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ख़िज़ाँ ने फिर अपना रुख़ क्यों मोड़ा है?

मिटकर मेहंदी को रचते सबने देखा है, उजड़कर मोहब्बत को रंग लाते देखा है? चमन में बहारों का बस वक़्त थोड़ा है, ख़िज़ाँ ने फिर ...