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January, 2017 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

ओस

जब

वातावरण में

समाहित  वाष्प  को

सिकोड़   देती  है  सतह  की  ठंडक,

तब

शबनम  के दाने / ओस के मोती,

फूल -पत्तियों      पर      आसन     जमाते    हैं,

हमारे  मरने -मिटने  के  भय  को  लजाते   हैं।




मुनिया    समझदार    हुई,

पाँच    बसंत      पार    हुई,

बोली  एक   इतवार  को -

"पार्क  में  मैं  भी  चलूँगी,

कुलाँचें      मैं  भी  भरूँगी ".. ... ।



सवालों-जवाबों  के  बीच  पहुँचे  पार्क,

चमका   रही    थीं  ओस - कणों   को,

भोर           की     मनहर      रवीना,

ये   कुदरत  के आँसू   हैं  या  पसीना........?

कवितामयी / छोटे  मुँह   बड़ी  बात........!

सीधा  मन -मस्तिष्क   पर  आघात।

........ज़ारी........






मैंने   कहा -

यह   ओस   है,

उसने कहा -

"ENGLISH  में   बताओ"

DEW......जवाब  मैंने  दिया,

इसे  तो  मेरे  टीचर  ने  विडियो  में  दिखाया  था......

सुनकर  मेरे  सपनों  पर  ओस  पड़   गयी !

घर    आते-आते   सारी   ओस  झड़  गयी !!

@रवीन्द्र  सिंह यादव

दोपहर बनकर अक्सर न आया करो

दोपहर   बनकर

अक्सर  न   आया   करो,

सुबह-शाम   भी  

कभी  बन   जाया   करो। ......(1 )




चिलचिलाती   धूप    में

तपना   है दूर  तक,

कभी  शीतल  चाँदनी

में  भी  नहाया  करो।

सुबह-शाम   भी  

कभी  बन   जाया   करो। ......(2  )



सुबकता है  दिल

यादों  के  लम्बे  सफ़र  में,

कभी  ढलते  आँसू

रोकने  आ  जाया  करो।

सुबह-शाम   भी  

कभी  बन   जाया   करो। ......(3  )




बदलती   है   पल-पल

चंचल   ज़िन्दगानी ।

हमें  भी  दुःख-सुख  में

अपने  बुलाया  करो।

सुबह-शाम   भी  

कभी  बन   जाया   करो। ......(4  )



दरिया    का   पानी

हो  जाय   न   मटमैला,

झाड़न   दुखों   की धारा  में

यों   न    बहाया    करो।

सुबह-शाम   भी  

कभी  बन   जाया   करो। ......(5   )

                                  @रवीन्द्र  सिंह  यादव

नेताजी सुभाष चंद्र बोस

(23  जनवरी  जन्मदिन  पर  स्मरण ) 


एक   सव्यसाची   फिर   आया,  
48  वर्ष  सुभाष  बनकर  जिया,  
जीवट  की  नई  कसौटी  स्थापित  कर,  
रहस्यमयी  यात्रा  पर  चल  दिया ,
ज़ल्दी  में  था   भारत    माता    का     लाल, 
बिलखता  दिल  हमारा  भावों  से  भर  दिया।  



"तुम मुझे  ख़ून  दो  मैं  तुम्हें  आज़ादी  दूंगा" 
"दिल्ली  चलो " 
"जय हिन्द"  
नारे         दिए         सुभाष   ने , 
जाग   उठी   थी   तरुणाई  
उभारे  बलिदानी  रंग  प्रभाष  ने।  



भारतीयों  के  सरताज,   
युवा       ह्रदय -सम्राट, 
सुभाष   बेचैन   थे,  
देखकर  हमारी  अंग्रेज़ों   का   दमन   सहने  की  परिपाटी,  
बो  दिए  वो  बीज,  
महकने/उगलने   लगी   क्रांति-क्रांति        देश   की  माटी। 



आज़ाद  हिन्द  फ़ौज  बनी,  
अंग्रेज़ों  से   जमकर   ठनी,  
1943   से  1945   तक  ,
देश  की पहली  आज़ाद हिन्द  सरकार  बनी,  
छूटा  साथ  जापान  का,  
मिशन  की  ताक़त  छिनी,   
18  अगस्त  1945  को,  
ताइपे  विमान  दुर्घटना  हर भारतवासी  का दुःख-दर्द  बनी.... .(?) 



नेताजी   की   मृत्यु   का    रहस्य,  
आज   भी   एक  अबूझ  पहेली   है,  

मैं वर्तमान की बेटी हूँ

बीसवीं  सदी  में,

प्रेमचंद  की  निर्मला  थी   बेटी,

इक्कीसवीं  सदी   में,

नयना  / गुड़िया  या  निर्भया,

बन  चुकी   है   बेटी।




कुछ  नाम  याद   होंगे  आपको,

वैदिक  साहित्य   की  बेटियों  के-

सीता,सावित्री,अनुसुइया ,उर्मिला ;

अहिल्या ,     शबरी ,    शकुंतला ,

 गार्गी , मैत्रेयी , द्रौपदी  या राधा।




इतिहास  में

यशोधरा,  मीरा, रज़िया  या  लक्ष्मीबाई

साहित्य  में

सुभद्रा, महादेवी, शिवानी,इस्मत ,अमृता ,

 अरुंधति    या     महाश्वेता

  के   नाम  भी  याद  होंगे।



आज  चहुँओर   चर्चित  हैं-

सायना ,सिंधु ,साक्षी ,सानिया ;

जहाँ    क़दम   रखती   हैं ,

छोड़   देती   हैं  निशानियां।




घूंघट   से  निकलकर,

लड़ाकू - पायलट  बन  गयी  है  बेटी,

सायकिल  क्या  रेल-चालिका  भी  बन  गयी  है  बेटी,

अंतरिक्ष  हो  या  अंटार्टिका,

सागर   हो  या  हिमालय,

हो  मंगल  मिशन

या हो चुनौती भीषण ,

अपना  परचम   लहरा   चुकी   है  बेटी,

क़लम   से   लेकर  तलवार  तक  उठा  चुकी  है  बेटी,

फिर   भी   सामाजिक  वर्जनाओं  की  बेड़ियों  में जकड़ी  है बेटी।



सृष्टि   की   सौन्दर्यवान   कृति  को ,

परिवेश   दे  रहा   आघात   के   अमिट  चिह्न …

सैनिक की जली हुई रोटियाँ

सैनिक  ने

अंतर्जाल  पर   वीडियो  अपलोड  कर,

दिखाई  जली  हुईं   रोटियाँ,

सीमा  सुरक्षा  बल  ने  जाँच  कर  खंडन  किया।



सैनिक!

आप   नहीं  जानते,

आपकी   दिखाई

 अधजली   रोटी  ग्लोबल  ट्रेंड  बन  गयी।



हमने  तो  सिर्फ़

अपना  मन  मसोस  लिया,

ख़ुद  को  तिलमिला  लिया,

राष्ट्रीय-सुरक्षा   के  गंभीर  सवालों  से,

ख़ुद   को  खदबदा  लिया।


लेकिन........

जो-

 हमारी  राष्ट्रीय  एकता  और  अखंडता  के  लिए  ख़तरे   हैं,

उनकी   बाँछें     तो   खिल  गयी  होगीं,

अधजली   रोटी  खाने  वाली  सेना  को

दुश्मन   क्या  समझेगा ..?




सैनिक!

हमारी  चैन  की  नींद  न  उड़ाओ,

जो  मिले  वही  खाओ,

स्वदेश   के  लिए  क्या  कुछ  नहीं  सहना  पड़ता  है,

श्रम, लहू   के    साथ   यौवन    भी  वारना  पड़ता   है।



शिकायत-

 ईर्ष्या ,आक्रोश, बदलाभाव 

और  खलबली  पैदा  करती   है,

दुश्मन   को  रणनीति   का  इशारा   करती   है,

सब्र  रखो......

विमूढ़ता   और  विवेक   में  फ़र्क   रखो।




सर-ज़मीं   क़ुर्बानी    माँगती    है,

सैनिक   के   ख़ून    में  रवानी   माँगती  है,

दूसरों   का  हक़   मारने   वाले   बेनक़ाब   होंगे!

हम  बुलंद  हौसलों   के  साथ    क़ामयाब    …

फूल से नाराज़ होकर तितली सो गयी है

फूल   से  नाराज़   होकर

तितली    सो      गयी     है,

बंद   कमरों   की  अब 

ऐसी  हालत   हो   गयी   है।.........(1 )




हो   चला   सयाना    फूल    

ज़माने   के    साथ-साथ ,

मुरझाई    हैं    पाँखें  

महक   भी    रो    गयी  है।

बंद   कमरों   की  अब 

ऐसी  हालत   हो   गयी   है।.........(2  )





नसीहत  अब  कोई

हलक़   से  नीचे  जाती   नहीं,

दिल्लगी   की   प्यारी  खनक  

अब   हमसे   खो  गयी   है।

बंद   कमरों   की  अब 

ऐसी  हालत   हो   गयी   है।.........(3  )





आशियाँ    दिलक़श   बने  

जो    तेरी   शोख़ियाँ  हों,

ताज़ा  हवा  आँगन  में

बीज-ए -ख़ुलूस  बो  गयी  है।

बंद   कमरों   की  अब 

ऐसी  हालत   हो   गयी   है।.........(4 )





यादों   के   आग़ोश   में  

बैठा   हुआ  है  बोझिल  दिल,

एक   मुलाक़ात  मैल  मन  का

मनभर   धो     गयी    है।

बंद   कमरों   की  अब 

ऐसी  हालत   हो   गयी   है।.........(5 )


 @रवीन्द्र  सिंह  यादव






दूब

तूफ़ान  आएंगे,

सैलाब     आएंगे,

उखाड़ेंगे,

उन्नत , उद्दंड    दरख़्तों    को।



दूब    मुस्कायेगी,

अपनी  लघुता / विनम्रता  पर ,

पृथ्वी    पर    पड़े-पड़े   पसरने    पर।  



छाँव     न   भी  दे    सके    तो   क्या,

घात-प्रतिघात    की,  

रेतीली     पगडंडी    पर,

घाम  की   तपिश  से,

तपे     पीड़ा     के    पाँव,  

मुझपर     विश्राम     पाएंगे,

दूब  को  दुलार  से  सहलायेंगे।

@रवीन्द्र  सिंह यादव

नैसर्गिकता

सभ्यता    के    सशंकित    सागर    में,

नत -नयन    नैसर्गिकता    की     नाव,

डूबने      न    पाए,  

सुदूर      है   किनारा      तो    क्या,  

आज     मांझी    को,

सरलता      का    सुरीला     संगीत     सुनाओ,

आई  है भौतिकता

शो-केस  बनकर ,

बज  रही  है ढोलक

अक्खड़  स्वभाव   की  तनकर।



मृत्यु    का  भय   त्यागकर,  

साहस, संयम   और    पुरुषार्थ   के,

पंख     पतवार    में   लगाओ,

बैठकर  नियति  की गोद  में,

सोई   हुई    करुणा    जगाओ।  


लौट  आएंगे

हमारे  खोये  अलंकरण,

खड़े  होकर

अपनी  छत  पर

दाना  चुगने  चिड़िया  को बुलाओ। 

@रवीन्द्र  सिंह  यादव

पिता

समाचार  पढ़ा-

"बेटे   ने   सर्द   रात  में   बाप   को  घर  के   बाहर   सुला  दिया " 

संवेदनाशून्य   होते   समाज  का

यह  सच

अब   किसी   आवरण   में  नहीं   ढका   है,

अंतर्मन  आज    सोच-सोचकर   थका    है,

अपनी   ही  लाश  ढोता  आदमी,

अभी   नहीं  थका    है।



हम   क्यों   भूल   जाते  हैं,

जीवन   में   पिता   का   अतुल्य   योगदान,

क्यों   विस्मरण   हुआ  यक्ष   का   प्रश्न,

और   युधिष्ठिर   का   दिया  उत्तर  ?



दुनिया   के   दस्तूर  हों

या  अपने  पैरों  पर   खड़े   होने  की   दक्षता,    

क्षमादान   हो  या   हारी-बीमारी,

सपनों    को   पंख    लगाने   की   ललक    हो

या     तुम्हारे   टूटकर    बिखरने   पर   संबल   देना,

पिता    ने   कब   अपनी    निष्ठुरता   दिखाई ???



जानते    हो

ठण्ड   की  अकड़न  और   ठिठुरन    क्या   होती   है ?                                  

किसी   ख़ानाबदोश     परिवार   को   देखो,

कैसे   सहअस्तित्व   की  परिभाषा   गढ़ते   हैं   वे,

सभ्य-सुसंस्कृत    समाज    को,  

अपने    मूल्यों   के   सिक्कों  की    खनक /चमक   से,

चौंधियाते    रहते    हैं।

@रवीन्द्र  सिंह  यादव

नव वर्ष

Welcome  2017

Happy  New  Year


बीता  शताब्दी   का  सोलहवाँ   साल,

आ  गया   सदी   का  सत्रहवाँ   साल।



अब    छोड़ो   मन  के   मलाल,

आज    पूछो   सभी   का   हाल,

सब  हों  आबाद, रहें   खुशहाल,

हो मुबारक  सबको  नया  साल।



गत वर्ष   देश-दुनिया  में   तख़्त-ओ-ताज   बदले,

भारत   में   हज़ार    पाँच   सौ    के    नोट    बदले,

जो  मना रहे  होते  आज  परिवार  के साथ  जश्न,

वे   किसी और  दुनिया  में जाकर   बन गए   प्रश्न।  





बुज़ुर्ग   दे  गये    समय   नापने   का  तोहफ़ा,

समय    रुकता  नहीं   समझो   ये   फ़लसफ़ा* ।


जश्न   में   डूबी  रात    के   बाद,

उगता  है   प्राची*   में   सूरज     लेकर   नई   उमंगें,

उल्लास  से  भर  देती  हैं  गुनगुनी   धूप   की  तरंगें,

चलता  है  दिनभर  हाय   डियर  ....हैप्पी   न्यू   ईयर!

दीवार  पर  टाँग  दिया  जाता  है   एक   और  कलेण्डर !!

@रवीन्द्र  सिंह यादव



प्राची *  =  पूर्व  दिशा (East)
फ़लसफ़ा*  = दर्शन (Philosophy)