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शनिवार, 25 मार्च 2017

मैं मज़दूर हूँ

मैं       मज़दूर      हूँ

किंतु   मज़बूर   नहीं,

राह      मिल      गई

तो  मंज़िल  दूर  नहीं ।



बांध  बनाऊँ  सड़क  बनाऊँ,

बाजारों  की  तड़क-भड़क  बनाऊँ,

जीवन की राहें औरों  की आसान  बनाऊँ,

ख़ुद  पग-पग  पर अपमान सहूँ  ग़म  खाऊँ।




हथियार  बनाऊँ  साज़  बनाऊँ,

सुई       बनाऊँ  जहाज़  बनाऊँ ,

रेल   बनाऊँ   मंच    सजाऊँ,

न       कोई   प्रपंच     रचाऊँ। 



लोग  कहते  हैं -

बादशाहों  की  पसंद  निर्मम  थी

ख़ून -पसीना बहाने  के बाद

कटवा  दिए  मेरे हाथ ,

कैसा  क़ानून  है  ....... ?

न्याय  क्यों   लगता   नहीं  मेरे  हाथ।



मुझपर   आरोप  है

आबादी  बढ़ाने  का ,

कोई  नहीं  सोचता

मेरी  मुश्किलों  की परिधि  घटाने  का।



मेरी  झोपड़ी में

आज भी दिया जलता  है,

अँधेरे  महलों  को

मेरा  रोशन  चेहरा  खलता   है।



ईश्वर  के  नाम   पर

धूर्त  ठग   लेते   हैं  मुझे ,

पीढ़ी -दर -पीढ़ी  चक्रव्यूह  रचकर

शिक्षा और  साधन  से दूर  कर देते  हैं मुझे।




आ  गयी  मशीनें

छीनने  मेरे  मुँह  का  निबाला ,

हाथ   आया  जो  रुपया

बुलाकर  झपट   लेती   मधुशाला।



दबी  हुई  है  मेरी  चीख

 उन  महलों  के    नीचे,

आवाज़  बुलंद करके  रहूँगा

नहीं       हटूँगा     पीछे  ।



मेरी  मेहनत  के  एवज़  में

जो  देते  मुझको  भीख,

श्रम  का  आदर  करना

अब  जाएंगे  वो  सीख ।



रहे  एकता  अमर  हमारी

न   हो    हमसे   भूल,

तभी  खिलेंगे  इस  बग़िया   में

श्रम   के   पावन   फूल ।

@रवीन्द्र  सिंह  यादव



         

सोमवार, 13 मार्च 2017

पूँजीवाद का शिकंजा




भिखारी  बनाने पर तुला  है  पूँजीवाद, 

सिसकियाँ   भर  रहा   है  समाजवाद। 



इतिहास के नाज़ुक  मोड़  पर 

खड़े  होकर    हम 

भूमंडलीकरण  को  कोस  रहे  हैं, 

 देख  भूखे  पेट  सोतों   को 

अपना    मन      मसोस  रहे  हैं।  



युद्धग्रस्त  देशों  में   

भूख   का   तांडव

पिघलाता  नहीं  अब  दिल  हमारा,

आक्रोश  और क्षोभ  से भरा  मन 

अब  असहाय  के  लिए  खोलता  नहीं  सहयोग  का  पिटारा।  



आच्छादित   है  मानवीय - संवेदनाओं  पर 

स्वार्थ  का  मज़बूत     आवरण,  

थाम लेता  है  बार-बार 

मूल्यों    का   होने  से  जागरण । 



बढ़ती  ग़ैर -बराबरी ,

सामाजिक - ध्रुवीकरण,

अब ,

ग़रीब -अमीर  के बीच  स्थापित   

कालजयी  खाई  को  और चौड़ा  कर रहे  हैं, 

पूँजीवाद  का  विकराल  रूप  प्रकट  हो गया  है ,

दुनिया  की आधी  संपत्ति  पर  8  धनकुबेरों  का कब्ज़ा  हो गया है ,

भारत में अब 1% लोगों का देश की 58%  संपत्ति  पर कब्ज़ा  हो गया  है। 




आजीविका  के  लिए  हर  दिन  

संघर्ष   करने  वाला 

हाथ   मल   रहा  है ,

सरकारों  का  सत्ता  में  बने रहने   की चिंताओं का  दौर  चल  रहा  है।



सरकारें  संचालित  हैं ,

धनकुबेरों  की  मंशा  से,  

ज़ेबें   हमारी  काटने    के  क़ानून   उनसे  बनवा  रहे हैं,  

भूख  से  तीसरी  दुनिया  के  देश  हार  रहे  हैं , 

विकसित देश  बेशर्मी  से   बेच  हथियार  रहे हैं।




ग़रीब  को    मिले  

डॉक्टर ,दवा , रोटी,  शिक्षा  और  छत ,

ख़त्म   हो  शोषण - कुपोषण  का  चक्रव्यूह,   

छूट       जाय       नशे     की     लत।   




पूँजी  का  ध्रुवीकरण  रुके ,

राष्ट्रीय संपत्ति   का  समान   बँटबारा  हो ,

पूँजी  का  विकेन्द्रीकरण  हो ,

बाज़ारवाद  के  मकड़जाल  को समझें ,

अनावश्यक  शौक  पर   हमारा  नियंत्रण  हो। 



कर  सुधार  हो,

ख़त्म  भ्रष्टाचार  हो ,

हर  हाथ  को  काम  हो ,

मेहनत   का उचित  दाम  हो ,
  
श्रम ,श्रमिक-उत्पाद  और  फसल  का  उचित  मूल्य  हो ,

एकता  अमूल्य  हो ,

बच  पाएंगे  तब  हम,

पूँजीवाद  के  आगे  घुटने   टेकने  से ...... ।   



समन्वित  वैश्विक  उपाय,

समानता  के   विचार   की  खाद,

आक्रोश  और   पीड़ा  से  उपजी  आह ,

उबार  लेंगे  मानवता   को  अंधी सुरंग  में  जाने   से।    

                                                         @रवीन्द्र  सिंह यादव                                                               

  

शुक्रवार, 10 मार्च 2017

आयी राम की अवध में होली



आयी   राम    की

अवध   में    होली ,

छायी  कान्हा  की

बृज    में   रंगोली।



पक   गयी  सरसों

बौराये    हैं   आम,

मनचलों  को  अब

सूझी   है  ठिठोली।

छायी   कान्हा  की

बृज    में   रंगोली।



भाये       मन      को

रंग    अबीर   गुलाल ,

मस्ताने    बसंत    में

कूक  कोयल   बोली।

छायी    कान्हा    की

बृज      में     रंगोली।





मिट     गए   मलाल

मलने     से   गुलाल,                                                                                                                                         
भरी मायूस मन  की

खुशियों   ने   झोली।

छायी    कान्हा   की

बृज     में     रंगोली।













खेलो     होली    बन


राधा     नन्द    लाल ,


पिचकारी    ने    बंद


राह    अब     खोली।


छायी     कान्हा   की


बृज      में      रंगोली।




@रवीन्द्र  सिंह यादव


इस रचना  का यू  ट्यूब पर  (चैनल - MERE SHABD--SWAR) लिंक -https://youtu.be/ufs7srNvtAU

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