाक = पवित्र, शुद्ध / PURE, HOLY

परिवेश =  माहौल, वातावरण, परिधि / SURROUNDING 

रचनात्मक = निर्माण / रचना सम्बन्धी / CREATIVE,                                                CONSTRUCTIVE 

मज़ाक़ = परिहास, खिल्ली / TEASE  

शुक्रवार, 4 मई 2018

बैसाख में मौसम बेईमान





कहीं बादल रहे उमड़
कहीं आँधी रही घुमड़
अब आ गयी धूप 
चुभती चिलचिलाती
अब सूखे कंठ से 
चिड़िया गीत न गाती


कोयल को तो मिल गया 
आमों से लकदक  बाग़
कौआ ढूँढ़ रहा है मटका 
गाता फिरे बेसुरा राग




चैतभर काटी फ़सल  
बैसाख में खलिहान 
आसमान को ताकता 
बेबस निरीह किसान 

बदला  रुख़  आसमान का 
आँधी-पानी का हो-हल्ला
उड़ जाता  भूसे का ढेर 
गीला होता सारा  गल्ला

आँधियाँ ले लेती हैं 
कितनों की जान 
क़ुदरत कब होगी मेहरबाँ?
कठिन दौर में होता अक़्सर
क्यों मौसम भी बेईमान ?
#रवीन्द्र सिंह यादव 

शब्दार्थ / WORD MEANINGS 
खलिहान = वह स्थान जहाँ फ़सल को काटकर एकत्र किया जाता है / BARN  
गल्ला = अनाज , अन्न / FOOD GRAINS 

गुरुवार, 3 मई 2018

नींद


बचपन में समय पर

आती थी  नींद,

कहानी दादा-दादी की 

लाती थी नींद। 

अब आँखों में

किसी की तस्वीर बस गयी है,

नींद भी क्या करती

कहीं और जाकर बस गयी है।

#रवीन्द्र सिंह यादव



शनिवार, 28 अप्रैल 2018

न्याय-तंत्र ही माँगे न्याय...

लोकतंत्र का एक खम्भा 
कहलाती न्याय-व्यवस्था, 
न्याय-तंत्र ही माँगे न्याय
    आयी कैसी जटिल अवस्था।    
इंसाफ़ के लिए 
वर्षों से 
लाचार 
जनता तड़पती देखो,  
वर्चस्व के लिए 
अब आपस में  
न्याय-व्यवस्था 
झगड़ती देखो।
सत्ता और 
न्याय-व्यवस्था में 
दोस्ती और 
साँठगाँठ का अनुमान,
गुज़रेगा यह 
दुश्वारियों का दौर भी  
फ़ैसले करेंगे दूर 
फ़ुतूर और गुमान।

#रवीन्द्र सिंह यादव 


सोमवार, 23 अप्रैल 2018

ज़िंदगी का सफ़र


रस्म-ए-वफ़ा निभाने की 
कोशिशें  करते रहे ,
हर क़दम पे पुर-असर 
नुमाइशें करते रहे।

सुलगती याद 
फैली हुई है चार सू,
ग़म-ज़दा होने की और 
फ़रमाइशें करते रहे।

उन प्यारी निगाहों में 
जला दिये ग़म के दिये,
अपने लिये इश्क़ में 
हज़ार बंदिशें करते रहे।

आरज़ू के साथ-साथ


मायूसियाँ भी चलीं,
मोहब्बत की राह में 
गुंजाइशें करते रहे।

वो आइना जिसमें 
 छाये थे जल्वे ही जल्वे,
गवारा उसकी सब
 रंजिशें करते रहे।

वक़्त-ए-गर्दिश की 
लकीर से अलाहिदा,
ज़ख़्म-ए-वफ़ा की 
पैमाइशें करते रहे।

बेहया बादल न आये  
एक पुराना ज़ख़्म धोने,
वक़्त-बे-वक़्त आँसू  
बारिशें करते रहे।  

हवाऐं आती रहीं 
मोहब्बत के जज़ीरे से,
हम दफ़्न अपनी 
 ख़्वाहिशें करते रहे।   

#रवीन्द्र सिंह यादव

शब्दार्थ / WORD MEANINGS 


रस्म-ए-वफ़ा = वफ़ादारी का दस्तूर / FAITHFULNESS'S RITUAL  

नुमाइशें (नुमाइश) = प्रदर्शनी / SHOW , EXHIBITIONS  

पुर-असर=पूरी तरह असरदार / FULLY  EFFECTIVE 


सू= ओर ,से , तरफ़ ,दिशा  / DIRECTION ,SIDE  

ग़म-ज़दा = उदास, अवसादग्रस्त / MELANCHOLIC 


फ़रमाइशें (फ़रमाइश) = अनुरोध / REQUEST  

बंदिशें (बंदिश) = रोक,बंधन,सीमा-बंधन,संयम / RESTRICTION  


मायूसियाँ (मायूसी) = निराशा / DISAPPOINTMENT


आरज़ू = चाहत, इच्छा, मनोकामना / DESIRE ,WISH  


गुंजाइशें (गुंजाइश ) = क्षमता / CAPACITY 


जल्वे (जल्वा ) = रौशनी / LUSTRE ,SOFT GLOW , SHINE  


गवारा = सहने योग्य / TOLERABLE, BEARABLE


रंजिशें (रंजिश) = बैर, विरोध, शत्रुता / HOSTILITY 


 वक़्त-ए-गर्दिश = बुरा समय, कठिन दौर / Movement of time  

लकीर = रेखा ,पंक्ति / LINE, STREAK  


अलाहिदा = अलग, पृथक / DIFFERENT, SEPARATE, APART   


ज़ख़्म-ए-वफ़ा = वफ़ादारी का घाव / SORE / GASH OF                                                    CONSTANCY  

पैमाइशें (पैमाइश) = माप, नापतौल / MEASUREMENT 

बे-वक़्त  = समय से पूर्व, तय समय से पहले / UNTIMELY 

वक़्त-बे-वक़्त  = कभी भी , किसी भी समय, किसी भी मौक़े पर / ANY                                TIME  


जज़ीरे (जज़ीरा) = द्वीप / ISLANDS 

शनिवार, 21 अप्रैल 2018

तस्वीर

वर्षों से दीवार पर टंगी 

तस्वीर से 

धूल साफ़ की 

आँखों में 

करुणा की कसक 

हया की नज़ाकत 

मुस्कान के पीछे 

छिपा  दर्द 

ये आज भी फीके कहाँ  

चीज़ों की उम्र होती है 

प्रेम की कहाँ 

लेकिन आँखों ने 

इशारों में कहा है 

अब प्रेम का दायरा 

सिकुड़ता जा रहा है। 

#रवीन्द्र सिंह यादव 

बुधवार, 18 अप्रैल 2018

सुमन और सुगंध

सुगंध साथ सुमन के 

महकती 

ख़ुशी से रहती है, 

ये ज़ंजीर न बंधन के 

चहकती 

ख़ुशी से रहती है। 

फूल खिलते हैं 

हसीं रुख़ देने 

नज़ारों को,  

तितलियाँ 

आ जाती हैं 

बनाने ख़ुशनुमा 

बहारों को। 

कभी  ढलकता है 

कजरारी आँख से 

उदास  काजल, 

कहीं रुख़ से 

सरक जाता है 

भीगा आँचल। 

परिंदे भी आते हैं  

ख़ामोश चमन में 

पयाम-ए-अम्न लेकर, 

न लौटा कभी 

गुलिस्तान  से 

भारी मन लेकर।  

#रवीन्द्र सिंह यादव 

शब्दार्थ / WORD  MEANINGS 

सुगंध = महक, ख़ुशबू / FRAGRANCE 

सुमन = पुष्प , फूल / FLOWER 

ज़ंजीर= साँकल ,शृंखला / CHAIN 

,हसीं = सुन्दर ,ख़ूबसूरत / BEAUTIFUL 

कजरारी आँख = आँख जिसमें काजल लगा हो , काजलयुक्त आँख / EYE WITH KOHL 

रुख़ = चेहरा ,दृटिकोण , चेहरे पर नज़र आने वाला भाव, दिशा  /  FACE , APPEARANCE, DIRACTION  

चमन = बाग़/  FLOWER GARDEN  

पयाम-ए-अम्न= शान्ति का सन्देश / MESSAGE OF PEACE 

गुलिस्तान= बाग़ / FLOWER GARDEN 

गुरुवार, 12 अप्रैल 2018

मच्छर ने हवाई-यात्री को काटा !

समाचार आया है -
हवाई जहाज़ में 
मच्छर ने यात्री को काटा !
सनसनी-ख़ेज़ समाचार / ब्रेकिंग न्यूज़  
तब भी बनता 
जब हम पढ़ते- 
मच्छर को हवाई-यात्री ने काटा !!
मच्छर तुम कितने भाग्यवान हो 
सचमुच तुम बड़े बलवान हो 
साथ में भोले और नादान हो 
ख़तरों से अनजान हो 
लगता है तुम 
ग़रीबों का ख़ून पीते-पीते अघाये हो 
इसलिए उड़कर एयर-पोर्ट तक आये हो 
शायद  तुम्हें अपनी जान प्यारी नहीं 
भ्रम  है  तुम्हारा 
तुम्हें निबटाने की यहाँ कोई तैयारी नहीं 
मासूमों पर बर्बर अत्याचार 
गैंग रेप 
हत्या
भ्रष्टाचार
भूख से मौत
पुलिस-अत्याचार 
सरकारी भेदभाव  
बेकारी का फैलाव 
ज़हरीली हो रही दमघोंटू  हवा 
दहशत-नफ़रत घुली  आब-ओ-हवा 
अनिश्चित भविष्य से व्यथित युवा 
सरकारी अस्पतालों से  ग़ायब दवा 
क़र्ज़ से घबराकर मरते किसान 
अघोषित युद्ध की क़ीमत चुकाते जवान  
  लोकहितकारी ख़बर
दबा दी जाती है 
हवाई यात्री को 
मच्छर काटने की ख़बर 
सुर्ख़ियाँ बना दी जाती है। 
हम यह ख़बर 
बड़े चाव से पढ़ते हैं 
ख़बर के बग़ल में छपे विज्ञापन 
हमारी जेब पर बहुत भारी पड़ते हैं। 
#रवीन्द्र सिंह यादव 

विशिष्ट पोस्ट

दिल की ख़लिश

रोते-रोते  ख़त लिखा  अश्क़ों का दरिया बह गया  हो गये  अल्फ़ाज़ ग़ाएब  बस कोरा काग़ज़ रह गया दिल की  नाज़ुक कश्ती में  गीले जज़्बात रख...