सोमवार, 6 फ़रवरी 2017

धीरे - धीरे ज़ख़्म सारे



धीरे -  धीरे     ज़ख़्म       सारे

अब      भरने    को   आ   गए ,

एक  बेचारा  दाग़ -ए -दिल  है

जिसको   ग़म   ही   भा    गए।



ज़िन्दगी     को     जब     ज़रूरत

उजियारे     दिन   की   आ    पड़ी,

लपलपायीं                 बिजलियाँ

गरजकर  काले  बादल  छा  गए। 

एक    बेचारा    दाग़ -ए -दिल  है

जिसको    ग़म    ही    भा    गए।




बाँसुरी      की    धुन    पे  थिरका

बृज   के    साथ    सारा   ज़माना,

श्याम   जब    राधा   से   मिलने

यमुना    तट   पर     आ      गए।

एक    बेचारा    दाग़ -ए -दिल   है

जिसको    ग़म    ही    भा    गए।




आज     फिर   आँगन     में    मेरे

नन्हीं      कलियाँ      खिल     रहीं,

गीत     फिर     इनको     सुनाओ

जो     दादी    नाना     गा      गए।

एक   बेचारा    दाग़ -ए -दिल   है

जिसको    ग़म    ही    भा    गए।




क्या      मनाएं      जश्न       हम

ज़िन्दगी       की     जीत       का,

बाँटने     को    थीं    जो      चीज़ें

हम     उन्हीं     को     खा     गए।

एक    बेचारा    दाग़ -ए -दिल   है

जिसको    ग़म    ही    भा     गए।

@रवीन्द्र  सिंह  यादव

इस रचना  को सस्वर  सुनने के लिए  लिंक - https://youtu.be/QdAzRuiZa8

4 टिप्‍पणियां:



  1. जी नमस्ते,

    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (0५ -१०-२०१९ ) को "क़ुदरत की कहानी "(चर्चा अंक- ३४७४) पर भी होगी।
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    आप भी सादर आमंत्रित है
    ….
    अनीता सैनी

    जवाब देंहटाएं
  2. बहुत अच्छी रचना सुंदर भावयुक्त आदरणीय।
    सादर।

    जवाब देंहटाएं
  3. बहुत सुंदर और भावपूर्ण अभिव्यक्ति।

    जवाब देंहटाएं

विशिष्ट पोस्ट

ख़िज़ाँ ने फिर अपना रुख़ क्यों मोड़ा है?

मिटकर मेहंदी को रचते सबने देखा है, उजड़कर मोहब्बत को रंग लाते देखा है? चमन में बहारों का बस वक़्त थोड़ा है, ख़िज़ाँ ने फिर ...