रविवार, 20 सितंबर 2020

दो पल विश्राम के लिए


 छतनार वृक्ष की छाया में 

 दो पल सुस्ताने का मन है,

वक़्त गुज़रने की चिंता में 

चलते रहने का वज़न है।

कभी बहती कभी थमती है बड़ी मनमौजन है पुरवाई,

किसी को कब समझ आई अरे यह तो बड़ी है हरजाई।

बहती नदिया थम-सी गई है 

श्वेत बादल सृजन श्रृंगार के लिए ठिठके हैं 

जल-दर्पण में मधुर मुस्कान का जादू नयनाभिराम

पुरवाई फिर बही सरसराती 

अनमने शजर की उनींदी शाख़ का 

एक सूखा पत्ता गिरा नदिया के पानी में

बेचारा अभागा अनाथ हो गया

पलभर में दृश्य बिखरा हुआ पाया 

श्वेत बादल का श्रृंगार हो पाया न हो पाया!

मैंने ख़ुद को सफ़र में चलते हुए पाया।

© रवीन्द्र सिंह यादव

मंगलवार, 1 सितंबर 2020

मधु,मानव और मधुमक्खियाँ

परागरहित चंपा पुष्प

उपेक्षित भाव की 


पीड़ा से गुज़रता है

जब मधुमक्खियाँ

उससे किनारा कर जातीं हैं

पराग चूसने

नीम के फूलों तक चलीं जातीं हैं

पराग देकर

फूल खिल जाते हैं

फूल होने पर इठलाते हैं

मानव-ज़ात को

शहद का छत्ता देकर

मधुमक्खियाँ 


अतिशय आनंद से 

आप्लावित हो चहकतीं हैं

वे आशान्वित रहतीं हैं

वे जानतीं हैं

उनका श्रम-ज्ञान ज़ाया नहीं होगा

अनेक फूलों से 


संग्रहित हुए पराग से 

निर्मित निर्मल मधु

उस मानव में बसी 


कलुषता मिटाएगा

जो मानव-मानव में भेद करता है

किसी न किसी फूल का पावन पराग

उसकी जिव्हा से मस्तिष्क तक


ह्रदय से रग-रग तक

पवित्र विचारों की

मिठास घोलेगा


मन-बुद्धि-संस्कार के 

सँकरे रास्ते खोलेगा

और वह एक दिन

प्रकृति को धन्यवाद बोलेगा। 


© रवीन्द्र सिंह यादव 

सोमवार, 24 अगस्त 2020

किताब-ए-वक़्त

किताब-ए-वक़्त में

क्या-क्या

और लिखा जाने वाला है

किसी को ख़बर नहीं

कुछ नक़्शे बदल जाएँगे

अगर बचे

झुलसने से

चिड़ियों के घोंसले

रहेंगे वहीं के वहीं

ढोएगी मानवता

महत्त्वाकाँक्षी मस्तिष्कों की

कुंठित अराजकता

मनुष्य का

भौतिकता में

जकड़ा जाना

वक़्त का सच है

बुज़ुर्गों की उपेक्षा

मासूमों पर

क्रूरतम अत्याचार

संस्कारविहीन स्वेच्छाचारिता

समाज का सच है।

 ©रवीन्द्र सिंह यादव

शनिवार, 15 अगस्त 2020

स्वतंत्रता


चिड़िया को 

जब देखता हूँ 

तब स्वतंत्रता का 

अनायास 

स्मरण हो आता है

जब चाहे 

उड़ सकती है 

जहाँ चाहे जा सकती है

जब चाहे धूल में 

नृत्य कर सकती है 

अथवा पानी में 

नहा सकती है 

मनचाहा गीत 

गा सकती 

मुक्ताकाश में 

विचरण कर सकती है 

फिर सोचता हूँ 

वह भी कहाँ स्वतंत्र है

उत्तरदायित्वों के बंधन 

उस पर लदे हुए हैं 

उससे शक्तिशाली 

उसकी स्वतंत्रता 

हनन करने पर

अड़े हुए हैं

घोंसले में 

लौटने की 

पाबंदी है 

सोचिए 

वह स्वतंत्र है 

या बंदी है?

घोंसला बनाने

अंडे सेने

चुग्गा लाने की 

दौड़ जीतना 

चूजों को 

सक्षम बनाने

दुनिया की ऊँच-नीच से

सतर्क करना

अपनी संतति में 

जीवन के प्रति 

अनुराग भरना

अस्तित्त्व बनाए रखने के लिए 

पर्यावरण अनुकूल बनना 

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की 

परिभाषा गढ़ना

कलरव के लिए 

बस सुबह की वेला चुनना 

आत्मकेन्द्रित बंधनों में 

जकड़े रहना

फिर कैसे कहे चिड़िया 

कि वह स्व के तंत्र में 

स्वतंत्र है या परतंत्र?

समाज या सरकार को

जो रास आए

बस वही लिखना और बोलना 

अभी बाक़ी है 

स्वाधीनता को सच्चे अर्थों में तोलना

क्रांति का गीत 

दिमाग़ों में घुमड़ रहा है

कभी गूँजेगा पुरज़ोर 

आज़ादी की फ़ज़ा में

बिखरेगी ख़ुशबू 

उन फूलों से 

खिल सकेंगे जो 

वक़्त की रज़ा में!

© रवीन्द्र सिंह यादव      

गुरुवार, 30 जुलाई 2020

पृथ्वी और इंसान

पृथ्वी के नष्ट होने कीं 

भविष्यवाणियाँ 

अब तक 

निरर्थक साबित हुईं हैं 

2012 का फोबिया याद होगा

उसके बाद भी 

टीआरपी के लिए 

क्या-क्या कहकर

दिशाहीन मीडिया ने  

हिस्टीरिया उत्पन्न किया  

कुछ तो याद होगा... 

महान वैज्ञानिक 

स्टीफन हॉकिंस ने 

2017 में कहा था-

पृथ्वी अगले 600 वर्षों में

आग के गोले में तब्दील हो जाएगी 

जिसका कारण 

मानव की 

आक्रामकता ठहराई जाएगी 

जनसंख्या वृद्धि

ऊर्जा का अंधाधुंध प्रयोग 

ग्लोबल वार्मिंग 

मौसम और जलवायु परिवर्तन

न चाहते हुए मुख्य कारक बनेंगे 

इन पर छोड़ दिया 

दुनिया ने चिंतन 

स्टीफन तो 

ख़तरे की घंटी बजाकर 

किसी और दुनिया में चले गए 

इंसान ने अनसुनी की आवाज़ 

तो कोविड-19 महामारी लेकर 

करोना वायरस आ गया 

स्टीफंस की आवाज़ को 

प्रकृति ने सुना है 

या यह चीन की मानव निर्मित चाल है 

हम इस जंजाल में उलझ गए।  

© रवीन्द्र सिंह यादव

शुक्रवार, 24 जुलाई 2020

यह जो बरसात आई है

यह जो बरसात 

आई है

हर बार की तरह 

फिर इस बार

सुहानी तो बिल्कुल नहीं

कोढ़ में खुजली-सी

लग रही है इस बार

अभी बाढ़ से आई तबाही

है चर्चा में

कल सूखे की चर्चा होगी

अभी मरनेवालों की चर्चा है

कल 

फ़सल-भूखे की चर्चा होगी

करोना महामारी से 

जूझ रही दुनिया में

अब मौतों के आँकड़े

दबाए जा रहे हैं

वैक्सीन बनने के 

समाचार

कमाऊ मंशा से 

फैलाए जा रहे हैं

पीड़ित मानवता का 

दम घुट रहा है

कोई दोनों हाथों से 

दौलत समेट रहा है

कोई सरेआम लुट रहा है

सरकार-समाज

ज्ञान-विज्ञान

धर्म-ज्योतिष

तर्क-पाखंड 

न्याय-मज़लूम 

सामाजिक मूल्य-अवसरवादी मूल्यविहीन अमूल्य 

सभी वक़्त की कसौटी पर

अपनी-अपनी परीक्षा दे रहे हैं

फ़िलहाल

पावस ऋतु में  

साफ़ हवा में

आशंकित 

हम 

सांस ले रहे हैं।    

© रवीन्द्र सिंह यादव
   

मंगलवार, 14 जुलाई 2020

अनाड़ी नाविक

एक अनाड़ी नाविक

उतरा नदी में

इस यक़ीन के साथ

कि पार लग जाएगा

माहौल से बेपरवाह

मौसम के पैटर्न से अनभिज्ञ

मझधार तक पहुँचा

क्रुद्ध हवा ने

अचानक आकर

विश्वासघात किया

छूने लगी नीर नदी का

मनमानी ताक़त से

उठती-गिरती

तीव्र लहरों में

नाव का बैलेंस

डगमगा गया

अकेली नाव

दूर बहती दिखाई दी!

©रवीन्द्र सिंह यादव 

शनिवार, 11 जुलाई 2020

वह इतना कायर है कि प्रश्न से डर गया है

रटारटाया उत्तर

सुन-सुनकर

मन भर गया है

वह इतना कायर है

कि प्रश्न से डर गया है

खोखले आदर्शों की नींव

इतनी उथली

कि मंसूबों की इमारत

भरभराकर

ढह गई है

कोई भोंड़ा-सा उत्तर

सर्वथा अनापेक्षित है

क्योंकि प्रश्न

तीखे तो होते हैं 

कदाचित अनंत संभावनाओं के

जनक हैं

समाधान हैं

कारक हैं

किरदार हैं

प्रश्न खड़े किए जाते हैं

नैतिक नियंत्रण

लोक कल्याण

और न्याय के लिए

तो फिर पलायन कैसा

सामना करो!

हमें प्रश्न का उत्तर चाहिए

प्रतिप्रश्न नहीं। 

शुक्रवार, 3 जुलाई 2020

चींटियाँ

देख रहा हूँ चींटियों को

कतारबद्ध चलते हुए 

कुछ जातीं चींटियाँ 

कुछ आतीं चींटियाँ

सोच रहा हूँ 

कितनी दिमाग़दार हैं चींटियाँ

अपनी रानी की 

सेवादार / तीमारदार हैं चींटियाँ

विज्ञान-साहित्य ने 

इन्हें भी नाम दिया है

रानी और मज़दूर चींटियाँ

अफ़सोस!

यहाँ भी 

पूँजीवाद-सा भेदभाव!  

एकता-शक्ति का 

अनुपम उदाहरण हैं चींटियाँ

अंडा ले बिल से निकल पड़ें 

तो कारण हैं चींटियाँ

लगतीं हैं अब तो 

प्रवासी श्रमिकों-सीं चींटियाँ

किसी सियासी सरहद से 

बेख़बर रहतीं हैं चींटियाँ 

बड़े लक्ष्य 

हौसले से हासिल करने   

हाथ डालतीं हैं चींटियाँ

सतत प्रयत्नशील रहने का 

सबक़ सिखातीं हैं चींटियाँ।

 ©रवीन्द्र सिंह यादव      

शुक्रवार, 26 जून 2020

बाबा रामदेव जी के नाम खुला पत्र

बाबा रामदेव जी के नाम खुला पत्र

महोदय,

       समाचार माध्यमों से ज्ञात हुआ कि आपने करोना वायरस (Covid-19 ) से फैली महामारी का शत-प्रतिशत सफल इलाज खोज लिया है और 'कोरोनिल' नाम की दवा से सात दिन में बीमारी ठीक होने का दावा किया है।
भारत में दैवीय चमत्कारों में बड़ा विश्वास है तो क्या महामारी में इसका फ़ाएदा उठाना चाहिए? परंपरागत भारतीय चिकित्सा पद्यति आयुर्वेद में जनता के विश्वास को उपचार के बहाने व्यापार बनाने का आपका यह प्रयास घोर निंदनीय है। सर्वाधिक चिंता का विषय है कि दवा के आविष्कार का मानवीय बीमारियों के संदर्भ में दावा प्रस्तुत करने की स्थापित प्रक्रिया है जिसका आपने पालन नहीं किया है। ऐसा ही समाचारों में बताया जा रहा है। आपके दावे की जाँच के लिए सरकार ने कार्यदल नियुक्त कर दिया है।

       आपने स्वदेशी आंदोलन को लोकप्रिय बनाने में सराहनीय भूमिका निभाई है लेकिन 'कोरोनिल' नाम में स्वदेशी को क्यों भूल गए? 'कोरोनाश' भी एक अँग्रेज़ी-हिंदी मिश्रित नाम हो सकता था।
आपने अपना दावा नोबेल पुरस्कार समिति के समक्ष पेश क्यों नहीं किया? अगर आपको वहाँ से अनुशंसा मिल जाती तो आज दुनिया में भारत का नाम छा जाता और आपके प्रति दुनियाभर में पीड़ित मानवता श्रद्धा से भर जाती।

       सबसे बड़ी बात कि इस महामारी के संकटकाल में आपने अपनी दवा का दाम 600 रुपये तय किया। आप इसे निशुल्क उपलब्ध कराने पर विचार क्यों नहीं कर सके? आपका संस्थान आर्थिक रूप से दिन दूना रात चौगुना बढ़ रहा है तो फिर इतना लालच और उतावलापन क्यों?

        भारत से लेकर दुनियाभर में योग को लोकप्रिय बनाने में आपका योगदान अतुलनीय है किंतु आपका ध्यान योग से हटकर व्यापारी बनने पर टिक गया है जो भारतीय जीवन दर्शन में साधु-संन्यासियों की जीवन शैली (हानि-लाभ की गणना से परे) के मानदंडों से विपरीत जाता नज़र आता है। आपके द्वारा सत्ता का विरोध और समर्थन आपको एक साधु नहीं राजनीतिक व्यक्ति के रूप में चिह्नित करता है अतः आपकी विश्वसनीयता संदेहास्पद हो गई है।
       आपको पत्र लिखने का मक़सद सिर्फ़ यह बताना है कि मार्ग दिखानेवाला ही मार्ग भटक जाय तो अनुयायियों का क्या होगा? वे देश में किस प्रकार की संस्कृति का विकास करेंगे ? राष्ट्रवाद को मिथ्या राष्ट्रवाद की दिशा में कौन ले जा रहा है?

शेष फिर कभी।
सादर नमन।

भवदीय

रवीन्द्र सिंह यादव

 दिनांक 26 जून 2020          

विशिष्ट पोस्ट

दो पल विश्राम के लिए

 छतनार वृक्ष की छाया में    दो पल सुस्ताने का मन है, वक़्त गुज़रने की चिंता में  चलते रहने का वज़न है। कभी बहती कभी थमती है बड़ी मनमौजन है पुरवा...