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बुधवार, 28 जून 2017

मैं भारत का किसान


मैं  भारत  की शान, 
कहते मुझे किसान। 


पढ़ना -लिखना सब चाहें 
अफ़सर बनना सब चाहें 
मैं  देखूँ   खेत-खलिहान।  
मैं  भारत  की शान 
कहते मुझे किसान। 


सूरज उगने से पहले जागूँ 
पशुओं का चारा लेने भागूँ 
रूखी -सूखी खाकर 
है  ऊँचा स्वाभिमान। 
मैं  भारत  की शान 
कहते मुझे किसान। 


मानसून   की  मर्ज़ी   पर 
मेरी  फसलें  उग पाती हैं 
देख - देखकर अम्बर को 
मेरी आँखें पथरा जाती हैं 
पानी  भर जाए  खेतों  में 
तब   रोपूँ   अपना   धान।  
मैं  भारत  की शान 
कहते मुझे किसान। 


खाद -बीज ,बिजली ,डीज़ल 
सब  ख़र्चे  मुझे  सताते  हैं 
शहरों में बैठे डॉक्टर /व्यापारी 
माल  लेकर मुझे बुलाते हैं 
मैं कहाँ इतना धनवान। 
मैं  भारत  की शान 
कहते मुझे किसान। 


बैंक मुझे कर्ज़ा देकर 
ठगने का जाल रचाते हैं 
कट जाता खाते से पैसा 
मौसम का हाल बताते हैं 
फसल-बीमा की ठग विद्या से 
समझो सरकारी ईमान। 
मैं  भारत  की शान 
कहते मुझे किसान। 


सरकारों के यार -दोस्त हैं 
गाँवों  के चतुर साहूकार 
बुला- बुलाकर कर्ज़ा देते 
बसूली में होती  हाहाकार 
देते -देते ब्याज क़र्ज़ का 
लुट जाते खेत - मकान। 
मैं  भारत  की शान 
कहते मुझे किसान। 


शोषण के चक्रव्यूह में
फंसते जाते ग़रीब किसान 
झूठे वादे करते -करते 
सरकारें बन जातीं निष्ठुर और अनजान 
लाखों ज़हर की गोली खाकर
तज गए अपने प्राण 
फाँसी के फंदे पर लटके मिले बेचारे किसान 
मैं  भारत  की शान 
कहते मुझे किसान। 



ओले ,बारिश ,तूफ़ान ,तुषार 
कीड़े    और   सूखे   की  मार 
फ़सल बोऊँ तो न बरसे पानी 
फ़सल  पके  तो  बरसे  पानी 
कभी - कभी होता है 
मौसम मुझपर मेहरबान 
मैं  भारत  की शान 
कहते मुझे किसान। 


जब भरपूर हुई पैदावार 
खींचे पाँव पीछे सरकार 
फ़सल में खोट बताकर 
एमएसपी पर लेने से करती इंकार 
मौज़ करते मोज़ाम्बिक  के किसान। 
मैं  भारत  की शान        
कहते मुझे किसान। 


संसद से पास हुए 
क़ानून की इज़्ज़त रख लेता हूँ 
"मैं ग़रीब परिवार से हूँ , मेरा नाम रमुआ......... सुखिया है,
मैं एनएफएसए से सस्ता राशन लेता हूँ "
मेरे घर की दीवार पर 
लिखवा दिया है सरकारी फ़रमान। 
मैं  भारत  की शान        
कहते मुझे किसान। 


सीमा पर किसान का बेटा 
दुश्मन की गोली खाता है 
मंदसौर में किसान का बेटा 
पुलिस की गोली खाता है 
धोती -कुर्ता और अंगौछा 
थी कभी मेरी पहचान 
बदले वक़्त में मैंने भी 
अब बदल दिए परिधान। 
मैं  भारत  की शान        
कहते मुझे किसान। 


हमें मिलेगा फ़सल का 
अपनी पूरा-पूरा  दाम 
जब साथ चलेंगे हम सब 
हाथ एक-दूजे का थाम  
तिलहन , अनाज या दालें 
फल , सब्ज़ी ,दूध ,मसाले 
ये सब मेरी पहचान 
क्यों करते हो मेरा अपमान ?
मैं  भारत  की शान        
कहते मुझे किसान। 
@रवीन्द्र सिंह यादव 










मंगलवार, 20 जून 2017

बारिश फिर आ गयी


बारिश फिर आ गयी

उनींदे सपनों को

हलके -हलके छींटों ने

जगा दिया

ठंडी नम  हवाओं ने

खोलकर झरोखे 

धीरे से कुछ कानों में कह दिया।


बारिश में उतरे हैं कई रंग

ख़्वाहिशें  सवार होती हैं मेघों पर

यादों के टुकड़े इकट्ठे हुए

तो अरमानों की नाव बही रेलों पर

होती  है  बरसात

जब टकराते हैं  काले गहरे बादल

फिर चमकती हैं बिजलियाँ

भीग  जाता  है धरती का आँचल।



बदरा घिर आये काले  - काले 

बावरा  मन ले  रहा हिचकोले

मयूर नाच रहे  हैं वन में

उमंगें  उठ रही हैं मन में

एक बावरी गुनगुना रही है  हौले -हौले

उड़ -उड़ धानी चुनरिया मतवाली हवा के बोल बोले।


बूंदों की सरगम

पत्तों की सरसराहट

मिटटी की सौंधी महक

हवाओं की अलमस्त  हलचल

शीशों पर सरकते पानी की रवानी

सुहाने मौसम की लौट आयी कहानी पुरानी।


खिड़की  से बाहर

हाथ  पसार  कर

नन्हीं  - नन्हीं  बूंदों को हथेली में भरना

फिर हवा के झौंकों में लिपटी फुहारों में

तुम्हारे सुनहरे गेसुओं की

लहराती, लरज़ती  लटों   का  भीग  जाना

याद है अब तक झूले  पर झूलना -झुलाना 

शायद तुम्हें भी हो ...... ?


कुम्हलाई सुमन पाँखें

निखर उठी हैं

एक नज़र के लिए

चाँद पर लगे हैं पहरे 

चला हूँ  फिर भी सफ़र के लिए 

यादों का झुरमुट

हो गया है फिर हरा

मिले हैं मेरे आसूँ  भी

है जो बारिश का पानी

तुम्हारी गली से बह रहा।


हमसे आगे

चल रहा था कोई

किस गली में मुड़ गया

अब क्या पता

बेरहम बारिश ने

क़दमों  के  निशां  भी  धो डाले .........

@रवीन्द्र सिंह यादव

गुरुवार, 15 जून 2017

पत्थर और फूल


ख़्वाब जब -जब
खंडहर में भटकते हैं                                                         
तो  बेजान  पत्थरों  से
गुफ़्तुगू  करते  हैं।

                                                           
ख़ामोशियों  के साये में
दिल शोलों में जलता है
ज़ुबाँ  पत्थर की होती है
एहसास  गुज़रें  कहाँ से
रास्ते के पत्थर भारी हो चले हैं।
                                                             

 फ़ना  हो  वजूद
उससे पहले
जगाओ सोये हुए दर्द
सारे ग़मों का तूफ़ान                                                              
नई  राह ढूँढ़  लेगा।


                                                             
ज़माने की  बातों से                                                              
ख़फ़ा  हैं  पत्थर                                                              
ये कैसी रंजिश है
मोम से दिल को
संग -दिल  कह दिया
बात बढ़ते -बढ़ते  कभी
पत्थर के सनम कह दिया।


वक़्त बताता है पत्थर की  क़दर
पाषाण -युग  से  ऐतिहासिक ढाचों तक
इमारत की बुनियाद हो / मूर्ति हो
या कोई शिलालेख
विश्वास  पत्थरों में ही तलाशा गया
सदियों से टिके हैं पत्थर
निखरे हैं ख़ूब  जब -जब तराशा गया।


पत्थरों  से गहरे
घाव फूल देते हैं
गुलों की हिफ़ाज़त में
जान अपनी शूल देते हैं
फूल पत्थरों पर उकेरे जाते हैं
बेवफ़ा आशिक़
पत्थर-दिल   पुकारे  जाते  हैं                                                         
लोग कहते हैं -पत्थर पिघल जाते हैं
फिर भी  घर  की   दीवारें    बनाते हैं।


पत्थरों को  नाज़ है
दिल  से चाहने वालों पर
जो नाम लिख गए मिटे नहीं
फूलों की तारीफ़ पत्थर का  दिल  नहीं जलाती
फूलों के आसपास भँवरे गाते तितलियाँ मड़रातीं
होता है  पत्थरों को भी फ़ख़्र
जब कोई क़द्रदान क़रीब होता है                                              
होती हैं  तमन्नाएँ पत्थर की भी
तज़ुर्बा  फूल से कहीं अधिक होता है।
         
                
धूप ,बारिश ,सर्द हवाऐं
मिला देती हैं ख़ाक़ में पत्थरों को
कौन रोक पाया है मिटकर बनने से दोबारा  पत्थरों को
झेली बहुत हैं पत्थरों ने
तोहमतें   बदनामियाँ
पत्थरों में भी होती हैं
कुछ ख़ूबियाँ रानाइयाँ                        
बुलबुलों की सदायें सुन                                                      
बहार- ए -चमन  ग़ुरूर न  कर !
गुज़रे हैं ज़माने पत्थरों पर चल  चलकर !!
                                           
@रवीन्द्र सिंह यादव

                                                               

शुक्रवार, 26 मई 2017

सरिता

नदी  का  दर्द 


कल-कल  करती करवटें  बदलती  बहती  सरिता

का  आदर्श  रूप

हो गयी  अब   गए  दिनों  की  बात ,

स्वच्छ  जलधारा  का  मनभावन  संगीत

हो  गयी  अब  इतिहास  की  बात।



शहरीकरण  की आँधी  में

गन्दगी   को  खपाने   का

एकमात्र   उपाय / साधन 

एक  बे-बस  नदी  ही  तो  है ,

पर्यावरण  पर  आँसू  बहाने  के  लिए

सदाबहार  मुद्दा  हमारे  द्वारा  उत्पादित  गन्दगी  ही तो  है।




खुले  में  पड़ा  मल  हो

या

सीवर  लाइन  में  बहती  हमारी  गन्दगी,

समाज   की   झाड़न   हो

या

बदबूदार  नालों   में  बहती  बजबजाती  गंदगी

सब पहुँचते  हैं  एक  निर्मल  नदी  की  पवित्रता   भंग  करने

जल  को  विषाक्त / प्रदूषित   बनाने।



नदी   के  किनारों  पर

समाज   का   अतिक्रमण,

है   कुंठित  मानवीय  चेष्टाओं  का  प्रकटीकरण।




प्रपंच के  जाल  में  उलझा  मनुष्य

नदी  के  नाला  बनने  की  प्रक्रिया   को

 देख  रहा  है  लाचारी  से ,

नदियों  के  सतत  सिमटने  का  दृश्य

फैलता  जा  रहा  है  पूरी   तैयारी    से।



नदी  के  किनारे  बैठकर

 कविता  रचने  की  उत्कंठा

जर्जर  पंख  फड़फड़ाकर  दम  तोड़  रही  है ,

बहाव  में  छिपी  ऊर्जा  के  लिए

नदी  की  धारा  भौतिकता   मोड़  रही  है।



नदी  से अब  पवित्र  विचारों  का  झौंका  नहीं

नाक   सिकोड़ने  को  विवश  करता

सड़ांध  का  गुबार  उठता  है ,

हूक  उठती  है  ह्रदय  में

नदी  के बिलखने  का 

स्वर  उभरता है।




नदी अपने  उदगम  पर  पवित्र  है

लेकिन......

आगे   का  मार्ग

गरिमा   को  ज़ार-ज़ार  करता है ,

 बिन  बुलाये  मिलने  आ  रहा

गन्दगी  का  अम्बार

गौरव  को  तार-तार  करता है।



नदी  चीखती  है 

कराहती  है

कहती  है -

ज़हरीले  रसायन ,मल ,मूत्र ,मांस ,मलबा ......प्लास्टिक  और  राख

क्यों  मिलाये  जा  रहे  हैं  मुझमें......?




मासूम  बचपन  जब  मचलता  है

नदी  में  नहाने  को

देख   समझकर  मेरा  हाल

कहता  है  मुझे  गंदा  नाला

और  रोक  लेता  है  अपनी  चंचलता  का  विस्तार

कोई  बताएगा  मुझे ......

आप , तुम  में  से

किसी  मासूम  को  न  समझा  पाने  में 

मेरा  दोष  क्या  है ???

@रवीन्द्र  सिंह यादव


गुरुवार, 25 मई 2017

नज़दीकियाँ



ज़रा-ज़रा  सी   बात   पर

रूठना, मचलना  भा गया ,

देखने   चकोर   चाँद   को

नदी   के  तीर  आ  गया। ........ (1)




गुफ़्तुगू    न   सुन    सके

कोई  मिलन  न  देख  ले,

दो    दिलों  के  आसपास

बन  के  शामियाना  कोहरा  छा  गया।

देखने  चकोर  चाँद  को

नदी  के  तीर  आ  गया। ........ (2)




ये     घड़ी     रुकी     रहे

रात    जाए   अब   ठहर,

दीवानगी  का ये  ख़याल

बेताबियों  को  भा  गया।

देखने   चकोर  चाँद  को

नदी  के  तीर   आ  गया। ......... (3)




ज़िन्दगी     की      राहों     में

फूल      हैं     तो     ख़ार    भी  ,

पयाम    एक   फ़ज़ाओं    का  

मरहम ज़ख़्म  पर लगा गया।

देखने      चकोर     चाँद    को

नदी     के    तीर   आ     गया। ........ (4)




तमन्नाऐं    बन  के    रौशनी

जगमगाती  हैं    डगर -डगर ,

बेख़ुदी     के        दौर       में

भूली  राह  कोई  दिखा गया।

देखने   चकोर      चाँद    को

नदी  के    तीर   आ     गया। ........ (5)

@रवीन्द्र सिंह यादव

इस रचना को सस्वर सुनने के लिए लिंक -https://youtu.be/s0aRSv3lenl


शब्दार्थ / WORD  MEANINGS -

ज़रा = थोड़ी ,थोड़ा ,A  Bit 

चकोर = तीतर की भांति दिखने वाला पक्षी जो साहित्य में चन्द्रमा के प्रेमी के रूप में वर्णित है ,Alectoris          chukar 

तीर = किनारा ,बाण , River Bank 

गुफ़्तुगू =बातचीत ,Speech ,Conversation 

शामियाना = मंडप ,वितान ,छत्र , Canopy  ,Awning 

कोहरा = कुहासा ,Fog,Mist 

घड़ी = पल , moment 

दीवानगी = पागलपन , होश-ओ हवास  खोना -Madness  ,Insanity

ख़याल = विचार ,Thought ,Idea 

बेताबियाँ = बेसब्री,बेचैनी  ,Restlessness 

ख़ार = काँटा  , A Thorn 

पयाम = संदेश , Message 

फ़ज़ाओं =  वातावरण ,Weather, Atmosphere 

तमन्नाऐं = इच्छाएँ ,Desires 

डगर = रास्ता ,Path ,Road 

बे-ख़ुदी = स्वयं को भूल जाना ,Intoxication 

इस रचना को सस्वर सुनने के लिए लिंक -https://youtu.be/s0aRSv3lenl       



मंगलवार, 16 मई 2017

इंतज़ार




पतंगे   आएंगे  जलने  सीने में

जिनके सुलगती आग है बाक़ी , 

सुनो     संगीत     जीवन    का 

मनोहर       राग      है     बाक़ी।  ........ (1)




भेजा है खत बहार  ने  लिख 

आ          रही         हूँ        मैं,

जहाँ   पहुँची  नहीं    दुनिया  

अभी  एक  बाग़   है    बाक़ी।  

सुनो   संगीत   जीवन    का 

मनोहर    राग    है     बाक़ी।    ........ (2) 



कभी    मिलते   नहीं   साहिल 

सिमट    जाती     हैं     दूरियाँ,

सूखी       एक      नदिया       है 

समुंदर  सा  अनुराग  है  बाक़ी।    

सुनो    संगीत    जीवन      का 

मनोहर          राग    है   बाक़ी।    ........ (3) 



चुरा   लाओ   कहीं  से   तुम

छलकती   आँख   का  पानी,  

धो  सकूँ    दामन  पर  लगा

 एक  गहरा  दाग़  है   बाकी।  

सुनो   संगीत   जीवन    का 

मनोहर    राग    है     बाक़ी।    ........ (4 )  




सैयाद  की  मर्ज़ी से मायूसियों में 

घिर       जाना     बेहतर       नहीं ,

पहुँचो मक़ाम   तक   महफूज़  है 

रहनुमा   जो   बेदाग़    है    बाक़ी। 

सुनो      संगीत      जीवन     का 

मनोहर        राग       है     बाक़ी।    ........ (5)  




अंधेरों  में सन्नाटों  का  निज़ाम 

डराए      जब     कभी     तुमको 

देख  लेना   आँधियों     में     भी  

जल  रहा  एक  चराग़  है  बाक़ी।

सुनो      संगीत     जीवन     का 

मनोहर       राग     है       बाक़ी।    ........ (6)  
    


बदलेगा       वक़्त    सुहानी   भोर   का  

सुरमई              संगीत              लेकर,                 

निकलेगा  चाँद    फिर   अरमानों   का 

सहरा में  चमन  का  सुराग  है  बाक़ी। 

सुनो           संगीत         जीवन     का 

मनोहर        राग         है          बाक़ी।    ........ (7)  

@रवीन्द्र  सिंह यादव


रविवार, 7 मई 2017

सत्ता


जनतंत्र          में         अब 



कोई           राजा        नहीं



कोई        मसीहा        नहीं



कोई     महाराजा        नहीं



बताने     आ    रहा   हूँ  मैं,



सुख -चैन से सो रही  सत्ता



जगाने   आ   रहा   हूँ    मैं। ......... (1 )






तेरे      दरबार     में     इंसान 



कुचला            पड़ा             है ,



तेरे      रहम-ओ -करम    पर



 क़ानून    बे-बस  खड़ा       है ,



तेरे              वैभव            की



चमचमाती  चौखट  की  चूलें



हिलाने    आ   रहा   हूँ      मैं।



सुख -चैन  से  सो  रही   सत्ता



जगाने      आ    रहा   हूँ    मैं। ......... (2 )






संवेदना         को           रौंदकर



शोर        के        ज़ोर           को  



आगे   बढ़ाती   जा  रही   है   तू ,



भीड़       को       उन्माद      का  



रस   पिलाती  जा   रही  है   तू ,



तेरी    औक़ात-ओ -शान     को     



दर्पण  दिखाने आ रहा  हूँ    मैं।



सुख -चैन    से   सो  रही  सत्ता



जगाने     आ    रहा    हूँ      मैं। ......... (3 )






देखे    हैं      अब      तक      मैंने 



तेरे        यार  -  दोस्त        सभी ,



इनमें      होते     नहीं    शामिल



दुखियारा /  दुखियारी       कभी ,



जाँघ         कट        जाने      पर 



कमर    से    लकड़ी     बांधकर



हल जोतते  किसान   की  पीड़ा



सुनाने       आ    रहा     हूँ      मैं।



सुख -चैन   से    सो   रही   सत्ता



जगाने    आ      रहा     हूँ      मैं। ......... (4 )







मेरा             हक़         मारकर 



छकों      को    दे   रही   है    तू



नाव  /  पतवार             हमारी 



बैठाकर   किसे  खे  रही  है   तू ......?



भूख  से   व्याकुल   बच्चों   की 



तड़प    न     सह    पाने      पर 



एक     माँ      के      आग      में 



जल  जाने  की   जलन / तपन



महसूस कराने आ   रहा  हूँ   मैं।



सुख -चैन   से    सो    रही  सत्ता



जगाने      आ     रहा      हूँ    मैं। ......... (5 )






बेकारी  के दौर में  दर-दर  भटकते



मायूस          हैं        युवामन,



नैराश्य     के     ख़ंजर       ने 



घायल   कर      दिए  यौवन ,



अभावों        में       मचलते 



स्वाभावों     का        गणित



पढ़ाने    आ     रहा   हूँ    मैं।



सुख -चैन  से  सो  रही सत्ता



जगाने    आ   रहा    हूँ    मैं। ......... (6)






दरिंदों      की       हवस      ने



जीवन  तबाह  कर  डाले  कई,



स्त्री - जीवन        में         क्यों 



रोज़    चुभते   हैं   भाले   कई,



रोज़  मर मरकर  जीने  की  टीस  का अहसास



सुनाने  आ   रहा    हूँ    मैं।



सुख -चैन  से  सो रही सत्ता



जगाने    आ    रहा   हूँ  मैं। ......... (7)







राज  करने  का लायसेंस  तेरा  क़ाएम   रहे 



तो. .....         



लड़ाती           है              हमें 



आपस   में  बैर   रखने    को, 



कहती  है  होकर  ज़ालिम  तू



मज़लूम  पर पैर  रखने   को ,



तेरी      मर    चुकी      ग़ैरत 



ज़िंदा  कराने  आ  रहा हूँ  मैं।



सुख -चैन    से  सो रही सत्ता



जगाने   आ    रहा    हूँ    मैं। ......... (8)






तेरे       आत्ममुग्धी         फ़ैसलों         से 



जनता  तकलीफ़   में  पड़ती  जा  रही   है,



किसी      का     घर     भर    दिया     तूने



ग़रीबों  से  रोज़ी   बिछड़ती  जा   रही  है,



तेरी      बदमाशियों        का        चिट्ठा



ललाट  पर  तेरे लटकाने  आ रहा  हूँ  मैं।



सुख -चैन     से      सो       रही        सत्ता



जगाने        आ         रहा        हूँ         मैं। ......... (9)









झौंक        दिया       सारा       जीवन 



औरों     के         सुख    की  चाह   में ,



राष्ट्र       का        निर्माण         करने 



गढ़          गया        हूँ       थाह       में ,




श्रेय  लेने  की बे-हयाई  तुझे मुबारक़  


स्वराज     के     मर्म     का    परचम



लहराने       आ       रहा        हूँ     मैं।



सुख -चैन     से     सो     रही     सत्ता



जगाने      आ        रहा       हूँ       मैं। ......... (10)


@रवीन्द्र  सिंह यादव







शब्दार्थ / Word  Meaning 



जनतंत्र   = लोकतंत्र ,Democracy



 मसीहा  = दुःख - दर्द हरने वाला ,Healer



रहम-ओ -करम = मेहरबानी ,Grace & favour, MERCY & KINDNESS 



बे-बस = शक्तिहीन ,Powerless



वैभव=शान -शौकत ,भव्यता ,Wealth ,Grandeur



चौखट = किवाड़ों  की चौखट , Door frame



चूलें = जोड़ ,Dovetail ,Joints



उन्माद =ज़ुनून ,सनक ,पागलपन ,Hysteria ,Madness ,Mania



औक़ात-ओ -शान = क्षमता और गर्व ,Status /Capacity &Pride



जांघ = जंघा ,Thigh



छकों = छके हुए ,मन भर कर खाये हुए ,तृप्त ,संतृप्त ,Fulfillment ,Saturated ,wealthy persons


ख़ंजर= कटार , DAGGER 


खे = नाव खेने (Moving Boat ) की क्रिया



अभाव = कमी , अनुपलब्धता,Scarcity ,Unavailability



ज़ालिम = दुष्ट ,cruel



मज़लूम = घायल /पीड़ित , Injure ,Oppressed



आत्ममुग्धी = ख़ुद को प्रसन्न करने वाले ,Self pleasent



महरूम = वंचित ,Deprived ,Prohibited 



ललाट =माथा ,Forehead



थाह =गहराई ,Depth



बे-हयाई   = बेशर्मी   ,निर्लज्जता ,धृष्टता , Being Shameless



परचम =ध्वज ,झंडा ,Flag

गुरुवार, 27 अप्रैल 2017

दास्तां



तेरी  हर शय

तेरी  हर  शर्त

है   क़बूल  मुझे ,

ज़िन्दगी  तू

अब  सिखा  दे

जीने  का उसूल  मुझे।  ......... (1 )




कोई   गुज़रा

कोई  मुक़रा

कोई  सिमटा

अपने - अपने  दायरों में ,

मैं  भी एक गवाह  हूँ  सफ़र  का

यों   ही  न  भूल  मुझे।

ज़िन्दगी  तू

अब  सिखा  दे

जीने  का  उसूल  मुझे।  ......... (2 )




दिल  में

उतर  जाता  है  कोई

तितली  सी  ज़हानत    लिए,

पंख  जाते   हैं  उलझ

काँटों  में

कहता  है   कोई

बेमुरब्बत   फूल   मुझे।

ज़िन्दगी  तू

अब  सिखा  दे

जीने  का  उसूल  मुझे।  ......... (3 )




मंज़िल  की  ओर

कारवाँ  बढ़ने  का

सिलसिला  चलता  रहा ,

हासिल  हो  न  हो

मक़सद

इंतज़ार  का   सिला

करना है वसूल मुझे।

ज़िन्दगी  तू

अब  सिखा  दे

जीने  का  उसूल  मुझे।  ......... (4  )






ले    डूबेगा  एक  दिन

क़तरे    को

दरिया   बनने   का शौक़ (?)

दामन  से  लिपटकर

एक   दिन  सुनाएगा

दास्तां  अपनी शूल मुझे।

ज़िन्दगी  तू

अब  सिखा  दे

जीने  का  उसूल  मुझे।  ......... (5 )




वक़्त  फिसला  है  

रेत     की   तरह 

"रवीन्द्र "  के हाथों  से,

सज़दे  में झुक  गया  हूँ  

समझ   न 

पुल  से   गुज़रने   का  महसूल  मुझे। 

ज़िन्दगी  तू

अब  सिखा  दे

जीने  का  उसूल  मुझे।  ......... (6  )

@रवीन्द्र  सिंह  यादव


मंगलवार, 4 अप्रैल 2017

ऐ हवा चल पहुँचा दे मेरी आवाज़ वहाँ


ताजमहल  को  देखते आगरा  क़िले  में क़ैद  शाहजहां  ने शायद  ये  भी  सोचा  होगा.........  

( मुग़ल  बादशाह  औरंगज़ेब  अपनी  क्रूरता  के लिए  कुख़्यात  हुआ।  बड़े  भाई   दारा  शिकोह  सहित  अपने  तीनों  भाइयों ( दो अन्य  शाह शुज़ा  व  मुराद बख़्श )  को    मौत  के घाट  उतार  कर वृद्ध  पिता  शहंशाह  शाहजहां  को  विलासता  पर जनता  का  धन   ख़र्चने ( ताजमहल का निर्माण सन 1632 में प्रारम्भ  हुआ जोकि  अगले 20  वर्षों  में पूरा हुआ )  के  आरोप में  सन  1658 में  आगरा  के लाल  क़िले ( मुग़ल सम्राट  अक़बर  द्वारा निर्मित 8  साल निर्माण कार्य  चलने के बाद सन  1573  में बनकर तैयार हुआ ) में क़ैद  कर  अति मानव  औरंगज़ेब  गद्दी  पर बैठा।  शाहजहां  द्वारा  कराये  गए  ताजमहल  के  निर्माण  का  औरंगज़ेब  ने तीखा  विरोध  किया था।     
            हालांकि मुग़ल बादशाह  औरंगज़ेब  के बारे  में उल्लेख  मिलते  हैं कि  वह  अपने  निजी ख़र्च   के लिए  टोपियाँ  सिलने   और  क़ुरान  की नक़ल ( कॉपी )  तैयार  करने  से हुई  कमाई  का उपयोग  किया करता था।     
          आगरा के लाल  क़िले  से  दक्षिण -पूर्व  दिशा  में( ढाई किमी  दूरी )  यमुना  के किनारे  ताजमहल  स्पष्ट  दिखाई  देता  है।  शहंशाह  शाहजहां  ने अपनी  मृत्यु ( सन  1666 , आयु  74  वर्ष ) से  पूर्व  नज़रबंदी  के लगभग  साढ़े  सात  साल  कैसे तन्हा  रहकर  गुज़ारे  होंगे  जिसने  30 साल  ख़ुद  शहंशाह  का ताज  पहनकर  वक़्त  की  आती -जाती  रौनकों  को   जिया  हो.................................ज़ारी .....





              इंतक़ाल  के बाद  शाहजहां  को भी ताजमहल में  उनकी प्यारी बेग़म  मुमताज़ महल ( जोकि  सन  1631  में ख़ुदा  को प्यारी  हो गयी थीं ) की क़ब्र  के बग़ल   में दफ़नाया  गया।

             पेश   है   एक   रचना  जिसे  मैं  अपने  कल्पनालोक  में  शाहजहां  के  जज़्बात    कहूँगा। त्रुटियों  के  लिए  क़लम  के  सरताज, कला  के कद्रदां   क्षमा  करें ,उपयुक्त  सुझाव  दें ....    -  रवीन्द्र  सिंह  यादव )


ऐ  हवा  चल 


पहुँचा    दे     मेरी    आवाज़  वहाँ,


मुंतज़िर   है   कोई


सुनने  को   मेरे   अल्फ़ाज़  वहाँ। ..... (1)


दूरियां   बन गयीं  


ज़माने   ने  ढाया   है  क़हर ,


मैं   यहाँ   क़ैद   क़िले   में  


दफ़न      मेरी      मुमताज़   वहाँ। 


मुंतज़िर  है   कोई  


सुनने   को  मेरे  अल्फ़ाज़   वहाँ। .......(2)



गुज़रेंगे   लम्हात -ए -ज़िन्दगी  


अपनी   रफ़्तार   लिए ,


तराने  गुनगुनायेगी  ज़ुबां  


बजेंगे  धड़कनों    के  साज़   वहाँ। 


मुंतज़िर  है   कोई  


सुनने   को  मेरे  अल्फ़ाज़   वहाँ। ...... (3)



लोग  ढूँढ़ेंगे   दर्द-ओ -सुकूं 

  
मोहब्बत  की इस  निशानी  में,


देखने   आएगी  दुनिया  


साहिल -ए -जमुना खड़ा  है  ताज  वहां। 


मुंतज़िर  है   कोई  


सुनने      को      मेरे     अल्फ़ाज़   वहाँ। .......(4)



वो   दिन   भी  आएगा  


हज़ारों दिल मलाल से  भर जायेंगे,


सहेजेगी   हुक़ूमत    मेरे   जज़्बात  


खड़ा           होगा       समाज   वहाँ।    


मुंतज़िर  है   कोई  


सुनने    को   मेरे   अल्फ़ाज़   वहाँ। ...... (5)



मेरे  जज़्बे   को  सलाम  आयेंगे  


सराहेंगे   कद्रदां   शिल्पकारों  को,


प्यार   नफ़रत   से  बड़ा  होता  है 


कहेगा अफ़साना उनसे जो नहीं आज  वहाँ।  


मुंतज़िर  है   कोई  


सुनने         को        मेरे      अल्फ़ाज़   वहाँ। ........(6)



लिख  देंगे  एक  प्यारी  सी  नज़्म 


देखकर  पुरनूर  मंज़र ,


जब    भी   आएंगे....तड़पेंगे 


क़लम         के         सरताज    वहाँ। 


मुंतज़िर  है   कोई  


सुनने    को   मेरे   अल्फ़ाज़   वहाँ। ........(7)


नज़र  भी  बेवफ़ा  हो  गयी  है  


आलम-ए -तन्हाई   में ,


नए   चश्म -ओ -चराग़    होंगे 


ज़माना          करेगा      नाज़   वहाँ 

     
मुंतज़िर  है   कोई  


सुनने    को   मेरे   अल्फ़ाज़   वहाँ। ........(8)


 जाने -अनजाने  गुनाहों  की  


सज़ा  मुझे  देना  मेरे  मौला ,


तब  इश्क   की मासूमियत   के 


खुलेंगे       धीरे-धीरे      राज़    वहाँ। 


मुंतज़िर  है   कोई  


सुनने    को   मेरे   अल्फ़ाज़   वहाँ। ........( 9 ) 



पास   है  जो   ख़ज़ाना -ए -रौनक 


लगा   ले  अपने  दिल  से  ऐ "रवीन्द्र ",


यादों   के  पहलू   में आकर  


लोग  परखेंगे  वक़्त  का  मिज़ाज  वहाँ। 


मुंतज़िर  है   कोई  


सुनने       को     मेरे      अल्फ़ाज़   वहाँ। 

ऐ  हवा  चल 


पहुँचा    दे    मेरी    आवाज़   वहाँ,


मुंतज़िर   है   कोई


सुनने  को   मेरे   अल्फ़ाज़   वहाँ। ....... ......... (10 )                                 

 @रवीन्द्र   सिंह  यादव 


शब्दार्थ ( Word -Meanings )

मुंतज़िर = किसी  के इंतज़ार  में , Waiting  for  somebody ,

अल्फ़ाज़ =  शब्द , Words ,

क़हर =विपत्ति , Havoc ,

लम्हात - ए -ज़िन्दगी  = ज़िन्दगी  के  लम्हे , क्षण , Moments of  life ,


तराने = सुमधुर , सस्वर  गीत , A  kind  of  songs  ,symphony ,


ज़ुबां = जीभ , Tongue ,


साज़ = वाद्य -यंत्र , Apparatus  for  music ,


दर्द -ओ सुकूं =  पीड़ा  और  चैन , pain  & relief ,


साहिल-ए -जमुना =  यमुना नदी का किनारा , Bank  of  river  Yamuna ,


ताज = मुकुट , Crown ,


मलाल = दुःख , Grief ,


हुक़ूमत = सत्ता ,शासन ,Governance ,


जज़्बात  =भाव ,Emotions ,


जज़्बे = जज़्बा ,भाव , Emotion ,


कद्रदां = गुण , कला  आदि  परखने  वाला , One who  appreciate ,


शिल्पकार = कारीग़र ,शिल्पी ,Architect,


अफ़साना =क़िस्सा  ,कहानी , Tale,fiction ,legend ,


नज़्म =कविता ,छंद ,गीत ,ग़ज़ल ,Poetry ,verse,


पुरनूर =बेहद  चमकदार , Filled with  light , very  bright ,


मंज़र = दृश्य ,scene ,


क़लम = लेखनी ,Pen 


क़लम   के  सरताज  =शब्दों  के  जादूगर ( रचनाकार , शायर ,कवि ,लेखक  आदि ) शब्द -शिरोमणि ,                                     अग्रगण्य ,Leader ,chief ,Poet ,Shayar ,


आलम-ए -तन्हाई  =  अकेलेपन  की हालत , दशा , Stage  of  loneliness,  


चश्म -ओ -चिराग़ = सबसे  अधिक  प्रिय , Loved  one , Light  of  eyes.  


नाज़ =गौरव,Pride 


इश्क़ = प्यार ,LOVE ,


राज़ = रहस्य , Secret ,


मासूमियत = निर्विकार  भाव की  अवस्था  ,Innocence,


ख़ज़ाना -ए -रौनक = ज़िन्दगी  के  खूबसूरत व   उजले पलों का  भंडार , Treasure  of  good  time ,


पहलू =पक्ष ,सुखदायी  आश्रय ,side ,shade ,


मिज़ाज =    स्वभाव ,Temperament

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