गुरुवार, 28 मई 2020

कल-आज-कल / लघुकथा


         वह एक शांत सुबह थी जेठ मास की जब बरगद की छांव में

स्फटिक-शिला पर बैठा वह सांस्कृतिक अभ्युदय की कथा सुना रहा था।

नए संसार के साकार होने का सपना अपने सफ़र पर था जो नए-नए

सोपान चढ़ता जा रहा था। मद्धिम होती जा रही थी बीती यामिनी के तमस

की तासीर और शांत क्षितिज की परतें वेधता हुआ उदीयमान सूरज उजाले

की कविता लिख रहा था। ताज़ा हवा के चंचल झोंके धवलकेशी सर पर

लहरें निर्मित कर रहे थे। उसने एक गंभीर मननशील दृश्य उपस्थित किया-

"अतीत की डबडबाई आँखों में अव्यक्त वेदना समाई है जो शिकायती

लहज़े में शायद कहती है-

हे वर्तमान!

मैंने तो नहीं सौंपा था तुम्हें ऐसा हो जाने का सपना। 

मैंने तो स्वयं को मिटाकर तुम्हें हर हाल में बेहतर होने के लिए गढ़ा है।

कल भविष्य जब तुम्हें नकारेगा, दुत्कारेगा; तुम्हारी मंशा पर उँगली

उठाएगा और तुम्हारे किए-धरे को ख़ारिज करेगा तब तुम क्या 

करोगे?"

      अनसुना करते हुए 
वर्तमान बेशर्मी से मुँह फेरकर अपने अस्तित्त्व के 

झंझावात में उलझ जाता है। सूर्य अब चढ़ आया था पीपल की फुनगी तक

श्रोता / अनुयायी-वृंद उठा भूख मिटाने के संघर्षमय प्रबंध में जुट गया।

©
रवीन्द्र सिंह यादव     


बुधवार, 27 मई 2020

उपलब्धियों का जश्न

सीमा पर चीन 

आक्रामक रुख़ के साथ 

भारत को उकसा रहा है 

शांति की आशाओं को धूमिल कर रहा 

रेलगाड़ियाँ इरादतन राह भटककर 

मज़दूरों की जबरन मौत का कारण बन रहीं हैं 

तपती सड़कों पर भूखे-प्यासे

थके-हारे पैदल चलते 

साधनहीन बच्चे-बूढ़े-जवान 

स्त्री-पुरुष श्रमिक

अपनी विवशताओं-विसंगतियों से 

भारत की सड़कों  पर 

दीनता-हीनता का 

रक्तरंजित महाकाव्य रच रहे हैं

बेरोज़गार युवाओं में 

भविष्य की आशंकाओं का 

तूफ़ान हिलोरें ले रहा है 

किसान नौकरशाही की चक्की में 

बेरहमी से पिस रहा है

अर्थ-व्यवस्था अनिश्चितता के भँवर में 

फँसकर माक़ूल निर्णय की प्रतीक्षा में 

खीझती-चीख़ती जा रही है 

भूखी-प्यासी गाय खूँटे से बँधी रँभा रही है

करोना योद्धाओं की दारुण दशा किसे भा रही है  

हानि-लाभ का गणित 

कुछ दिमाग़ों को तंग कर रहा है

कुछ में उमंग-तरंग भर रहा है 

न्याय का असहज होता जाना 

स्वाभाविक होता जा रहा है  

तब तुम उपलब्धियों का जश्न मना रहे हो...?

मुझे इसमें कतई शामिल नहीं होना है!

© रवीन्द्र सिंह यादव     

  

मंगलवार, 26 मई 2020

अँधेरा-उजाला

सूखे-अकड़े

पत्ते खड़के

तो ज्ञात हुआ 

वायु जाग रही है

ग़रीब की बिटिया ने 

जो दीपक जलाया था

साँझ ढले  

बस थोड़े-से तेल में 

बाती भिगोकर

जलकर बुझ गया है 

भानु के चले जाने के बाद भी 

रौशनी की याद 

ताज़ा करने का चलन 

अब विश्वास में ढल गया है  

अँधेरा डस रहा है उजाले को

तो ज्ञात हुआ

अँधेरे से लड़ते रहने के लिए 

आँखें बंद कर लेना 

अंधकार को कोसना / आलोचना  

प्रतीक्षा प्रभामय प्रभात की 

पर्याप्त नहीं 

सुननी नहीं 

कोई कल्पित कहानी 

उजास चाहते हो... 

हिलो-डुलो 

जाँचो-परखो 

ख़ून में है रवानी?

पूछा प्रश्न अपने आप से। 

© रवीन्द्र सिंह यादव 



बुधवार, 20 मई 2020

ये अदाएँ हैं / लघुकथा


             एक शायरा जो हसीन थी, ज़हीन थी; टीवी पर ग़ज़ल कह

रही थी। अपनी चमकीली काली ज़ुल्फ़ों को उसने क़रीने से वाम-

पक्ष में आगे फैलाया था। घनी केश-राशि बाईं आँख का कुछ

हिस्सा बार-बार ढक रही थी। कभी दाएँ, कभी बाएँ हाथ से लटों

को कान तक खिसकाती-धकयाती थी एक मिनट में पाँच-छह बार।

           
अगस्त 2004 के इतवार की वह उमसभरी शाम असह हो

 रही थी। कूलर की हवा भी बदन में चुभ रही थी। बाहर घिरी काली

 घटाएँ बरसने के लिए उमड़ रहीं थीं। वातावरण ख़ुशनुमा होने की

आशाएँ अपने सफ़र पर थीं।   

         
मुनिया अपनी तीसरी कक्षा की नई किताबें अख़बार के साथ

कवर चढ़ाने के लिए देने आई। मेरे पीछे चुपचाप खड़ी रहकर टीवी

देखती रही। एक मिनट बाद बोली

"
बाल बाँधतीं क्यों नहीं ये मैडम?

मुझे एक शरारत सूझ रही है

टीवी में घुसकर इनके बाल बाँध दूँ!"

सहसा मेरा ध्यान उसकी बातों पर गया

मैंने उसे समझाते हुए कहा-

"
ये अदाएँ हैं। 

शब्दों पर ध्यान दो।"

©रवीन्द्र सिंह यादव
  

मंगलवार, 19 मई 2020

प्रवासी श्रमजीवी


घर-गांव से 

हज़ारों किलोमीटर दूर

अपनों से बहुत दूर 

तुम चले जाते हो 

फूस-माटी की झोंपड़ी छोड़कर

माँ-बाप,भाई-बहन,भार्या,बच्चों को छोड़कर  
  
जीविका की तलाश में

मीडिया ने नाम दिया है 

प्रवासी मज़दूर तुम्हें हुलास में  

क्रूर करोना को ज्ञात नहीं

हालात के तूफ़ान से 

सतत लड़ने की 

तुम्हारी जद्दोजेहद की ज़िद

तुम लिख रहे हो क्रान्ति-गीत

 जीवन संघर्ष की पावन प्रीत 

लहूलुहान होकर सड़कों पर 

ऐसा कहने लगे हैं वादविद  

देख रहा है भारत 

आज तुम्हारी अंत्येष्टि की दुर्दशा 

सड़ी-गली तुम्हारी लाश की वीभत्स दशा 

अंतिम संस्कार की बदलती मनोदशा

सामाजिक विसंगतियों की दशा-दिशा 

तुम्हारे ख़ून के धब्बों से 

धुँधली हो गई है कहकशाँ!

ये निरपराध थे / हैं  

मैं लिख रहा हूँ सुनो आसमाँ! 

©रवीन्द्र सिंह यादव

रविवार, 17 मई 2020

आपने देखा सड़कों पर तड़पता बिलखता आत्मनिर्भर भारत?



पत्थर हुआ जाता है

रोटी का कड़क कौर

जल के प्यासे होने का

आया है भयावह दौर

आत्मा को तलाश है 

मिले कहीं सुकून का ठौर

जहाँ स्वार्थ का हिसाब न बना हो सिरमौर  

एक अंतरध्वनि अब सोने नहीं देती

सड़कों पर तड़पते, बिलखते  

आत्मनिर्भर(?) भारत की तस्वीर...

श्रमजीवी लहू से लहूलुहान 

रेल पटरियाँ-सड़कें...

यह तो नहीं थी ख़्वाब की ताबीर...  

कचोटती है बस रोने नहीं देती 

कोविड-19 महामारी ने सिद्ध किया है कि 

समाज कितना आत्मकेन्द्रित हुआ है 

कितना संवेदनशील हुआ है 

कितना संवेदनाविहीन हुआ है 

जनहित के लिए बना शासन-प्रशासन 

कितना बेपरवाह,मूर्ख,निर्लज्ज और दुष्ट हुआ है

विज्ञान सहायक हुआ भी है 

तो बस समाज के 

अल्पसंख्यक कोने के लिए 

न बनाता हवाई जहाज़ / जलपोत 

तो करोना वायरस कैसे निकलता चीन से

खोजने होंगे अर्थ 

भविष्य के लिए कुछ समीचीन से 

इस बदलते दौर में 

महाशक्तियाँ किंकर्तव्यविमूढ़ हुईं 

क़ुदरत से राहत माँग रहीं हैं

अपनी विवशता की सीमाएँ लाँघ रहीं हैं 

जिन्हें अहंकार था सर्वेसर्वा होने का 

वे एक वायरस की चुनौती के समक्ष 

मजबूरन नत-मस्तक हुए हैं

दंभी,मक्कार, झूठे-फ़रेबी 

आज हमारे समक्ष बस मुए-से हैं।

©रवीन्द्र सिंह यादव


शब्दार्थ

सिरमौर = सिर + मौर अर्थात सर (शुद्ध रूप) का मौर (मौहर शुद्ध  रूप), सर का ताज, मुकुट /                                  CROWN  

रविवार, 10 मई 2020

ईश्वर का साक्षात रूप है माँ

माँ तो केवल माँ होती

ईश्वर का साक्षात रूप है माँ

जो हर हाल में साथ होती है

माँ की मुस्कुराहट क्या होती है

देखा एक चैनल पर

महानगर से गांव की ओर

पैदल जाती एक्सप्रेस-वे पर

दोनों कंधों पर लादे बच्चे

हाथों में बचा-खुचा सामान

थकान से चूर पैरों में छाले

फिर भी कैमरे के समक्ष

ऐसी मुस्कुराहट

जो माँ होने का गर्वीला एहसास

हमारे दिलों में उतार देती है

यह क्लिप लॉकडाउन की बिडंबना का

अविस्मरणीय चित्र उतार देती है

माँ है विशाल वट-वृक्ष की

छाई छतनारी छांव

रचती रहती है

स्पंदन-अनुभूति का

नया-नबेला गुणात्मक गांव

माँ की गोद में समाया है लोक

संतति के जीवन में बिखेरती है आलोक

माँ थमा देती है तूलिका

ख़ुद बन जाती है कैनवास

उम्रभर गूँजती रहती है

माँ की झिड़की-प्रशंसाभरी बोली

एक सुखद एहसास

अब बहुत याद आता है

माँ की लोरी का वह स्वर

जब नींद आने तक

सुनाती थी रात के पहर

मेरे साथ एक दिन

वह स्वर भी लुप्त हो जाएगा

जो बस मेरे मस्तिष्क में रिकॉर्ड है!

  © रवीन्द्र सिंह यादव       

शनिवार, 9 मई 2020

शर्म से लाल हुए गुलमोहर की छांव


जीवन के भयावह झंझावात से 

गुज़र रहे हैं हम 

उजाले धुँधले हुए जाते हैं 

छा रहा अनचीता तम ही तम

उन्हें देखो 

जो भयमुक्त होकर डट गए हैं 

सुरीला संगीत 

फूलोंभरा बिस्तर 

रिश्तों की डोर 

किताबोंभरी अलमारी

मुस्कुराती बांसुरी

शर्म से लाल हुए गुलमोहर की छांव    

परे रख 

आत्मप्रचार से परे 

करोना वायरस से लड़ने 

इस ज़मीं को बेहतर बनाने

अकेले कंधे पर हाथ रखने  

वक़्त की सलवटें मिटाने

जुट गए हैं 

दर्द की बूँदें बरसने के बाद 

इंद्रधनुषी आभा की आस में

जीवन के प्रति अनुराग के बीज  

बस्ती-बस्ती के प्रभामंडल में बोने।

© रवीन्द्र सिंह यादव  


शब्दार्थ     

झंझावात = आँधी, तूफ़ान, प्रचंड वेग से बहती वायु 

अनचीता = सहसा घटित होने वाला,अनचाहा  

विशिष्ट पोस्ट

कल-आज-कल / लघुकथा

          वह एक   शांत  सुबह थी जेठ मास की   जब बरगद की छांव में स्फटिक - शिला   पर बैठा वह सांस्कृतिक अभ्युदय की कथा...