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बुधवार, 28 जून 2017

मैं भारत का किसान


मैं  भारत  की शान, 
कहते मुझे किसान। 



पढ़ना -लिखना सब चाहें ,

अफ़सर बनना सब चाहें ,
अन्न उगाने माटी में सनकर, 
मैं  देखूँ   खेत-खलिहान,
मैं  भारत  की शान ,
कहते मुझे किसान। 



सूरज उगने से पहले जागूँ ,

पशुओं का चारा लेने भागूँ ,
रूखी -सूखी खाकर ,
है  ऊँचा स्वाभिमान,
मैं  भारत  की शान ,
कहते मुझे किसान। 



मानसून   की  मर्ज़ी   पर ,

मेरी  फ़सलें   उग पाती हैं ,
देख - देखकर अम्बर को ,
मेरी आँखें पथरा जाती हैं ,
पानी  भर जाए  खेतों  में ,
तब   रोपूँ   अपना   धान ,
मैं  भारत  की शान ,
कहते मुझे किसान। 



खाद -बीज ,बिजली ,डीज़ल, 

सब  ख़र्चे  मुझे  सताते  हैं ,
शहरों में बैठे डॉक्टर /व्यापारी, 
माल  लेकर मुझे बुलाते हैं,
रेत सी फिसले मेरी कमाई,  
मैं कहाँ इतना धनवान ,
मैं  भारत  की शान ,
कहते मुझे किसान। 



बैंक मुझे क़र्ज़ा  दे  देकर ,

ठगने का जाल रचाते हैं ,
कट जाता खाते से पैसा ,
मौसम का हाल बताते हैं ,
फसल-बीमा की ठग-विद्या से, 
समझो सरकारी ईमान,
मैं  भारत  की शान ,
कहते मुझे किसान। 



सरकारों के यार -दोस्त हैं, 

गाँवों  के चतुर साहूकार ,
बुला- बुलाकर क़र्ज़ा  देते ,
बसूली में होती  हाहाकार ,
देते -देते ब्याज क़र्ज़ का ,
लुट जाते गहने ,खेत - मकान,
मैं  भारत  की शान ,
कहते मुझे किसान। 



शोषण के चक्रव्यूह में,

फंसते जाते ग़रीब किसान, 
झूठे वादे करते -करते ,
सरकारें बन जातीं निष्ठुर - अनजान ,
लाखों ज़हर की गोली खाकर,
तज गए अपने प्राण ,
फाँसी के फंदे पर बेचारे लटके मिले किसान, 
मैं  भारत  की शान ,
कहते मुझे किसान। 

किसान क़र्ज़ माफ़ी को ,
फ़ैशन बता रही सरकार ,
हैं वे किसके  यार दो चार ,
बैंकों का जो लाखों करोड़ गए डकार ?
करोड़ों वोट हमारे हैं ,
हम क्यों करें जान क़ुर्बान, 
मैं  भारत  की शान ,
कहते मुझे किसान। 





ओले ,बारिश ,तूफ़ान ,तुषार, 

कीड़े    और    सूखे   की  मार, 
फ़सल बोऊँ तो न बरसे पानी ,
फ़सल  पके  तो   बरसे  पानी ,
कभी - कभी होता है ,
मौसम मुझपर मेहरबान, 
मैं  भारत  की शान ,
कहते मुझे किसान। 



भरपूर  हुई जब पैदावार, 

खींचे पाँव पीछे सरकार ,
फ़सल में खोट बताकर ,
एमएसपी पर लेने से करती इंकार, 
मौज़ करते मोज़ाम्बिक  के किसान, 
मैं  भारत  की शान ,       
कहते मुझे किसान। 



संसद से पास हुए ,

क़ानून की इज़्ज़त रख लेता हूँ, 
"मैं ग़रीब परिवार से हूँ , मेरा नाम रमुआ......... सुखिया है,
मैं एनएफएसए से सस्ता राशन लेता हूँ "
मेरे घर की दीवार पर ,
लिखवा दिया है सरकारी फ़रमान, 
मैं  भारत  की शान ,       
कहते मुझे किसान। 



सीमा पर किसान का बेटा, 

दुश्मन की गोली खाता है ,
मंदसौर में किसान का बेटा, 
पुलिस की गोली खाता है ,
धोती -कुर्ता और अंगौछा ,
थी कभी मेरी पहचान ,
बदले वक़्त में मैंने भी ,
अब बदल दिए परिधान। 
मैं  भारत  की शान        
कहते मुझे किसान। 



लदाई-उतराई, ढुलाई-तुलाई का,

न जाने हिसाब सरकार ,
ई-मंडी और लैस कैश का, 
करती दिन-रात धुआँधार प्रचार ,
दे-दे पैसा अभिनेता को, 
अक़ल मुझे सिखायी जाती है, 
मेरे नाम पर धूर्तों को,  
मलाई ख़ूब खिलायी जाती है,  
ऐसे बनेगा मेरा देश महान?
मैं  भारत  की शान ,       
कहते मुझे किसान। 



माल मेरा खेतों में सड़ता ,

या सड़कों पर बिखरा मिलता, 
मिलता नहीं पूरा- ड्यौढ़ा दाम, 
मेरे पास कहाँ  होती है ,
अमीरों सी शहरों में सजी दुकान, 
मैं  भारत  की शान ,       
कहते मुझे किसान। 




हमें मिलेगा फ़सल का, 

अपनी पूरा-पूरा  दाम ,
साथ चलेंगे जब हम सब, 
हाथ एक-दूजे का थाम  ,
तिलहन , अनाज या दालें, 
फल , सब्ज़ी ,दूध ,मसाले ,
ये सब मेरी पहचान ,
क्यों करते हो मेरा अपमान ?
मैं  भारत  की शान  ,      
कहते मुझे किसान। 


@रवीन्द्र सिंह यादव 

 
इस रचना को सस्वर सुनने के लिए मेरे You Tube  चैनल "मेरे शब्द-स्वर "(Mere Shabd -Swar ) का लिंक - https://youtu.be/342PrqwLWJw








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