शुक्रवार, 26 मई 2017

सरिता

नदी  का  दर्द... 


कल-कल  करती करवटें बदलती बहती सरिता

का आदर्श  रूप

हो गयी  अब  गए  दिनों  की  बात ,


स्वच्छ  जलधारा  का  मनभावन  संगीत

हो  गयी  अब  इतिहास  की  बात।


शहरीकरण  की आँधी  में

गंदगी  को  खपाने  का

एकमात्र  उपाय / साधन 

एक  बे-बस  नदी  ही  तो  है,

पर्यावरण  पर  आँसू  बहाने  के  लिए

सदाबहार  बहुचर्चित ज्वलंत मुद्दा  

हमारे  द्वारा  उत्पादित  गन्दगी  ही  तो  है।




Yamuna River At Etawah (Uttar Pradesh)


खुले  में  पड़ा  मल  हो

या


सीवर  लाइन  में  बहती  

हमारे द्वारा उत्पादित  गंदगी,

समाज  की  झाड़न  हो

या


बदबूदार  नालों  में  बहती  बजबजाती  गंदगी

सब पहुँचते  हैं  

एक  निर्मल  नदी  की  पवित्रता भंग  करने


जल  को  विषाक्त / प्रदूषित   बनाने।


नदी  के  किनारों  पर

समाज  का  अतिक्रमण,


है  कुंठित  मानवीय  चेष्टाओं  का  

भौतिक  प्रकटीकरण।

प्रपंच के  जाल  में  उलझा  मनुष्य

नदी  के  नाला  बनने  की  प्रक्रिया  को


 देख  रहा  है  लाचारी  से,

नदियों  के  सतत  सिमटने  का  दृश्य

फैलता  जा  रहा  है  पूरी  तैयारी  से।


नदी  के  किनारे  बैठकर

 कविता  रचने  की  उत्कंठा

जर्जर पंख फड़फड़ाकर दम तोड़  रही है,

बहाव  में  छिपी  ऊर्जा को 

मनचाहा रूप  देने के वास्ते 


नदी की धारा भौतिकता मोड़ रही है।


नदी से अब पवित्र विचारों का झौंका नहीं

नाक सिकोड़ने को विवश करता

सड़ांध का ग़ुबार  उठता  है,

हूक  उठती  है  ह्रदय  में

नदी  के  बिलखने  का 

करुण स्वर उभरता है।


नदी अपने  उदगम  पर  पवित्र  है


लेकिन......

आगे  का  मार्ग

गरिमा  को  ज़ार-ज़ार  करता है,


 बिन बुलाये मिलने आ रहा

गंदगी  का  अम्बार


गौरव  को  तार-तार  करता है।


नदी  चीख़ती  है 

कराहती  है

तड़पती है 

कहती  है -


"ज़हरीले रसायन, मल, मूत्र, मांस, मलबा...प्लास्टिक और राख

क्यों मिलाये जा रहे हैं मुझमें...?



मासूम  बचपन  जब  मचलता  है

नदी  में  नहाने  को / जलक्रीड़ा को 

देख  समझकर  मेरा  हाल


कहता  है  मुझे  गंदा  नाला


और  रोक  लेता  है  

अपनी  चंचलता  का  विस्तार

कोई  बताएगा  मुझे...!


आप, तुममें  से


किसी  मासूम  को  न  समझा  पाने  में 


मेरा  दोष  क्या  है ?


©रवीन्द्र  सिंह यादव



गुरुवार, 25 मई 2017

नज़दीकियाँ



ज़रा-ज़रा  सी   बात   पर

रूठना, मचलना  भा गया ,

देखने   चकोर   चाँद   को

नदी   के  तीर  आ  गया। ........ (1)


गुफ़्तुगू    न   सुन    सके

कोई  मिलन  न  देख  ले,

दो    दिलों  के  आसपास

बन  के  शामियाना  कोहरा  छा  गया।

देखने  चकोर  चाँद  को

नदी  के  तीर  आ  गया। ........ (2)


ये     घड़ी     रुकी     रहे

रात    जाए   अब   ठहर,

दीवानगी  का ये  ख़याल

बेताबियों  को  भा  गया।

देखने   चकोर  चाँद  को

नदी  के  तीर   आ  गया। ......... (3)


ज़िन्दगी     की      राहों     में

फूल      हैं     तो     ख़ार    भी  ,

पयाम    एक   फ़ज़ाओं    का  

मरहम ज़ख़्म  पर लगा गया।

देखने      चकोर     चाँद    को

नदी     के    तीर   आ     गया। ........ (4)


तमन्नाऐं    बन  के    रौशनी

जगमगाती  हैं    डगर -डगर ,

बेख़ुदी     के        दौर       में

भूली  राह  कोई  दिखा गया।

देखने   चकोर      चाँद    को

नदी  के    तीर   आ     गया। ........ (5)

@रवीन्द्र सिंह यादव

इस रचना को सस्वर सुनने के लिए लिंक -
https://youtu.be/s0aRSv3IenI

शब्दार्थ / WORD  MEANINGS -

ज़रा = थोड़ी ,थोड़ा ,A  Bit 

चकोर = तीतर की भांति दिखने वाला पक्षी जो साहित्य में चन्द्रमा के प्रेमी के रूप में वर्णित है ,Alectoris          chukar 

तीर = किनारा ,बाण , River Bank 

गुफ़्तुगू =बातचीत ,Speech ,Conversation 

शामियाना = मंडप ,वितान ,छत्र , Canopy  ,Awning 

कोहरा = कुहासा ,Fog,Mist 

घड़ी = पल , moment 

दीवानगी = पागलपन , होश-ओ हवास  खोना -Madness  ,Insanity

ख़याल = विचार ,Thought ,Idea 

बेताबियाँ = बेसब्री,बेचैनी  ,Restlessness 

ख़ार = काँटा  , A Thorn 

पयाम = संदेश , Message 

फ़ज़ाओं =  वातावरण ,Weather, Atmosphere 

तमन्नाऐं = इच्छाएँ ,Desires 

डगर = रास्ता ,Path ,Road 

बे-ख़ुदी = स्वयं को भूल जाना ,Intoxication 


मंगलवार, 16 मई 2017

इंतज़ार



पतंगे   आएंगे  जलने  सीने में

जिनके सुलगती आग है बाक़ी , 

सुनो     संगीत     जीवन    का 

मनोहर  राग  है  बाक़ी।   (1)




भेजा है ख़त  बहार  ने  लिख 

आ          रही         हूँ        मैं,

जहाँ   पहुँची  नहीं    दुनिया  

अभी  एक  बाग़   है    बाक़ी।  

सुनो   संगीत   जीवन    का 

         मनोहर    राग    है     बाक़ी।   (2) 




कभी    मिलते   नहीं   साहिल 

सिमट    जाती     हैं     दूरियाँ,

सूखी       एक      नदिया       है 

    समुंदर  सा  अनुराग  है  बाक़ी।    

सुनो    संगीत    जीवन      का 

   मनोहर    राग    है   बाक़ी।   (3) 




चुरा   लाओ   कहीं  से   तुम

छलकती   आँख   का  पानी,  

धो  सकूँ    दामन  पर  लगा

 एक  गहरा  दाग़  है   बाकी।  

सुनो   संगीत   जीवन    का 

           मनोहर    राग    है   बाक़ी।  (4 )  




सैयाद  की  मर्ज़ी से मायूसियों में 

घिर      जाना     बेहतर       नहीं ,

पहुँचो मक़ाम   तक   महफूज़  है 

रहनुमा   जो   बेदाग़    है    बाक़ी। 

सुनो      संगीत      जीवन     का 

     मनोहर    राग    है     बाक़ी ।    (5)  




अंधेरों  में सन्नाटों  का  निज़ाम 

डराए      जब     कभी     तुमको 

देख  लेना   आँधियों     में     भी  

जल  रहा  एक  चराग़  है  बाक़ी।

सुनो      संगीत     जीवन     का 

    मनोहर   राग    है    बाक़ी।     (6)  

    

बदलेगा   वक़्त  सुहानी  भोर   का  

              सुरमई       संगीत       लेकर,                 

निकलेगा  चाँद    फिर   अरमानों   का 

सहरा में  चमन  का  सुराग  है  बाक़ी। 

सुनो         संगीत         जीवन     का 

 मनोहर   राग     है     बाक़ी।    (7)  

@रवीन्द्र  सिंह यादव



रविवार, 7 मई 2017

सत्ता


जनतंत्र में अब 
कोई राजा नहीं
कोई मसीहा नहीं
कोई महाराजा नहीं
बताने आ रहा हूँ मैं,
सुख-चैन से सो रही सत्ता
 जगाने आ रहा हूँ मैं ।  

तेरे दरबार में इंसान 
कुचला पड़ा है,
तेरे रहम-ओ-करम पर
क़ानून बे-बस खड़ा है,
तेरे वैभव की
चमचमाती चौखट की चूलें
हिलाने आ रहा हूँ मैं ।
सुख-चैन से सो रही सत्ता
 जगाने आ रहा हूँ मैं ।  

संवेदना को रौंदकर
शोर के ज़ोर को  
आगे बढ़ाती जा रही है तू ,
भीड़ को  उन्माद का  
रस पिलाती जा रही है तू ,
तेरी औक़ात-ओ -शान को     
दर्पण दिखाने आ रहा हूँ मैं।
सुख-चैन से सो रही सत्ता
 जगाने आ रहा हूँ मैं ।   

देखे हैं अब तक मैंने 
तेरे यार-दोस्त सभी ,
इनमें होते नहीं शामिल
दुखियारा / दुखियारी कभी ,
जाँघ कट जाने पर 
कमर से लकड़ी बाँधकर
हल जोतते किसान की पीड़ा
सुनाने आ रहा हूँ मैं ।
सुख-चैन से सो रही सत्ता
 जगाने आ रहा हूँ मैं ।    


मेरा हक़ मारकर 
छकों को दे रही है तू
नाव / पतवार हमारी 
बैठाकर किसे खे रही है तू..?
भूख से व्याकुल बच्चों की 
तड़प न सह पाने पर 
एक माँ  के आग में 
जल जाने की जलन / तपन
महसूस कराने आ रहा हूँ मैं ।
सुख-चैन से सो रही सत्ता
 जगाने आ रहा हूँ मैं ।   

बेकारी के दौर में  दर-दर भटकते
मायूस हैं युवामन,
नैराश्य के ख़ंजर ने 
घायल कर दिए यौवन ,
अभावों में मचलते 
स्वाभावों का गणित
पढ़ाने आ रहा हूँ मैं ।
सुख-चैन से सो रही सत्ता
 जगाने आ रहा हूँ मैं ।  

दरिंदों की  हवस ने
जीवन  तबाह  कर  डाले हैं कई,
स्त्री-जीवन में  क्यों 
रोज़ चुभते हैं भाले कई,
रोज़ मर-मरकर जीने   की  
टीस और दर्द का एहसास
सुनाने आ रहा हूँ मैं ।
सुख-चैन से सो रही सत्ता
 जगाने आ रहा हूँ मैं ।  

राज करने का लायसेंस  
तेरा क़ाएम रहे तो...       
लड़ाती है हमें 
आपस में बैर रखने को, 
कहती है होकर ज़ालिम तू
मज़लूम पर पैर रखने को ,
तेरी मर चुकी ग़ैरत 
ज़िंदा कराने आ रहा हूँ  मैं।
सुख-चैन से सो रही सत्ता
 जगाने आ रहा हूँ मैं।  

तेरे आत्ममुग्धी फ़ैसलों से 
जनता तकलीफ़ में पड़ती जा रही है,
किसी का घर भर दिया तूने
ग़रीबों से रोज़ी बिछड़ती जा रही है,
तेरी बदमाशियों का चिट्ठा
लटकाने ललाट पर तेरे आ रहा हूँ मैं।
सुख-चैन से सो रही सत्ता
 जगाने आ रहा हूँ मैं।   


झौंक दिया सारा जीवन 
औरों के सुख की चाह में ,
 देश का निर्माण करने 
गढ़ गया हूँ थाह में,
श्रेय लेने की बे-हयाई तुझे मुबारक़  
स्वराज के मर्म का परचम
लहराने आ रहा हूँ मैं।
सुख-चैन से  सो रही सत्ता
 जगाने आ रहा हूँ मैं ।   
@रवीन्द्र  सिंह यादव



शब्दार्थ / Word  Meaning 
जनतंत्र   = लोकतंत्र ,Democracy
 मसीहा  = दुःख - दर्द हरने वाला ,Healer
रहम-ओ -करम = मेहरबानी ,Grace & favour, MERCY & KINDNESS
बे-बस = शक्तिहीन ,Powerless
वैभव=शान -शौकत ,भव्यता ,Wealth ,Grandeur
चौखट = किवाड़ों  की चौखट , Door frame
चूलें = जोड़ ,Dovetail ,Joints
उन्माद =ज़ुनून ,सनक ,पागलपन ,Hysteria ,Madness ,Mania
औक़ात-ओ -शान = क्षमता और गर्व ,Status /Capacity &Pride
जांघ = जंघा ,Thigh
छकों = छके हुए ,मन भर कर खाये हुए ,तृप्त ,संतृप्त ,Fulfillment ,Saturated ,wealthy persons
ख़ंजर= कटार , DAGGER
खे = नाव खेने (Moving Boat ) की क्रिया
अभाव = कमी , अनुपलब्धता,Scarcity ,Unavailability
ज़ालिम = दुष्ट ,cruel
मज़लूम = घायल /पीड़ित , Injure ,Oppressed
आत्ममुग्धी = ख़ुद को प्रसन्न करने वाले ,Self pleasent
महरूम = वंचित ,Deprived ,Prohibited
ललाट = ,Forehead
थाह =गहराई ,Depth
बे-हयाई   = बेशर्मी   ,निर्लज्जता ,धृष्टता , Being Shameless
परचम =ध्वज ,झंडा ,Flag

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 छतनार वृक्ष की छाया में    दो पल सुस्ताने का मन है, वक़्त गुज़रने की चिंता में  चलते रहने का वज़न है। कभी बहती कभी थमती है बड़ी मनमौजन है पुरवा...