शुक्रवार, 8 दिसंबर 2017

अश्क़ का रुपहला धुआँ


बीते वक़्त की 

एक मौज लौट आयी, 

आपकी हथेलियों पर रची

हिना फिर खिलखिलाई। 



मेरे हाथ पर 

अपनी हथेली रखकर 

दिखाये थे 

हिना  के  ख़ूबसूरत  रंग, 

बज उठा था 

ह्रदय में 

अरमानों का जलतरंग।



छायी दिल-ओ-दिमाग़ पर 

कुछ इस तरह 

भीनी महक-ए-हिना, 

सारे तकल्लुफ़ परे रख 

ज़ेहन ने 

तेज़ धड़कनों को 

बार-बार गिना।   




अदृश्य हुआ 

रेखाओं का 

ताना-बाना बुनता 

क़ुदरत का जाल,

हथेली पर 

बिखेर दिया 

हिना ने अपना 

रंगभरा इंद्रजाल। 




शोख़ निगाह 

दूर-दूर तक गयी, 

स्वप्निल अर्थों के 

रंगीन ख़्वाब लेकर 

लौट आयी। 



लबों पर तिरती मुस्कराहट 

उतर गयी दिल की गहराइयों में, 

गुज़रने लगी तस्वीर-ए-तसव्वुर 

एहसासों की अंगड़ाइयों में। 



एक मोती उठाया 

ह्रदय तल  की गहराइयों से, 

आरज़ू के जाल में उलझाया 

उर्मिल ऊर्जा की लहरियों से। 




उठा ऊपर

आँख से टपका 

गिरा........ 

रंग-ए-हिना से सजी 

ख़ूबसूरत हथेली पर, 

उभरा अक्स उसमें 

फिर उमड़ा 

अश्क़  का रुपहला धुआँ 

लगा ज्यों 

चाँद उतर आया हो 

ज़मीं  पर ........! 

#रवीन्द्र सिंह यादव 


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