सोमवार, 19 अगस्त 2019

नशेमन


निर्माण नशेमन का 

नित करती, 

वह नन्हीं चिड़िया 

ज़िद करती। 


तिनके अब 

बहुत दूर-दूर मिलते, 

मोहब्बत के 

नक़्श-ए-क़दम नहीं मिलते।


ख़ामोशियों में डूबी 

चिड़िया उदास नहीं, 

दरिया-ए-ग़म का 

किनारा भी पास नहीं। 


दिल में ख़लिश 

ता-उम्र सब्र का साथ लिये, 

गुज़रना है ख़ामोशी से 

हाथ में हाथ लिये।  


शजर की शाख़ पर 

संजोया है प्यारा नशेमन, 

पालना है पीढ़ी को 

क़ाबिल बना उड़ाने के लिये।  

© रवीन्द्र सिंह यादव

बुधवार, 14 अगस्त 2019

सुनो प्रिये !


सुनो प्रिये !

मैं बहुत नाराज़ हूँ आपसे

आपने आज फिर भेज दिये

चार लाल गुलाब के सुन्दर फूल

प्यारे कोमल सुप्रभात संदेश के साथ

माना कि ये वर्चुअल हैं / नक़ली हैं 

लेकिन इनमें समाया

प्यार का एहसास / महक तो असली है

नादाँ हूँ / प्रकृतिप्रेमी हूँ  / कवि हूँ

कदाचित मुझे ये फूल असली लगते हैं 

आपकी साइंटिफ़िक समझ का क़ाएल हूँ 

ये चार फूल हृदय के चारों चेम्बर्स के लिये- 

Two atria and two ventricles.

 1. Right Atrium 

   2. Right Ventricle 

3. Left Ventricle 

4. Left Atrium 

सच कहूँ एक फूल ही काफ़ी है

नज़र शोख लेती है प्यारा गुलाब  

ख़ून में घुलकर ऑक्सीजन के साथ 

तन के पोर-पोर में प्यार महकाने के लिये 

अब मेरी छेड़ की बात सुनो!

रोज़ रखती रहना

सुप्रभात संदेश में  

सिर्फ़ एक लाल गुलाब का फूल 

नहीं तो मौक़ा पाकर  

कोई रख न दे दिल में 

नए तरह का आकर्षक फूल 

और वो जब नागफनी बनकर 

दिल के सभी चेम्बर्स में चुभेगा

मख़मली एहसासात को लहूलुहान करेगा  

तो बहुत याद आयेगी आपकी 

मत भूलना सिर्फ़ एक फूल रोज़!

सिर्फ़ एक Red Rose!! 

ये तीन फूल कहीं और भी 

जाकर प्यार को महकाते 

तो तीन और प्यारभरे दिल 

मेरे देश में बढ़ते! 

नफ़रतों से शिद्दत के साथ लड़ते!

जय हिंद !

© रवीन्द्र सिंह यादव

मंगलवार, 13 अगस्त 2019

कश्मीरी लड़की



हाँ मैं कश्मीरी लड़की हूँ! 

अपने देशवासियों पर भड़की हूँ। 

मेरा रंग और बदन पसंद तुम्हें, 

ये मनोविकार हैं नापसंद मुझे,

गुल बनो!

गुलफ़ाम को लेने,

आ जाना गुलशन में!

बदल सकोगे जलवायु?

जिसमें पलकर मैं बड़ी हुई  

सुमन पाँख-सी कोमल हूँ 

स्त्री का सम्मान करो बदलो सोच सड़ी हुई।   

ईद मुबारक उन्हें भी 

जो मेरे रंगरूप पर मोहित हैं

ज़ेहन में सिर्फ़ भोग्या का भाव रखते हैं!

© रवीन्द्र सिंह यादव 

शुक्रवार, 9 अगस्त 2019

सुनो मेघदूत!



सुनो मेघदूत!

अब तुम्हें संदेश कैसे सौंप दूँ, 

अल्ट्रा मॉडर्न तकनीकी से, 

गूँथा गया गगन,

  ग़ैरत का गुनाहगार है अब, 

राज़-ए-मोहब्बत हैक हो रहे हैं!

हिज्र की दिलदारियाँ, 

ख़ामोशी के शोख़ नग़्मे, 

अश्क में भीगा गुल-ए-तमन्ना, 

फ़स्ल-ए-बहार में, 

धड़कते दिल की आरज़ू, 

नभ की नीरस निर्मम नीरवता-से अरमान,

 मुरादों और मुलाक़ात का यक़ीं, 

चातक की पावन हसरत, 

अब तुम्हारे हवाले करने से डरता हूँ, 

अपने किरदार से कुछ कहने, 

अब इंद्रधनुष में रंग भरता हूँ। 

© रवीन्द्र सिंह यादव    

शनिवार, 3 अगस्त 2019

राहुल बोस का धन्यवाद दो केले की क़ीमत बताने के लिये

समाचार आया है -

'राहुल बोस ने दो केले की क़ीमत चुकायी  442.50 रुपये।' 

अभिनेता ठहरा था 
चंडीगढ़ के स्टार होटल में, 
बाहर आया महँगाई का जिन्न 
बंद था जो भद्रलोक की बॉटल में। 

मात्र 375 रुपये 
दो केले की एमआरपी, 
जोड़ा गया इसमें 
18 प्रतिशत जीएसटी। 

व्यथित अभिनेता को 
बात रास न आयी,
जनहित में एक 
वीडियो-शिकायत बनायी। 

वीडियो हुआ वायरल,
जनता हुई इमोशनल। 
 
सरकार ने जाँच करायी
फ्रेश फ्रूट फ़्री है जीएसटी से,
पूछा होटल से यह 'कर'   
बिल में जोड़ा किस दृष्टि से।   

अर्थदंड वसूला पच्चीस हज़ार 
नियंत्रित रहे उद्दंड बाज़ार,
केले की क़ीमत पर ख़ामोशी, 
लूट की छूट में गर्मजोशी। 

धन्यवाद राहुल बोस!
किसान को केले की क़ीमत बताने के लिये, 
चंद पैसों का केला सैकड़ों रुपये का... 
उत्पादक से उपभोक्ता तक केले का सफ़र बताने के लिये। 
 
 © रवीन्द्र सिंह यादव

सोमवार, 29 जुलाई 2019

क्या-क्या नहीं करता है पेड़ दिनभर






















दिनकर की धूप पाकर 

भोजन बनाता है पेड़ दिनभर,

लक्ष्यहीन अतरंगित असम्पृक्त को 

   भटकन से उबारता है पेड़ दिनभर।  


चतुर्दिक फैली ज़हरीली हवा 

निगलता है पेड़ दिनभर, 

मुफ़्त मयस्सर प्राणवायु 

उगलता है पेड़ दिनभर। 


नीले शून्य में बादलों को 

दिलभर रिझाता है पेड़ दिनभर, 

आते-जाते थके-हारे परिंदों को 

बुलाता है पेड़ दिनभर।



कलरव की प्यारी सरगम 

उदासी में सुनता है पेड़ दिनभर, 

आदमी को अपनी नज़रों में 

उठता-गिरता देखता है पेड़ दिनभर।  


यूनिवर्सिटी में रिसर्च का 

विषय बनता पेड़ दिनभर, 

राजनीति के हाथों सजीले गड्ढे में 

रोपा जाता पेड़ दिनभर। 


पथिक को ठंडी हवा के झौंकों से 

दुलराता पेड़ दिनभर, 

साधनविहीन पाठशाला का 

आसरा बनता पेड़ दिनभर। 


बाग़बान को सुख-चैन की 

रागिनी सुनाता पेड़ दिनभर, 

कलाकारों की साधना का 

आयाम बनता पेड़ दिनभर। 


निर्विवाद इतिहास 

रचता है पेड़ दिनभर,

भौतिकता के अलबेले दौर का 

मज़ाक़ उड़ाता पेड़ दिनभर। 


फलों का भार लादे लचकदार होकर 

जीना सिखाता पेड़ दिनभर, 

पढ़ने जाती नन्हीं मुनिया को 

बढ़ते हुए देखता पेड़ दिनभर। 


खेतों में पसीना बहाते मेहनतकशों को 

मिलीं गालियाँ सुनता पेड़ दिनभर,

सबूत मिटाकर सफ़ेदपोश बने 

अपराधी के अपराध गिनता है पेड़ दिनभर। 


क्या-क्या नहीं करता है पेड़ दिनभर... 

सारे भले कार्य करता है पेड़ दिनभर,

मरकर भी हमारा पेट भर जाता है शजर  

फिर क्यों काटा जाता है पेड़ दिनभर ? 

© रवीन्द्र सिंह यादव 




गुरुवार, 25 जुलाई 2019

करगिल विजय दिवस

वह 1999 का वर्ष था,

दोस्ताना अंदाज़ और अपार हर्ष था।  


जब अटल जी पहुँचे थे

दिल्ली से बस द्वारा लाहौर, 

दोस्ती की ख़ुशबू से 

महके थे दोनों देशों के ठौर। 


जब पींगें बढ़ी मित्रता की 

था फरवरी महीना,

पाकिस्तानी सेना को रास न आया 

दो मुल्कों का अमन से जीना। 


उधर धीरे-धीरे रच डाला  

साज़िश मक्कारी का खेल, 

साबित किया पाकिस्तान ने 

मुमकिन नहीं केर-बेर का मेल। 


अन्तरराष्ट्रीय समझौते की आत्मा रौंद 

घुसी पाकिस्तानी सेना चोरी से करगिल में, 

षडयंत्र का भंडाफोड़ हुआ तो 

टीस चुभी प्रबुद्ध मानवता के दिल में। 


3 मई से 26 जुलाई, 

चली हौसलों और बलिदान की भीषण लड़ाई। 

थल सेना ने जाँबाज़  गंवाकर सरज़मीं बचाई,  

दुश्मन से करगिल पहाड़ी ख़ाली करवायी। 


सर पर कफ़न बाँधकर

रण में कूदे थे भारत माँ के लाल,

दुश्मन को धूल चटाकर 

किया गर्वोन्नत हर भारतवासी का भाल। 


शत्रु  बैठा था रणनीति बनाकर, 

पर्याप्त ऊँचाई पर बंकर बनाकर। 

भारत माँ ने 527 प्यारे सपूत गँवाये, 

लिपटे हुए तिरंगे में सरहद से घर आये। 


सरहद की माटी में मिल गये 

प्रतीक्षा के सारे सिंदूरी सपने,

राखी, कंगन, तिलक रह गये 

बसकर बेबस यादों में अपने।  
  

क़ुर्बानी की ज्योति बनकर 

सीमा पर जो उजियारा है,

डटे रहो हे सैनिक दमभर 

शत-शत  नमन हमारा है।        

©रवीन्द्र सिंह यादव 




शुक्रवार, 7 जून 2019

पर्यावरण अधिकारी




 प्रकृति की, 

स्तब्धकारी ख़ामोशी की, 

गहन व्याख्या करते-करते, 

पुरखा-पुरखिन भी निढाल हो गये, 

सागर, नदियाँ, झरने, पर्वत-पहाड़, 

पोखर-ताल, जीवधारी, हरियाली, झाड़-झँखाड़,

क्या मानव के मातहत निहाल हो गये?

नहीं!... कदापि नहीं!!

औद्योगिक क्राँति, पूँजी का ध्रुवीकरण, 

बेचारा सहमा सकुचाया मासूम पर्यावरण।


अड़ा है अपने कर्तव्य पर,

एक सरकारी पर्यावरण अधिकारी, 

पर्यावरण क्लियरेंस लेना चाहता है, 

निजी प्रोजेक्ट अधिकारी,

साम-दाम-दंड-भेद सब असफल हुए,

चरित्र ख़रीदने के प्रयास निष्फल हुए,  

अंततः याचक ने कारण पूछा,

सरकारी पर्यावरण अधिकारी, 

प्रस्तावित प्रोजेक्ट-साइट पर जाकर बोला-

देखो! वर्षों पुराना इको-सिस्टम, 

पेड़-पौधों पर छायी हसीं रुमानियत, 

कोयल की कुहू-कुहू, 

कौए की काँव-काँव, 

मयूर का मनोहारी नृत्य,

ऑक्सीजन का घनत्व,  

हिरणों की चंचलता, 

चींटियों की निरंतरता,  

चिड़ियों के प्यारे घोंसले,

बघारना लोमड़ी के चोचले,  

तनों में साँप के कोटर,

मेढक की टर्र-टर्र,  

अँधेरी सुनसान रात में, 

दीप्ति उत्पन्न करते, 

जुगनू का निवास,

पेड़ की लचकदार टहनियों पर, 

तोतों का विलास,

प्रकृति का रसमय संगीत, 

फूल-तितली की पावन प्रीत, 

भँवरों का मधुर गुँजन

टिटहरी का करुण क्रंदन   

बंदरों की उछल-कूद, 

मीठे-रसीले अमरुद...,

इन्हें मिटाकर, 

क्या पैदा करोगे...!  

ज़हरीला धुआँ, प्रदूषित जल, 

ध्वनि प्रदूषण, मृद्दा प्रदूषण,

कुंद विवेक, वैचारिक प्रदूषण,   

सीमेंट-सरिया का जंगल,

ख़ुद के लिये मंगल, 

रोगों का स्रोत, 

लाचारों की मौत, 

पूँजी का अम्बार, 

उत्पादों का बाज़ार, 

मालिक मालामाल, 

उपभोक्ता कंगाल...,  


निजी प्रोजेक्ट अधिकारी,

चिढ़कर टोकते हुए बोला-

विकास के लिये, 

ये क़ुर्बानियाँ स्वाभाविक हैं, 

पर्यावरण अधिकारी ने अपना निर्णय सुनाया, 

फ़ाइल पर "नो क्लियरेंस" का टैग लगाया, 

मालिक ने मंत्री को फोन लगाया,

पूछा- प्रकृति-प्रेमी सरस्वती-पुत्र को,

ऐसा पद क्यों थमाया ?

अब तक कोई सहयोगी, 

लक्ष्मी-पुत्र आपके हाथ नहीं आया?   

यह कैसी "ईज़ ऑफ़ डूइंग बिज़नेस" नीति है ?  

हमारे साथ घोर अनीति है। 

 @रवीन्द्र सिंह यादव  

  

शुक्रवार, 31 मई 2019

प्रतिबद्धिता




                                      
                                      
तेज़ हवा अचानक बही 

तो नदी में ऊँची लहरें उठीं

नाविक का आत्मविश्वास

हौले-हौले डगमगाया

तो नाव भी डाँवाँडोल हुई

नाव पर सवार यात्री

मझधार में भयाक्रांत हुए

सभी कुशल तैराक न थे

नाविक का अस्थिर हौसला

बढ़ाने के अतिरिक्त

कोई सार्थक उपाय न था

कोई बोला-

क्या हम सबको डुबाओगे?

ठीक है आप आइये

पतवार थामिए

सबको पार लगाइये

नाविक खीझकर बोला

किनारों पर खड़े

दिलेर तैराक

कूद गये क्रुद्ध लहरों के बीच

सहारा दिया नाव को

घबराये यात्रियों को तसल्ली दी 

नाविक का जोश वापस आया

नाव पार लगी

यात्रियों ने जाँबाज़ तैराकों का

आभार माना

अभिनंदन किया 

उनकी प्रतिबद्धिता

अब जीवन के प्रति और प्रगाढ़ हो गयी।

© रवीन्द्र सिंह यादव 
      

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नशेमन

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