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बुधवार, 12 जुलाई 2017

ख़ालीपन से दूर .....



        

     उठो चलो
     जी चुके बहुत
     सहारों में,
     ढूँढ़ो  न आसरा
     धूर्तों-मक्कारों में।



      सुख के पलछिन

      देर-सवेर
      आते तो हैं ,
      पर ठहरते नहीं
      कभी  बहारों में।



     मतवाली हवाओं

     का आना -जाना
     ब-दस्तूर ज़ारी है ,
     ग़ौर  से देखो
     छायी है धुंध
     दिलकश नज़ारों में।



     फ़ज़ाओं की

    बे-सबब  बे-रुख़ी से
     ऊब गया है मन ,
     फुसफुसाए जज़्बात
     दिल की
     दीवारों में।



     रोने से

     अब   तक   भला 
     किसे क्या मिला,
     मिलता है
     जीभर सुकूं
     वक़्त के मारों में।



     हवाऐं ख़िलाफ़

     चलती हैं
     तो चलने दे ,
     जुनूं लफ़्ज़ों से
     खेलने का
     पैदा कर क़लमकारों  में।



    मझधार की

    उछलती  लहरें
    बुला रही हैं,
    कब तक
    सिमटे  हुए 
    बैठे रहोगे  किनारों में।



     परिंदे भी

    चहकते ख़्वाब
    सजाते रहते हैं ,
    उड़ते हैं
    कभी तन्हा
    कभी क़तारों  में।


    @रवीन्द्र  सिंह  यादव

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