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सोमवार, 20 अगस्त 2018

दीमक


हमारे हिस्से में 
जो लिखा था 
सफ़हा-सफ़हा से 
वे हर्फ़-हर्फ़ सारे 
दीमक चाट गयी
डगमगाया है 
काग़ज़ से 
विश्वास हमारा 
पत्थर पर लिखेंगे 
इबारत नयी 
सिकुड़ती जा रही 
सब्र की गुँजाइश 
बिखरने के 
अनचाहे सिलसिले हैं 
इंसाफ़ की आवाज़ 
कहाँ गुम है ?
किसने आज़ाद हवा के 
लब सिले हैं?

© रवीन्द्र सिंह यादव

शब्दार्थ / WORD MEANINGS 
सफ़हा = पृष्ठ / PAGE 
हर्फ़ = शब्द / WORD 


सोमवार, 13 अगस्त 2018

पश्चाताप


एक दिन 

बातों-बातों में 

फूल और तितली झगड़ पड़े 

तमाशबीन भाँपने लगे माजरा खड़े-खड़े 

कोमल कुसुम की नैसर्गिक सुषमा में समाया माधुर्य नयनाभिराम 

रंग, ख़ुशबू , मकरन्द की ख़ातिर मधुमक्खी, तितली, भँवरे करते विश्राम 

फूल आत्ममुग्ध हुआ कहते-कहते 

तितली खिल्ली उड़ाने में हुई मशग़ूल 

यारी की मान-मर्यादा, लिहाज़ गयी भूल 

बोली इतराकर-

पँखुड़ियाँ नज़ाकत से परे हुईं 

धुऐं के कण आसमान से उतरकर गिरे हैं इन पर 

ओस की बूँदों ने चिकनी कालख बनने में मदद की है 

जड़ों को मिला ज़हरीला दूषित पानी 

सुगंध की तासीर बदल रहा है 

पराग आकर्षणविहीन हो रहा है......

आग में घी डालते हुए 

तितली ने आगे कहा-

मैं तो स्वेच्छाचारी हूँ.....

तुम्हारी तरह एक ठौर की वासी नहीं!

फूल का बदन लरज़ने लगा 

ग़ुस्से से भरकर बोला -

आधुनिक आदमियों की बस्ती में रहता हूँ 

मन मारकर क्या-क्या नहीं सहता हूँ 

काल-चक्र की अपनी गति है 

स्थिर रहना मेरी नियति है 

जाओ जंगली ज़मीन पर उगे ड्रोसेरा से मिलो! 

तितली पता लेकर उड़ गयी 

क्रोधाग्नि का ज्वार थमा तो 

फूल आत्मग्लानि से लबरेज़ हुआ 

मिलने आये भँवरे को 

मनाने भेजा तितली के पीछे 

अफ़सोस!

ड्रोसेरा पर रीझकर 

तितली ने गँवाया अपना अस्तित्व 

पश्चाताप की अग्नि में झुलसकर 

विकट दारुण परिस्थिति में फँसकर 

बिखर गया दुखियारा फूल 

याद करते-करते हमनवा 

उसके अवशेष ले गयी हवा 

शनै-शनै उड़ाकर जंगल की ओर....! 

पसर गया सन्नाटा-सा सन्नाटा चहुँओर.....!!    

© रवीन्द्र सिंह यादव 





शब्दार्थ / WORD MEANINGS 

ड्रोसेरा (Drosera / Sundews ) = एक कीटभक्षी पौधा / A Carnivorous Plant  

शनिवार, 4 अगस्त 2018

आहट सुनायी देती है.....?


मानवी-झुण्ड 

अपने स्वार्थों की रक्षार्थ 

गूढ़ मंसूबे लक्षित रख 

एक संघ का 

निर्माण करता है 

उसमें भी पृथक-पृथक 

धाराओं को सींचता है 

सुखाता है 

अन्तः-सलिला का 

निर्मल प्रचंड प्रखर प्रवाह

मूल्य स्वाधीनता के 

करता है बेरहमी से तबाह 

गढ़ता है 

नक़ली इतिहास के गवाह 

कहता है- 

मैं हूँ आपका ख़ैर-ख़्वाह......(?) 

जब सामने आता है दर्पण 

भ्रम और भ्रांतियाँ 

चीख़कर सत्य से परे 

भाग नहीं पाती हैं 

एक चेहरे के कई रुख़ 

साफ़ नज़र आते हैं 

तब बचता है 

एक ठगा हुआ 

बेकल अकेला इंसान.......

देखता है 

अपनी शक्ल टुकुर-टुकुर

शर्माता है भोलापन  

सुदूर एक बूढ़े वृक्ष की शाख़ से 

जुदा  होकर 

सूखकर ऐंठा हुआ 

एक खुरदुरा पत्ता 

खिड़की से आकर टकराता है 

तन्द्रा टूट जाती है 

वक़्त के उस लमहे में.....!  

© रवीन्द्र सिंह यादव

सोमवार, 30 जुलाई 2018

बारिश के रंग (पाँच ताँका)


हटाओ फूल

जो बने प्लास्टिक से

देखो बगिया,

आ गया है सावन

ज़ख़्मों का मरहम। 



आये उमड़

मेघदूत नभ में

लाये सन्देश,

शोख़ लफ़्ज़ सुनने

थी सजनी बे-सब्र।


पवन चली

खुल गयी खिड़की

फुहार आयी,

भिगोया तन-मन

बारिश में अगन।



मेघ मल्हार 

साथ आयी बहार 

बोले पपीहा,

 है घटा घनघोर

नाचे झूम के मोर।


नदी उफनी

हुई है मटमैली

फैले किनारे,

बहते हैं सपने

बिछड़ते अपने।

                                      © रवीन्द्र सिंह यादव



शुक्रवार, 27 जुलाई 2018

नाम ( तीन क्षणिकाऐं )



1
वो नज़र फिरी
तो क्या हुआ
दास्तान-ए-ग़म की
लज़्ज़त तो बरक़रार है,
मेरे क़िस्से में उनका
उनके में मेरा नाम
आज भी शुमार है।


2
सहरा में
रेत का
चमकना
मानो
सितारों की
झिलमिल चिलमन
के परे हो
मेरी कहकशाँ
ख़ुश हूँ कि
उनके फ़लक़ पर है
मेरा भी नाम-ओ-निशाँ।  

3
तन्हा सफ़र
भला किस
मुसाफ़िर को  
अच्छा लगा,
वो क़हक़हे
वो दिल्लगी
जो थी दिल-नशीं
यादों में वो नाम
चलते-चलते
सच्चा लगा।
© रवीन्द्र सिंह यादव

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