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सोमवार, 21 अगस्त 2017

गुरु


डॉक्टर  को


उसके  गुरु


सिखाया  करते  थे-


"मौत से घृणा करो"


वे  आज


विश्वास के क़ातिल /


मौत के


सौदाग़र हो गए


पैसे के भारी


तलबग़ार हो गए।





नेता   को


उसके    गुरु


सिखाया करते थे-

"राजनीति का ध्येय

समाज-कल्याण है

उसूलों पर खरे उतरना "

वे आज

लाशों पर

रोटियां सेकने में

माहिर हो गए

भ्रष्टाचारी / अवसरवादी  दुनिया के 

मुसाफ़िर  हो  गए।





शिक्षक  को



उसके गुरु


सिखाया करते थे-


"चरित्र-निर्माण ही


राष्ट्र-निर्माण है"


वे  आज 


वैचारिक दरिद्रता के


क़ायल   हो  गए


अपनी ही शिक्षा के


तीरों से घायल हो गए ।





संत को 

उसके गुरु 

सिखाया करते थे -

"मोह माया से दूर रहो 


आध्यात्मिक ज्ञान से 


समाज-सुधार करो"


वे आज 


बड़े व्यापारी हो गए 

भोली जनता की 

गाढ़ी कमाई खाकर 


समाज पर 


बोझ भारी हो गए। 




कलाकार को 

उसके गुरु ने 

यह कहते हुए तराशा -

"कला का मक़सद 

सामजिक-चेतना को 

उभारना है

दरबारी कृपामंडल में 

चमकना नहीं 

रूह को वीरान 

होने देना नहीं

जितना तपोगे 

उतना निखरोगे "

वे आज 

भोगवादी विचार के  

शिकार हो 

विलासता में सिमट गये 

सरकारी ओहदे /अवार्ड / अनुदान की 

परिधि में 

कलात्मक -विद्रोह से 

महरूम हो 

सत्ता के हाथों 

लुट-पिट गये।  




नैतिक पतन के दौर में


हम अपनी ग़लतियों 

के  लिए  

प्रायश्चित नहीं करते 

न ही कभी

अपने भीतर झाँकते

परिणाम सामने हैं

दोषारोपण के और कितने

मील  के पत्थर गाढ़ने हैं ?

सामाजिक मूल्य गहरी नींद सो गए. ......!

गुरु क्यों अब अप्रासंगिक हो गए ?

#रवीन्द्र सिंह यादव


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