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रविवार, 12 फ़रवरी 2017

Dheere-dheere zakhm saare ab bharne ko aa gaye.

Ye kahaan se aa gayee bahar hai.

ये कहाँ से आ गयी बहार है




ये             कहाँ             से

आ        गयी      बहार   है  ,

बंद                             तो

मेरी   गली   का  द्वार  है। 



ख़्वाहिशें       टकरा     के

चूर          हो            गयीं,

हसरतों         का       दर्द

अभी          उधार       है।

बंद                           तो

मेरी  गली   का  द्वार  है।




नफ़रतों          के         तीर

छलनी  कर   गए    जिगर  ,

वक़्त     लाएगा     मरहम

जिसका      इंतज़ार      है।

बंद                             तो

मेरी   गली   का  द्वार  है।




बदल            गए            हैं

इश्क़     के     अंदाज़    अब,

उल्फ़तों                        का

सज      गया     बाज़ार   है।

बंद                              तो

मेरी   गली   का   द्वार  है।




अरमान  बिखर  जाएँ  तो

संभाल     लेना         दिल,

छीनता       है           एक

वो      देता      हज़ार    है।  

बंद                             तो

मेरी   गली   का  द्वार  है।



टूटते       हैं      रोज़-रोज़

तारे        आसमान      में ,

"रवीन्द्र "        को       तो

ज़िन्दगी    से    प्यार   है।

बंद                            तो

मेरी   गली   का  द्वार  है।



   @रवीन्द्र  सिंह  यादव

इस  रचना  का  यू  ट्यूब   विडियो  लिंक-  https://youtu.be/6n-Og0O8cTE

सोमवार, 6 फ़रवरी 2017

धीरे - धीरे ज़ख़्म सारे



धीरे -  धीरे     ज़ख़्म       सारे

अब      भरने    को   आ   गए ,

एक  बेचारा  दाग़ -ए -दिल  है

जिसको   ग़म   ही   भा    गए।



ज़िन्दगी   को    जब    ज़रूरत

उजियारे   दिन   की   आ    पड़ी,

लपलपायीं                बिजलियाँ

गरजकर  काले  बादल  छा  गए। 

एक  बेचारा  दाग़ -ए -दिल  है

जिसको   ग़म   ही   भा    गए।




बाँसुरी      की    धुन    पे  थिरका

बृज   के    साथ    सारा  ज़माना,

श्याम   जब    राधा   से  मिलने

यमुना    तट   पर     आ      गए।

एक  बेचारा  दाग़ -ए -दिल  है

जिसको   ग़म   ही   भा    गए।




आज    फिर   आँगन    में    मेरे

नन्हीं     कलियाँ     खिल     रहीं,

गीत     फिर    इनको     सुनाओ

जो    दादी    नाना     गा      गए।

एक  बेचारा  दाग़ -ए -दिल  है

जिसको   ग़म   ही   भा    गए।




क्या      मनाएं      जश्न       हम

ज़िन्दगी       की     जीत       का,

बाँटने     को    थीं    जो      चीज़ें

हम     उन्हीं     को     खा     गए।

एक  बेचारा  दाग़ -ए -दिल  है

जिसको   ग़म   ही   भा    गए।

                  @रवीन्द्र  सिंह  यादव

इस रचना  को सस्वर  सुनने के लिए  लिंक - https://youtu.be/QdAzRuiZa8

बुधवार, 1 फ़रवरी 2017

आया ऋतुराज बसंत




शिशिर   का    प्रकोप    ढलान   पर

आया  ऋतुराज  बसंत  दालान  पर

खेत-खलिहान  / बाग़ -बग़ीचे

पीलिमा     का   सुरभित   आभामंडल,

गुनगुनी  धूप

पुष्प-पत्तों  ने  पहने  ओस  के  कुंडल।

सरसों    के    पीले     फूल

गेंहूँ-जौ    की  नवोदित  बालियां / दहकते  ढाक - पलाश,

सृष्टि  का  साकार  सौंदर्य

मोहक     हो        पूरी        करता    मन     की     तलाश।

पक्षियों  का  कर्णप्रिय  कलरव,  

गा   रहा   कोई

राग                              भैरव।



आ   गया   बसंत

अल्हड़  मन  पर  छा  गया  बसंत ,

प्रकृति  के  प्रवाह   में

होता    नहीं    कोमा   या   हलंत।  



उत्सव   मनाओ  कुदरती  मेलों  में

जिओ              सजीव                बसंत ,  

पोस्टर ,कलेंडर ,फिल्मांकन,अंतर्जाल  में

हम  ढूँढ़ते   हैं  आभासी   निर्जीव  बसंत।

@रवीन्द्र  सिंह यादव
 
                         






रवीन्द्र  सिंह यादव

वागीश्वरी जयंती



जय   हो   वीणावादिनी

जय   हो   ज्ञानदायिनी

विद्या ,बुद्धि ,ज्ञान की देवी

करो   मेधा  प्रखर  वाग्देवी।



माघ   मास  शुक्लपक्ष  पंचमी

वागीश्वरी जयंती

पूजा-आराधना  शाश्वत  ज्ञान  हेतु

शीश  नमन्ति !



हे   माँ !

उन   मस्तिष्क   का  विवेक

जाग्रत   रखना

जिनकी   अँगुलियों   को

भोले  जनमानस   ने

परमाणु - बटन   दबाने  का  अधिकार  सौंप  दिया  है ,

उन  स्वार्थ   की  परतों  को  उधेड़   देना

जिन्होंने   मानवता  की  पीठ  में  ख़ंजर   घौंप  दिया  है।

उन  मनीषियों  की  प्रतिभा  प्रचंड  प्रखर  करना

जो  स्वयं   को   जलाकर

रोशनी     के      हेतु   हैं ,

कल   और  आज   के

धवल -   सबल   सेतु   हैं।

उन  दीन -दुखी , निबल, जर्जर   को  संबल  देना

जो       मूल्यों     की     धरोहर     सहेजे  हैं,

वक़्त   के   ज़ुल्म-ओ-सितम    सहकर

निष्ठा   को    आज   भी   लगाए   कलेजे    हैं।

उन   दिमाग़ों    में  स्त्री-गरिमा   की  ज्योति  प्रदीप्त  करना

जो  भोग-उपभोग   का    मानस  लिए  भटकते  हैं,

असहाय   समाज   की  आँख   में

यदाकदा     नहीं       अब       रोज़        खटकते   हैं।



हे  माँ !

भटके  हुए   जीव - जगत   को

सुरमयी  गीत   सुनाकर  उजियारा   पथ   दिखा   देना ,

जीवन- संगीत   का

दिव्य               बसंती -राग                   सिखा   देना।

                                                @ रवीन्द्र  सिंह यादव
 

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