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शुक्रवार, 29 दिसंबर 2017

संविधान पर दादा और पोते के बीच संवाद ....


गाँव की चौपाल पर अलाव 

सामयिक चर्चा का फैलाव 

बिषयों का तीव्र बहाव 

मुद्दों पर सहमति-बिलगाव। 

बुज़ुर्ग दद्दू और पोते के बीच संवाद -

दद्दू : *****मुहल्ले से 

       रमुआ ***** को बुला  लइओ , 

       कब से नाली बंद है...   

पोता : आप मुहल्ले से पहले ,

          रमुआ  के  बाद....  

         जो शब्द जोड़कर बोल रहे हैं 

         अब ग़ैर-क़ानूनी  हैं 

         असंवैधानिक  हैं....  

दद्दू : ज़्यादा पढ़ -लिख लिए हो !

        रामू (रमुआ) का आगमन 

दद्दू :  (जातिसूचक  गाली देते हुए )

          क्यों रे *****रमुआ !

          तेरी इतनी औक़ात कि अब बुलावा भेजना पड़े !

पोता : दद्दू  आप क़ानून तोड़ रहे हैं .... 

          रमुआ  की शिकायत पर 

          संविधान आप दोनों के साथ इंसाफ़ कर सकता है.... 

दद्दू :   जीना हराम कर दिया है तेरे संविधान ने ..... 


पोता : हाँ, आप जैसों की चिढ़ को समझा जा सकता है।  
          समानता और बंधुत्व का विचार 
          आत्मसात कर लेने में बुराई क्या है। 
          हमारा संविधान ज़बानी जमा ख़र्च नहीं है 
          बल्कि लचीला और  लिखित है। 

दद्दू : हो गया तेरा लेक्चर !

पोता: एक सवाल और ......

          (दद्दू  से दूरी बनाते हुए

         गंदगी का आयोजन करने वाला बड़ा होता है 
         या उसे साफ़ करने वाला......?????
         (रामू नाली की सफ़ाई में जुट गया 
        और दद्दू  पोते के पीछे छड़ी लेकर दौड़े ........ )

# रवीन्द्र  सिंह यादव 

गुरुवार, 21 दिसंबर 2017

इश्क़ की दुनिया में ....


इश्क़ की दुनिया में

ढलते-ढलते रुक जाती है रात

हुक़ूमत दिल पर करते हैं जज़्बात

ज़ुल्फ़ के साये में होती  है शाम

साहब-ए-यार  के  कूचे से गुज़रे  तो हुए बदनाम

साथ निभाने का पयाम

वफ़ा का हसीं पैग़ाम

आँख हो जाती है जुबां हाल-ए-दिल सुनाने को

क़ुर्बान होती है शमा जलकर रौशनी फैलाने को

चराग़ जलते हैं आंधी में 

आग लग जाती है पानी में

आये महबूब तो आती है बहार

उसकी महक से महकते हैं घर-बार

सितारे उतर आते हैं ज़मीं पर

होते हैं ज़ुल्म-ओ-सितम सर-आँखों पर   

गुमां-ए-फंतासी में डूबा दिल

कहता है बहककर -

थम जा ऐ वक़्त !

बहुत प्यासा है दिल मोहब्बत का

अफ़सोस ! निष्ठुर है वक़्त

मारकर ठोकर इस याचना को

आगे बढ़ता रहता है

हमेशा की तरह..... 

#रवीन्द्र  सिंह यादव

रविवार, 17 दिसंबर 2017

शातिर पड़ोसी और हम ....



विस्तारवादी सोच का 

एक देश 

हमारा पड़ोसी है 

उसके यहाँ चलती तानाशाही  

कहते हैं साम्यवाद,

हमारे यहाँ 

लोकतांत्रिक समाजवाद के लबादे में 

लिपटा हुआ पूँजीवाद। 



इंच-इंच ज़मीं के लिए 

उसकी लपलपाती जीभ 

सीमाऐं लांघ जाती है, 

हमारी सेना 

उसकी सेना को बिना हथियार के 

उसकी सीमा में धकेल आती है। 



कविवर अटल जी कहते हैं-

"आप मित्र बदल सकते हैं  पड़ोसी नहीं",

शीत-युद्ध समाप्ति के बाद 

दुनिया में अब दो ध्रुवीय विश्व राजनीति नहीं। 



शातिर पड़ोसी ने 

भारत के पड़ोसियों को 

निवेश के नाम पर सॉफ़्ट लोन बांटे 

ग़ुर्बत  में लोन और भारी हो गए / हो जायेंगे 

सॉफ़्ट  से व्यावसायिक लोन हो गए / हो जायेंगे 

लोन न चुकाने पर 

शर्तें बदल गयीं / बदलेंगीं 

लीज़ के नाम पर कब्ज़ा होगा 

चारों ओर से भारत को घेरने का 

व्यावसायिक कारोबार के नाम पर 

युद्धक रणनीति का इरादा होगा 

और हम 

सांप्रदायिक उन्माद और नफ़रत के छौंक-बघार  लगी 

ख़ूनी-खिचड़ी चाव से खा रहे होंगे .... 

क्योंकि बकौल पत्रकार अरुण शौरी -

"इस देश की वर्तमान सरकार ढाई लोग चला रहे हैं।"

हैं ख़ुद मज़े में ढाई, जनविश्वास को धता बता  रहे हैं। 

# रवीन्द्र सिंह यादव 

शुक्रवार, 8 दिसंबर 2017

अश्क़ का रुपहला धुआँ


बीते वक़्त की 

एक मौज लौट आई, 

आपकी हथेलियों पर रची

हिना फिर खिलखिलाई। 



मेरे हाथ पर 

अपनी हथेली रखकर 

दिखाए थे 

हिना  के  ख़ूबसूरत  रंग, 

बज उठा था 

ह्रदय में 

अरमानों का जलतरंग।



छायी दिल-ओ-दिमाग़ पर 

कुछ इस तरह भीनी महक-ए-हिना, 

सारे तकल्लुफ़ परे रख ज़ेहन ने 

तेज़ धड़कनों को बार-बार गिना।   



निगाह 

दूर-दूर तक गयी, 

स्वप्निल अर्थों के 

ख़्वाब लेकर लौट आयी। 



लबों पर तिरती मुस्कराहट 

उतर गयी दिल की गहराइयों में, 

गुज़रने लगी तस्वीर-ए-तसव्वुर 

एहसासों की अंगड़ाइयों में। 



एक मोती उठाया 

ह्रदय तल  की गहराइयों से, 

आरज़ू के जाल में उलझाया 

उर्मिल ऊर्जा की लहरियों से। 




उठा ऊपर

आँख से टपका 

गिरा........ 

रंग-ए-हिना से सजी हथेली पर, 

उभरा अक्स उसमें 

फिर उमड़ा 

अश्क़  का रुपहला धुआँ 

लगा ज्यों 

चाँद उतर आया हो ज़मीं  पर ........! 

#रवीन्द्र सिंह यादव 


बुधवार, 29 नवंबर 2017

एक नाज़ुक-सा फूल गुलाब का ...


हूँ  मैं  एक  नाज़ुक-सा  फूल 
घेरे रहते हैं मुझे नुकीले शूल 

कोई तोड़ता पुष्पासन से 


कोई तोड़ता बस पंखुड़ी 
पुष्पवृंत से तोड़ता कोई 
कोई मारता बेरहम छड़ी  

कोई देता  है अपने महबूब को तोड़कर 
बिछा देता है कोई कुपात्र के क़दमों पर 
अर्पित  करता  है  कोई  ईष्ट  के  सर 
बिलखता हूँ मैं भी किसी के मरने पर। 

मिट जाता हूँ ख़ुशी-ख़ुशी बेहिचक औरों की ख़ुशी के लिए 
बनता है इत्र गुलकंद गुलाब-जल ज़माने की ख़ुशी के लिए 

मन-मस्तिष्क,नज़र और दिल 
सब पर मेरा ही राज  है 
मकरंद मेरा मधुमख्खियों को 
लगता मधुर साज़ है

ले जाती हैं वे बूंद-बूंद
क़रीने से एक छत्ता बनाने 
शहद की मधुरिम मिठास 
मतलबी संसार को चखाने   

छत्ते का मधुमय मोम  Lipstick में मिलकर 
खेलता है अठखेलियां गोरी के गुलाबी लबों पर 

भीनी ख़ुशबू में तर-बतर  होकर 
मीठे बोल फ़ज़ाओं में अदब से उतरते हैं 
आबोहवा की मधुर सदायें सुन लगता है 
समाज को जैसे  होंठों से फूल झरते हैं 


आशिक़-महबूबा की गुफ़्तुगू सुनता हूँ 
गुलशन में इश्क़ के सौदे रोज़ बुनता  हूँ 

शर्म-ओ-हया ,यकीं ,वफ़ा , इक़रार सब ज़िक्र हुए 
रेशमी मरमरी ख़्वाबों के चर्चे सरेआम बेफ़िक्र हुए 

अकेला आता कोई दिलजला 
तब  महसूसता हूँ धधकते शोलों की तपन
दिल की बाज़ी हारकर 
सुना जाता है अपने सीने की चुभन-जलन  

तितलियाँ,ततैया,भँवरे,मधुमख्खियाँ,कीट-पतंगे आते रहते मुझसे मिलने 
होंगे इनके अपने  मक़सद  संपन्न होता है परागण पीढ़ियां संसार में बढ़ने 

मृत्यु के भय से परे औरों के लिए मुस्कराते हैं फूल 
मुरझाने की नियति से कदापि नहीं घबराते हैं फूल 

ज़माना माने तो माने उन्हें बेवफ़ा 
मैं कैसे मानूँ  उन्हें अलग-थलग 
Break up के बाद तन्हा आये 
मज़बूरियाँ  बताने अलग-अलग 
वफ़ा का चराग़ रहेगा रौशन 
देखी  है  मैंने  उन आँखों में  
Purity  Of  Emotion!

#रवीन्द्र सिंह यादव 



शब्दार्थ / WORD MEANINGS 



नाज़ुक = अत्यंत कोमल,विनम्र,विनीत / DELICATE

शूल = काँटा ,कंटक / THORN 


पुष्पासन = फूल का निचला भाग जहाँ सभी भाग इससे जुड़े होते हैं इस  पर टिककर फूल खिलता /  RECEPTACLE 



पुष्पवृंत = डंठल जिससे फूल और डाली जुड़े होते हैं / STALK OF A  FLOWER 



पंखुड़ी = पाँख ,दल / PEPAL 



छड़ी =  STICK 



इत्र = ख़ुशबूदार तरल / PERFUME, ESSENCE , SCENT 



गुलकंद = सूखे गुलाब की पंखुड़ियों को पानी में शक्कर के साथ गर्म करके बना  मिठासभरा गाढ़ा उत्पाद  / CONSERVE OF ROSE PETALS



मकरंद = पराग / NECTOR 



मोम= मधुमख्खियों  के छत्ते का सम्पूर्ण स्पंजनुमा भाग जोकि उत्कृष्ट गुणवत्ता की लिप स्टिक बनाने में उपयोगी है / NATURAL WAX 



परागण (POLLINATION ) = फूलों में प्रजनन की प्रक्रिया जिसमें STAMEN (POLLEN GRAINS ) को एक फूल से दूसरे फूल या उसी फूल में STIGMA तक  पहुँचाने में कीट-पतंगों ,तितलियों आदि का महत्वपूर्ण योगदान होता है।  


लिपस्टिक (Lipstick ) = एक सौंदर्य प्रसाधन उत्पाद जोकि अधरों की सुंदरता में नयनाभिराम आकर्षण उत्पन्न कर सके।  इसमें त्वचा सम्बंधी नमी बरक़रार रखने वाले तत्व , तेल , मोम (Wax) और रंगों का इस्तेमाल किया जाता है।  वास्तव में इस उत्पाद में सभी तत्व नैसर्गिक (Natural ) होने चाहिए ( यहां उल्लेखनीय है शहद के छत्ते से प्राप्त मोम / WAX  का लिपस्टिक बनाने में  प्रयोग होता है  ) किन्तु आधुनिकता की अंधी दौड़ में हमें अब इतना भी भान नहीं है कि बाज़ार ने इसमें कौन-कौन से हानिकारक रसायन मिला दिए हैं जिसका खामियाज़ा सीधा ग़रीब वर्ग उठाता है क्योंकि प्राकृतिक तत्वों के साथ तैयार की हुई लिपस्टिक ख़रीदने की उसकी हैसियत नहीं है लेकिन इस शौक को भी पूरा करना है तो बाज़ार ने सस्ता से सस्ता हानिकारक विकल्प उपलब्ध करा दिया है।  

हमारी मानसिकता भी अरबों के व्यवसाय का आधार बन जाती है। 

मेक अप ( Make up ) अर्थात क्षतिपूर्ति।  जो कमी है उसे पूरा किया जाना।  फ़ैशन का क्रम ऊपर से नीचे की ओर बढ़ता है।  पहले इसे आभिजात्य वर्ग अपनाता है फिर समाज में नीचे की ओर इसका अंधानुकरण फैलता चला जाता है। 


लब (Lip ) = होंठ , ओष्ठ , अधर 

प्राकृतिक रूप से स्वस्थ  होंठों का रंग गुलाबी ही होता है ख़ून की कमी के कारण या अन्य कारणों से इनका रंग काला या नीला भी देखा जाता है।  आजकल फ़ैशन का ऐसा रंग चढ़ा है कि बाज़ार ने मानसिकता पर कब्ज़ा कर लिया है और लिपस्टिक  काले , हरे और न जाने कितने रंगों में उपलब्ध होकर अधरों पर सज रही है; परिधान के रंगों से मैच करती हुई। 

श्रृंगार रस के कवियों ने अधरों का वर्णन करने में कोई कोताही नहीं की है। गीतकार राजेंद्र कृष्ण जी ने   फ़िल्म शहनाई के  एक गीत   "न झटको ज़ुल्फ़ से पानी" .......  में पढ़िए कितनी कलात्मकता प्रदर्शित की है।  आगे ख़ूबसूरत प्रतीकों का इस्तेमाल करते हुए कहा है -
"ये नाज़ुक लब हैं या आपस में दो लिपटी हुई कलियाँ.....
   ज़रा  इनको   अलग  कर  दो  तरन्नुम  फूट  जाएंगे।" 


शुक्रवार, 24 नवंबर 2017

चलो अब चाँद से मिलने ....


चलो अब चाँद से मिलने 

छत पर चाँदनी शरमा रही है 

ख़्वाबों के सुंदर नगर में 

रात पूनम की बारात यादों की ला रही है। 



चाँद की ज़ेबाई सुकूं-ए-दिल लाई 

रंग-रूप बदलकर आ गयी बैरन तन्हाई 

रूठने-मनाने पलकों की गली से 

एक शोख़ नज़र धीर-धीरे आ रही है। 



मुद्दतें हो गयीं 

नयी तो नहीं अपनी शनासाई 

शाम-ओ-सहर  भरम साथ चलें अपने 

कैसे समझूँ आ गयी वक़्त की रुसवाई 

आ गया बर्फ़ीला-सा  आह का झौंका 

हिज्र में पलकों पे नमी आ रही है। 



फूलों के भीतर 

क़ैद हो गए हरजाई भँवरे 

चाँद से मिलने गुनगुनाकर 

जज़्बात फिर सजे-संवरे   

उदासियों की महफ़िल में  मशरिक़ से 

मतवाली महक पुरवाई ला रही है। 



चाँद आया तो भटके राही की 

राहें रौशन हुईं 

नींद उड़ने से न जाने कितनी 

बेकल बिरहन हुईं 

बिरहा के गीत सुनने 

आते रहना ओ  चाँद प्यारे 

नये ज़ख़्म देने को 

फिर सुबह  आ रही है। 



बुधवार, 15 नवंबर 2017

धूर्त फ़िल्मकार

धूर्त फ़िल्मकार  
संवेदनशील बिषयों पर 
फ़िल्म बनाते हैं 
जनता की जेब से 
पैसा निकालते हैं 
भोली-भाली जनता को 
ठगने के लिए 
किराये के गुंडों 
सरकारी तंत्र 
और मीडिया का 
चालाकी से 
इस्तेमाल करते हैं 
फ्री पब्लिसिटी पाने का
सुलभ तरीका 
इनका हर बार सफल होता है 
जनता के बीच पनपता 
असंतोष,असमंजस और भावनात्मक ज्वार 
इनकी तिजोरियां भरता है 
इसलिए फ़िल्म रिलीज़ से पूर्व  
गोलमोल बात साक्षात्कार में करता है 
साफ़ क्यों नहीं कहते कि 
लोग जिस मुद्दे पर आंदोलित हैं 
उसकी हक़ीक़त क्या है...? 
हम समझते हैं 
इसके पीछे 
तुम्हारी बदनीयत क्या है...? 
भ्रम को और हवा देकर 
रिकॉर्ड तोड़ सफलता का सपना देखते हैं 
विवादास्पद फ़िल्म देखकर लौटे दर्शक
अपने हाथ बार-बार मलते  हैं।  
#रवीन्द्र सिंह यादव 

शुक्रवार, 10 नवंबर 2017

चाँद पूनम का


कभी भूलती नहीं ये लगती बड़ी सुहानी,
चंदा सुनेगा आज फिर मेरी वही कहानी।
दोहराता है ये मन
है अजीब-सी लगन
पूनम की रात आयी
नूर-ए-चश्म लायी
हसीं चंदा ने 
बसुंधरा पर 
धवल चाँदनी बिखरायी 
चमन-चमन खिला था
 मौसम-ए-बहार  का 
प्यारा-सा सिलसिला था
कली-कली पर शोख़ियाँ 
और शबाब ग़ज़ब खिला था
 एक सरल  सुकुमार कली से 
आवारा यायावर भ्रमर मनुहार से मिला था
हवा का रुख़ प्यारा बहुत नरम था
दिशाओं का न कोई अब भरम था  
राग-द्वेष भूले
बहार में सब झूले 
फ़ज़ाओं में भीनी महकार थी 
दिलों में एकाकार की पुकार थी  
शहनाइयों की धुन कानों में बज रही थी
चाह-ए-इज़हार  बार-बार मचल रही थी
ज़ुल्फ़-ए-चाँद को संवारा
कहा दिल का हाल सारा
नज़र उठाकर उसने देखा था 
चंदा को आसमान में
लगा था जैसे रह गया हो 
उलझकर तीर एक कमान में 
 फिर झुकी नज़र से उसने 
घास के पत्ते को था सहलाया
छलक पड़े थे आँसू 
ख़ुद को बहुत रुलाया
इक़रार पर अब यकीं था आया
था इश्क़ का बढ़ चला सरमाया
नज़रें  मिलीं तो  पाया
चाँद को ढक  रही  थी
बदली की घनी छाया
पानी में दिख रही थी 
        लरज़ते चाँद की प्रतिछाया... 
नील गगन में चंदा आयेगा बार-बार  
 शिकवे-गिले सुनेगा आशिक़ों की ज़ुबानी,
चंदा सुनेगा आज फिर मेरी वही कहानी।

#रवीन्द्र सिंह यादव  

इस रचना को सस्वर सुनने के लिए YouTube Link-
https://youtu.be/7aBVofXYnN0

सोमवार, 6 नवंबर 2017

वो शाम अब तक याद है.....


वो शाम अब तक याद है 

दर-ओ-दीवार पर 

गुनगुनी सिंदूरी धूप खिल रही थी 

नीम के उस पेड़ पर 

सुनहरी  हरी पत्तियों पर 

एक चिड़िया इत्मीनान से 

अपने प्यारे चिरौटा से मिल रही थी 

ख़्यालों में अब अजब 

हलचल-सी  हो रही थी  

धड़कन एक नाम लेने को 

बेताब हो रही थी 

उस  रोज़ था  मंज़र बड़ा सुहाना  

था तमन्नाओं का पस-मंज़र वही पुराना 

दिल में कसक-सी हो रही थी 

पीछे से आकर आपने 

अपनी नाज़ुक हथेलियों से 

मेरी आँखें जो बंद की थीं 

फुसफुसाकर  कान में  जो कहा था 

वो लफ़्ज़ अब तक याद है 

वो शाम अब तक याद है 

शाम अब तक याद है 

याद है ..... 

याद है ......... 

#रवीन्द्र सिंह यादव 

सूचना -इस रचना को सस्वर सुनने के लिए  YouTube Link-

https://youtu.be/mK_WtqDlz94


शब्दार्थ / WORD MEANINGS 
गुनगुनी सिंदूरी धूप = सिंदूर (लालामी ) रंग की हल्की सर्दियों में प्रिय लगने वाली धूप / VERY LIGHT     WARM SUNLIGHT WHICH GIVES FEEL GOOD. 


दर-ओ-दीवार = दरवाज़े और दीवारें / DOORS AND WALLS, EACH AND EVERY PART OF DWELLING.


सुनहरी = सोने जैसे रंग की / का / GOLDEN COLOUR 


इत्मीनान = पूर्ण संतुष्टि के साथ / SATISFACTION 


चिरौटा = पुरुष चिड़िया, चिड़ा, चिड़वा / MALE SPARROW 


मंज़र = दृश्य / SCENE 


पस-मंज़र = पृष्ठभूमि / BACKGROUND 


रविवार, 5 नवंबर 2017

डाकिया

डाकिया अब भी आता है बस्तियों में 
थैले में नीरस डाक लेकर, 
पहले आता था 
जज़्बातों से लबालब थैले में  आशावान सरस डाक लेकर। 


गाँव से शहर चला बेटा या चली बेटी तो माँ कहती थी -
पहुँचने पर चिट्ठी ज़रूर भेजना 
बेटा या बेटी चिट्ठी लिखते थे 
क़ायदे भरपूर लिखते थे 
बड़ों को प्रणाम 
छोटों को प्यार लिखते थे 
साथ लाये सामान का हाल लिखते थे 
ज़माने की चाल लिखते थे
थोड़ा लिखा बहुत समझना लिखते थे । 



साजन और सजनी भी ख़त लिखते थे 
आशिक़ महबूबा भी ख़त लिखते थे
मित्र-मित्र को प्यारे ख़त लिखते थे 
ख़त आचरण और यादों के दस्तावेज़ बनते थे
कभी-कभी ठोस कारगर क़ानूनी सबूत बनते थे 
डाकिया को  ख़त  कभी न बोझ लगते थे
ख़त पढ़कर सुनाने में महाबोझ लगते थे।


कभी  बेरंग ख़त भी आता था 
पाने वाला ख़ुशी से दाम चुकाता था 
डाकिया सबसे प्यारा सरकारी मुलाज़िम होता था 
राज़,अरमान,राहत,दर्द ,रिश्तों की फ़सलें बोता था  
डाकिया चिट्ठी  तार पार्सल रजिस्ट्री मनी ऑर्डर  लाता था  
डाकिया कहीं ख़ुशी बिखराता कहीं ग़म के सागर लाता था।  


आज भी डाकिया आता है

राहत कम आफ़त ज़्यादा लाता है

पोस्ट कार्ड नहीं रजिस्ट्री ज़्यादा लाता है

ख़ुशियों का पिटारा नहीं

थैले में क़ानूनी नोटिस लाता है। 

#रवीन्द्र सिंह यादव

शब्दार्थ / Word  Meanings 

बेरंग ख़त = ऐसा पत्र जो प्रेषक  द्वारा बिना टिकट लगाए या डाकघर में मिलने वाले लिफ़ाफ़े में रखकर न भेजा गया  हो बल्कि सादा  लिफ़ाफ़े में भेजा गया हो जिसे पाने वाला टिकट का दुगना दाम चुकाकर प्राप्त करता था।  समय और पैसे की कमी के चलते ऐसा किया जाता था / A  Without  Ticket  Letter

तार = आपातकालीन या ख़ुशी की सूचना अति शीघ्र पहुँचाने के लिए यह संचार सुबिधा बड़े डाकघरों में सुबह 8 बजे से रात्रि 9  बजे तक उपलब्ध होती थी।  27 शब्दों का शुल्क 50 रुपये लिया जाता था इस सुबिधा के 163 साल चलने के बाद 15 जुलाई 2013 को समापन के वक़्त / Telegram  

बुधवार, 1 नवंबर 2017

100 के आगे 100 के पीछे

आइये एक आंकड़े पर विचार करें 
आपस  में आज बातें दो-चार करें 

विश्व  बैंक  की  रिपोर्ट  आयी है 
सरकार के लिए ख़ुशियाँ लायी है 
"ईज़ ऑफ़ डूइंग बिज़नेस" में भारत को 
100 वां स्थान मिल गया है
हमारा तो दिमाग़ हिल गया है।  

ज़ीरो की ओर बढ़ने वाला देश 
श्रेष्ठता की ओर बढ़ता है 
व्यापार में कठिनाइयों का दौर घटता है 
2016 में 130 वां स्थान था 
2015 में 131 वां स्थान था। 

अब देखते हैं दूसरा दृश्य,
समझिये इसका भी रहस्य- 

इंटरनेशनल  फ़ूड पॉलिसी रिसर्च ने 
"ग्लोबल हंगर इंडेक्स" ज़ारी किया है 
हमारे  मन   पर  बोझ  भारी  किया है 
भारत  को  100 वां  स्थान  मिला  है 
भुखमरी की न किसी से कोई गिला है 
ज़ीरो की ओर बढ़ने वाला देश 
भुखमरी पर जीत  की  ओर  बढ़ता  है 
जीवन में दुश्वारियों का दौर  घटता  है 
2016 में 97 वां स्थान था 
हालात सुधरने का गुमान था। 

व्यापार में  सुगम सुबिधा-सुधार के लिए 
30 अंकों की बेशर्म सकारात्मक वृद्धि !!!
भूख और कुपोषण  से  लड़ने की  हमारी  संवेदना  में 
3 अंकों  की नकारात्मक वृद्धि!!!!!!! 


एक और सर्वे आया है 
50 प्रतिशत लोगों ने रिश्वत देकर सरकारी कार्य करवाया है। 

कैसा राष्ट्रीय चरित्र विकसित हो रहा है... ?
हमारा मानस कहाँ  सो  रहा है ...?

ज़रा सोचिये......!!!!!!!
ठंडे दिमाग़ से
क्या मिलेगा 
भावी पीढ़ियों को 
कोरे सब्ज़बाग़ से........ !!!!!!!!!   

#रवीन्द्र सिंह यादव 

रविवार, 29 अक्तूबर 2017

ब्लॉग का एक वर्ष मुकम्मल हुआ

              कल (28-10-2017)   "हिंदी आभा*भारत" ब्लॉग का एक वर्ष मुकम्मल हुआ। उपलब्धियों के नाम पर ज़्यादा कुछ नहीं है बताने के लिए बस इतना ही ब्लॉगिंग ने मुझे नई दिशा दी है लेखन में निखार लाने हेतु। इससे पहले लेखन आकाशवाणी और दैनिक समाचार पत्रों के लिए चलता रहा।  2012 से  ऑनलाइन समाचार पत्रों में लिखना आरम्भ किया। 2014 के बाद समाचार पत्रों के कंटेंट में आश्चर्यजनक बदलाव आया।  मैं जिस समाचार पत्र समूह में सक्रिय रहा वहां मुझे हतोत्साहित किया जाने लगा फिर भी लिखता रहा। ब्लॉगिंग के बारे में सुनता रहता है था लेकिन यह कैसे आरम्भ किया जाता है इसका ज्ञान नहीं था।  लेकिन मेरे भीतर बेचैनी बढ़ती गयी और एक दिन गूगल सर्च में ब्लॉगर डॉट कॉम के बारे में पढ़ा तो कुछ समझ आया कि ब्लॉग कैसे तैयार होता है।

          अंततः ब्लॉग तैयार हो गया (  https://hindilekhanmeridrishti.blogspot.com) जिसको नाम दिया  "हिंदी आभा*भारत" ।   पहली रचना "नई सुबह" पोस्ट की।  सब कुछ सफलता पूर्वक संपन्न हो गया। ब्लॉग पर फीचर्स जोड़े।   अगले दिन ब्लॉग का डैश बोर्ड (ब्लॉगर) पेज़ देखा।  "आँकड़े" को क्लिक किया तो पेज़ देखे जाने की संख्या दिखाई दी फिर "ऑडिएंस" को क्लिक करने पर उन देशों के नाम आये जहाँ रचना पढ़ी गयी।  इतना जानकर उत्साह बढ़ता ही चला गया लेकिन एक अपरिचित दुनिया में अपने लिए स्थान बनाना असंभव-सा  लग रहा था।  कुछ टिप्पणियाँ आना शुरू हुईं।  मनोबल और बढ़ा। 

          नई सुबहआशाबहुरुपियालकड़हाराबादल आवारा

आज जलंधर फिर आया है...आजकल  रचनाएँ पोस्ट कीं

          सर्वाधिक ख़ुशी का क्षण उस वक़्त आया जब चर्चित लोकप्रिय ब्लॉग   "उलूक टाइम्स" के ज़रिये अपनी धारदार व्यंगात्मक रचनाओं से धूम मचाने वाले प्रतिष्ठित वरिष्ठ  ब्लॉगर आदरणीय प्रोफ़ेसर (डॉ.) सुशील कुमार जोशी जी ने आशीर्वाद स्वरुप मेरी रचना पर लिखा "सुंदर" । जब मैंने उनका ब्लॉग देखा और पढ़ा  तो आश्चर्य में डूब गया कि इतने वरिष्ठ ब्लॉगर ने मेरी रचना को  नोटिस किया और मनोबल बढ़ाया। बाद में उन्होंने मुझे प्रोत्साहित करते हुए ब्लॉग पर टिप्पणी लिखने हेतु मार्गदर्शन दिया और उनके आशीर्वाद व स्नेह ने मुझमें नई ऊर्जा भर दी।
           
                     एक माह पूरा होने पर अचानक हलचल पैदा हुई जब आदरणीय कुलदीप ठाकुर जी ने
28 -12 -2016 को प्रकाशित  मेरी रचना  "कल और आज" का चयन 29 -12 -2016  के  "पाँच लिंकों का आनन्द" के अंक हेतु किया।  सूचना पाकर मन आल्हादित हुआ और इस प्रतिष्ठित  ब्लॉग पर आकर उत्कृष्ट रचनाओं का संग्रह मिला साथ ही सीखने को मिला कि ब्लॉग को कैसे सजाया जाता है। उसके बाद इस ब्लॉग पर मुझे निरंतर मौके मिलते रहे और एक समय ऐसा आया जब आदरणीया यशोदा अग्रवाल जी ने पहले मुझे पाठक की पसंद के अंतर्गत अपनी पसंदीदा रचनाऐं  "पाँच लिंकों का आनन्द"  ब्लॉग पर प्रस्तुत  करने का अवसर दिया और बाद में इस प्रतिष्ठित ब्लॉग का चर्चाकार भी बना दिया।
           दुर्घटना -  मार्च 2017 में ब्लॉग के लिए डोमेन गूगल से  ख़रीदा।  डोमेन इंस्टाल करते हुए 7 अप्रैल 2017 को ब्लॉग से पिछली सारी टिप्पणियाँ विलुप्त हो गयीं।  ब्लॉग की तरह मन भी सूना हो गया तब सर्वप्रथम आदरणीया मीना  शर्मा जी ने मनोबल बढ़ाया और ब्लॉग फिर से टिप्पणियों से भरने लगा।

               इस यात्रा में सर्व आदरणीय जनों  दिगंबर नासवा जी , राजेश कुमार राय जी , जयंती प्रसाद शर्मा जी ,अमित अग्रवाल जी ,विभा रानी श्रीवास्तव जी , यशोदा अग्रवाल जी दिग्विजय अग्रवाल जी , राकेश कुमार श्रीवास्तव राही जी ,सुधा देवरानी जी ,विश्व मोहन जी ,श्वेता सिन्हा जी ,ज्योति देहलीवाल जी ,रेणुबाला जी ,ध्रुव सिंह "एकलव्य" जी , पम्मी सिंह जी ,कविता रावत जी, जमशेद आज़मी जी , हर्षवर्धन जोग जी , सतीश सक्सेना जी , डॉ. रूप चंद शास्त्री "मयंक"जी , डॉक्टर जैनी शबनम जी , शुभा मेहता जी , एम. रंगराज अयंगर जी , विनोद शर्मा जी , विरेश कुमार जी , तुषार रोहिल्ला जी ,ऋतु असूजा जी ,अर्चना जी ,पुरुषोत्तम कुमार सिन्हा जी ,विभा ठाकुर जी,कैलाश शर्मा जी , सुधा सिंह जी ,दीपक भारद्धाज  जी ,देव कुमार जी ,अपर्णा बाजपेयी जी ,अभिलाषा अभि जी , मीना भारद्धाज जी ,दिव्या अग्रवाल जी , लोकेश नशीने जी , हर्षवर्धन श्रीवास्तव जी , अमित जैन "मौलिक" जी , डॉक्टर इंदिरा गुप्ता जी , रिंकी रावत जी, नीतू ठाकुर जी, शकुंतला शकु जी ,पुष्पेंद्र द्धिवेदी जी और  आनंद जी  आदि का भरपूर सहयोग एवं समर्थन मिल रहा है।  जो नाम छूट गए हैं उनसे सादर क्षमा चाहता हूँ।
       फिलहाल अपने समस्त ब्लॉगर साथियों एवं वरिष्ठ रचनाकारों का हार्दिक आभार।  समस्त सुधिजनों का हार्दिक आभार जिन्होंने  ब्लॉग पर आकर रचना का वाचन किया और टिप्पणियों के द्वारा प्रोत्साहन दिया।
सादर।

#रवीन्द्र सिंह यादव












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