मंगलवार, 6 नवंबर 2018

साँसें दिल्ली में (वर्ण पिरामिड)

ये 
स्मोग
श्वसन 
दमघोंटू 
छाया हवा में 
धुआँ-केमिकल 
प्रदूषण  का  फल। 


ये 
जानो 
पीएम* 
सूक्ष्म कण 
चालीस गुना 
बाल से महीन 
टू  पॉइंट  फाइव। 



है 
फैला 
ज़हर 
शरीर में 
खींचते हवा 
ज़िन्दगी के लिये 
धुंध  ही   प्राणवायु। 


ले 
आया 
बाज़ार 
समाधान 
साँस के लिये 
ख़रीदो मास्क या 
वायु    प्यूरीफायर।


है 
कौन 
जो देगा 
शुद्ध हवा 
पक्की गारण्टी
सोती     सरकार 
विवश    नागरिक। 


क्या 
आप 
दायित्व 
निभायेंगे 
पर्यावरण 
बचाना चुनौती 
दिल्ली रण भीषण। 


है 
दिल्ली 
आसरा 
आते लोग 
बसते जाते 
रोज़ी-रोटी नाम 
रोती  अंधी  सुरंग।



ये 
कैसे 
पड़ोसी 
राजधानी 
ढकी स्मोग से  
जलाते      पराली 
कोसते      सरकार। 


वे  
नादाँ 
पटाखे 
जलाते हैं 
भेजते ख़ुशी 
दूर-दूर   तक 
बढ़ाते प्रदूषण। 


हैं 
ख़ुश 
डॉक्टर 
प्रदूषण 
रोगी बढ़ाता
टूटती साँसें भी 
अदा करेंगी बिल। 


© रवीन्द्र सिंह यादव 



पीएम* = PARTICULATE MATTER 2.5 (बाल की मोटाई से चालीस गुना छोटा सूक्ष्म कण ) साँस के लिये घातक कण 










सोमवार, 5 नवंबर 2018

भौतिक विकास

लोग कहते हैं

ज़िन्दगी की रफ़्तार

तेज़ हो गयी है

बढ़ते पेड़-पौधे

सूरज-चाँद-तारे

दिन-रात

घोंसलों में लौटते पक्षी

गर्भावस्था

जंगल का स्वाभाव

आदर्शवाद से लगाव 

नदी का बहाव

समुद्री ज्वार-भाटा  

साँसों की गति

ह्रदय की धड़कन 

जैसे थे कम-ओ-बेश वैसे हैं

अहम् का टकराव

कृत्रिमता का फैलाव

लोभ की रफ़्तार

भौतिकता का पड़ाव

प्राकृतिक संसाधनों का दोहन 

कृत्रिमता का आरोहण 

पर्यावरण पर उदासीनता 

प्रदूषण पर दीनता 

का प्रभाव 

इतना तेज़ हुआ है

कमाने पैसा दो-चार

इंजेक्शन से बढ़ाते हैं

सब्ज़ियों  का  भार

भौतिक विकास की आँधी में

संस्कारविहीनता के अंधड़ में 

मानवता रही बार-बार हार

एकत्र किये हैं परमाणु हथियार 

विलुप्त हो जाय दुनिया कई बार। 

© रवीन्द्र सिंह यादव

शुक्रवार, 2 नवंबर 2018

प्रकृति को आने दो घर-द्वार

मन भर मन पर भार 

चल नहीं पाते उठाकर 

अब हम क़दम दो-चार 

पूर्वाग्रही सूचनाओं की 

आयी अजब  भरमार 

कहते फिर भी हम उसे 

निर्भीक  निष्पक्ष अख़बार 

ज़ेहनियत होती जाती बीमार 

समाया रग-रग में भ्रष्टाचार 

नैतिकता बेबस खड़ी उस पार

बदल गया है क़ायदा कारोबार

कहीं पौ-बारह कोई हुआ लाचार    

मन पर बढ़ता क्रोध का अम्बार 

परे होंगे त्रासद मनोविकार 

आओ छेड़ें सरगम के तार 

प्रकृति को आने दो घर-द्वार

सुनो बच्चों की चुलबुली पुकार

भरेगा भावुक ह्रदय  में प्यार।

© रवीन्द्र सिंह यादव



गुरुवार, 1 नवंबर 2018

माँ (वर्ण पिरामिड)


माँ  
सृष्टि 
स्पंदन  
अनुभूति 
सप्त स्वर में 
गूँजता संगीत 
वट वृक्ष की छाँव।  


माँ 
आँसू 
ममता 
सम्वेदना 
गोद में लोक 
जीवन  आलोक
निर्झर-सा प्रवाह। 


माँ 
शब्द 
क़लम 
रचना  है 
कैनवास है 
सनी है रंग में  
कूची चित्रकार की। 


माँ 
बीज 
फ़सल 
खलिहान 
रोपती गुण 
काटे अवगुण 
शक्ति का अवतार। 


माँ 
थामे 
अँगुली 
देती ज्ञान 
मिथ्या संसार 
चरित्र निर्माण 
संस्कारवान जीवन। 


माँ 
फूल 
महक
बग़िया में 
मोहक  कूक   
पालती उसूल 
दे थपकी गा लोरी।  

© रवीन्द्र सिंह यादव


सोमवार, 29 अक्तूबर 2018

#MeeToo मी टू सैलाब ( वर्ण पिरामिड )


ये 
मी टू 
ले आया 
रज़ामंदी 
दोगलापन 
बीमार ज़ेहन 
मंज़र-ए-आम पे !



वो 
मर्द 
मासूम 
कैसे होगा 
छीनता  हक़ 
कुचलता रूह 
दफ़्नकर ज़मीर !



क्यों 
इश्क़ 
रोमांस 
बदनाम 
मी टू सैलाब 
लाया है लगाम 
ज़बरदस्ती को "न"



न 
मानो 
सामान 
औरत को 
रूह से रूह 
करो महसूस 
है ज़ाती दिलचस्पी। 



है 
चढ़ी  
सभ्यता 
दो सीढ़ियाँ 
दिल हैं ख़ाली 
तिजोरियाँ भरीं 
भौतिकता है हावी। 


हो 
तुम 
बौड़म 
मानते हो 
होठों पर न 
स्त्री के दिल में हाँ 
बे-बुनियाद    सोच। 

© रवीन्द्र सिंह यादव

शुक्रवार, 26 अक्तूबर 2018

जंगल में आग



जंगल की राजधानी  में


अचानक 

शरद ऋतु में 

गर्मी बढ़ी

हुई हवा से 

नज़ाकत नमी नदारत 

साँसों में बढ़ती ख़ुश्की 

बहुत हलकान ज़िन्दगी 

झरे पीले पत्ते पेड़ों से 

घाम में घिसटती घास 

तपन से मुरझा गयी

गर्म हवा ने रुख़ किया 

अपने आसमान का 

दबाव क्षेत्र निर्मित हुआ 

ठंडी हवा गर्म हवा का 

ख़ाली स्थान भरने 

प्रचंड वेग से बही 

सुदूर से आती हवा 

तीव्र तूफ़ान बनी 

विशाल वरिष्ठ वृद्ध वृक्षों की 

वक्र शुष्क टहनियाँ 

बाँस के गगनचुम्बी झुरमुट 

रगड़ने लगे आपस में 

चिंगारियाँ लम्बी हुईं 

उड़ने लगे पलीते 

दहकने लगे शोले 

सूखी घास सहायक हुई

जंगल में फैल गयीं 

आक्रामक आग की लपटें 

छा गया धुआँ ही धुआँ हर सू 

मासूम वन्य जीव 

जलकर टोस्ट बन गये 

जंगल का राजा सोता रहा 

सुरक्षित महल-सी माँद में 

पर्याप्त भोज्य भंडार के साथ 

अधजले घायल प्राणी

निकाल रहे थे भड़ास 

अपने निकम्मे गुप्तचर तंत्र पर 

माँद में भरा धुआँ 

बढ़ी असहनीय तपिश 

तब खाँसते हुए 

वनराज बाहर आया 

कराहते प्राणियों की पीड़ा देख 

मन ही मन ख़ुश हुआ 

अगले पल भावी भोजन की

गहन चिंता में मग्न हुआ 

जंगली मीडिया फूला समाया 

देखकर अपने पापों के सबूत

जलकर राख होने की 

प्रबल सम्भावना पर 

सुलगते भयावह जंगल को देख 

सजग सक्रिय बुद्धिजीवियों ने 

चिंतन बैठक आयोजित की 

सरकार से हवाई बौछार का 

विनम्र आग्रह किया 

पर्यावरणप्रेमी आगे आये 

हरियाली के झंडे बैनर लिये।
  

 © रवीन्द्र सिंह यादव

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साँसें दिल्ली में (वर्ण पिरामिड)

ये   स्मोग श्वसन   दम घोंटू   छाया हवा में   धुआँ - केमिकल   प्रदूषण   का   फल।   ये   जानो   पीएम*   सूक्ष्म कण   चालीस...