शुक्रवार, 6 जनवरी 2017

दूब


तूफ़ान  आएंगे,

सैलाब     आएंगे,

उखाड़ेंगे,

उड़ा ले जायेंगे 
  
उन्नत , उद्दंड    दरख़्तों    को।



दूब    मुस्कायेगी,

अपनी  लघुता / विनम्रता  पर ,

पृथ्वी    पर    पड़े-पड़े   पसरने    पर।



छाँव     न   भी  दे    सके    तो   क्या,

घात-प्रतिघात    की,

रेतीली     पगडंडी    पर,

घाम  की   तीव्र तपिश  से,

तपे     पीड़ा     के    पाँव,

मुझपर     विश्राम     पाएंगे,

दूब  को  दुलार  से  सहलायेंगे।

@रवीन्द्र  सिंह यादव    

1 टिप्पणी:

  1. दुर्वा तू हरीतिमा , अनंता ,अमृता , शतपर्वा -
    धरा के सीने से लिपटी तू मुस्काती सगर्वा,
    मंगल कारज ना सोहे तुम बिन -
    तूम शोभा उपवन की
    विनय का पर्याय बनी तुम
    तुम प्रिय गौरीनंदन की
    शुभता की अक्षुण प्रतीक बनी
    महौषधि , अटल ,दीर्घजीवी अपूर्वा--
    धरा के सीने से लिपटी तू मुस्काती सगर्वा,


    आदरणीय रविन्द्र जी ------ डूब की महिमा को दर्शाती आपकी पंक्तियों म को समर्पित कुछ उपरोक्त भाव मेरे भी | दुर्वा विनम्रता का दूसरा नाम है और धरा से शाश्वत नाता है इसका | गुरु नानक देव भी इसके महत्व को नकार ना सके और इसका उदाहरण दे कह उठे ---------
    नानकनी चाहो चले, जैसे नीची दूब
    और घास सूख जाएगा, दूब खूब की खूब।
    आपने बहुत सरलता से इसके महत्व को दर्शाया -------
    तपे पीड़ा के पाँव,
    मुझपर विश्राम पाएंगे,
    दूब को दुलार से सहलायेंगे।-------- बहुत ही सुंदर सृजन !!!!!!!!!!!!!

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