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ऐ हवा चल पहुँचा दे मेरी आवाज़ वहाँ

ताजमहल  को  देखते आगरा  क़िले  में क़ैद  शाहजहां  ने शायद  ये  भी  सोचा  होगा.........   ( मुग़ल  बादशाह  औरंगज़ेब  अपनी  क्रूरता  के लिए  कुख़्यात  हुआ।  बड़े  भाई   दारा  शिकोह  सहित  अपने  तीनों  भाइयों ( दो अन्य  शाह शुज़ा  व  मुराद बख़्श )  को    मौत  के घाट  उतार  कर वृद्ध  पिता  शहंशाह  शाहजहां  को  विलासता  पर जनता  का  धन   ख़र्चने ( ताजमहल का निर्माण सन 1632 में प्रारम्भ  हुआ जोकि  अगले 20  वर्षों  में पूरा हुआ )  के  आरोप में  सन  1658 में  आगरा  के लाल  क़िले ( मुग़ल सम्राट  अक़बर  द्वारा निर्मित 8  साल निर्माण कार्य  चलने के बाद सन  1573  में बनकर तैयार हुआ ) में क़ैद  कर  अति मानव  औरंगज़ेब  गद्दी  पर बैठा।  शाहजहां  द्वारा  कराये  गए  ताजमहल  के  निर्माण  का  औरंगज़ेब  ने तीखा  विरोध  किया था।
            हालांकि मुग़ल बादशाह  औरंगज़ेब  के बारे  में उल्लेख  मिलते  हैं कि  वह  अपने  निजी ख़र्च   के लिए  टोपियाँ  सिलने   और  क़ुरान  की नक़ल ( कॉपी )  तैयार  करने  से हुई  कमाई  का उपयोग  किया करता था।
          आगरा के लाल  क़िले  से  दक्षिण -पूर्व  दिशा  में( ढाई किमी  दूरी )  यमुना  के किनारे…

मैं मज़दूर हूँ

मैं       मज़दूर      हूँ

किंतु   मज़बूर   नहीं,

राह      मिल      गई

तो  मंज़िल  दूर  नहीं ।



बांध  बनाऊँ  सड़क  बनाऊँ,

बाजारों  की  तड़क-भड़क  बनाऊँ,

जीवन की राहें औरों  की आसान  बनाऊँ,

ख़ुद  पग-पग  पर अपमान सहूँ  ग़म  खाऊँ।




हथियार  बनाऊँ  साज़  बनाऊँ,

सुई       बनाऊँ  जहाज़  बनाऊँ ,

रेल   बनाऊँ   मंच    सजाऊँ,

न       कोई   प्रपंच     रचाऊँ। 



लोग  कहते  हैं -

बादशाहों  की  पसंद  निर्मम  थी

ख़ून -पसीना बहाने  के बाद

कटवा  दिए  मेरे हाथ ,

कैसा  क़ानून  है  ....... ?

न्याय  क्यों   लगता   नहीं  मेरे  हाथ।



मुझपर   आरोप  है

आबादी  बढ़ाने  का ,

कोई  नहीं  सोचता

मेरी  मुश्किलों  की परिधि  घटाने  का।



मेरी  झोपड़ी में

आज भी दिया जलता  है,

अँधेरे  महलों  को

मेरा  रोशन  चेहरा  खलता   है।



ईश्वर  के  नाम   पर

धूर्त  ठग   लेते   हैं  मुझे ,

पीढ़ी -दर -पीढ़ी  चक्रव्यूह  रचकर

शिक्षा और  साधन  से दूर  कर देते  हैं मुझे।




आ  गयी  मशीनें

छीनने  मेरे  मुँह  का  निबाला ,

हाथ   आया  जो  रुपया

बुलाकर  झपट   लेती   मधुशाला।



दबी  हुई  है  मेरी  चीख

 उन  महलों  के    नीचे,

आवाज़  बुलंद करके  रहूँगा

नहीं   …

पूँजीवाद का शिकंजा

भिखारी  बनाने पर तुला  है  पूँजीवाद, 
सिसकियाँ   भर  रहा   है  समाजवाद। 


इतिहास के नाज़ुक  मोड़  पर 
खड़े  होकर    हम 
भूमंडलीकरण  को  कोस  रहे  हैं, 
 देख  भूखे  पेट  सोतों   को 
अपना    मन      मसोस  रहे  हैं।  


युद्धग्रस्त  देशों  में   
भूख   का   तांडव
पिघलाता  नहीं  अब  दिल  हमारा,
आक्रोश  और क्षोभ  से भरा  मन 
अब  असहाय  के  लिए  खोलता  नहीं  सहयोग  का  पिटारा।  


आच्छादित   है  मानवीय - संवेदनाओं  पर 
स्वार्थ  का  मज़बूत     आवरण,  
थाम लेता  है  बार-बार 
मूल्यों    का   होने  से  जागरण । 


बढ़ती  ग़ैर -बराबरी ,
सामाजिक - ध्रुवीकरण,

अब ,
ग़रीब -अमीर  के बीच  स्थापित   
कालजयी  खाई  को  और चौड़ा  कर रहे  हैं, 
पूँजीवाद  का  विकराल  रूप  प्रकट  हो गया  है ,
दुनिया  की आधी  संपत्ति  पर  8  धनकुबेरों  का कब्ज़ा  हो गया है ,
भारत में अब 1 % लोगों का देश की 58%  संपत्ति  पर कब्ज़ा  हो गया  है। 



आजीविका  के  लिए  हर  दिन  
संघर्ष   करने  वाला 
हाथ   मल   रहा  है ,
सरकारों  का  सत्ता  में  बने रहने   की चिंताओं का  दौर  चल  रहा  है।


सरकारें  संचालित  हैं ,

धनकुबेरों  की  मंशा  से,  
ज़ेबें   हमारी …

आयी राम की अवध में होली

आयी   राम    की

अवध   में    होली ,

छायी  कान्हा  की

बृज    में   रंगोली।



पक   गयी  सरसों

बौराये    हैं   आम,

मनचलों  को  अब

सूझी   है  ठिठोली।

छायी   कान्हा  की

बृज    में   रंगोली।



भाये       मन      को

रंग    अबीर   गुलाल ,

मस्ताने    बसंत    में

कूक  कोयल   बोली।

छायी    कान्हा    की

बृज      में     रंगोली।





मिट     गए   मलाल

मलने     से   गुलाल,                                                                                                                                         
भरी मायूस मन  की

खुशियों   ने   झोली।

छायी    कान्हा   की

बृज     में     रंगोली।













खेलो     होली    बन


राधा     नन्द    लाल ,


पिचकारी    ने    बंद


राह    अब     खोली।


छायी     कान्हा   की


बृज      में      रंगोली।




@रवीन्द्र  सिंह यादव


इस रचना  का यू  ट्यूब पर  (चैनल - MERE SHABD--SWAR) लिंक -https://youtu.be/ufs7srNvtAU

Zindagi ka safar pagdandiyon par-1.

Dheere-dheere zakhm saare ab bharne ko aa gaye.

Ye kahaan se aa gayee bahar hai.

ये कहाँ से आ गयी बहार है

ये          कहाँ         से

आ        गयी     बहार   है  ,

बंद                     तो

मेरी   गली   का  द्वार  है। 



ख़्वाहिशें     टकरा     के

चूर          हो         गयीं,

हसरतों        का       दर्द

अभी         उधार       है।

बंद                     तो

मेरी   गली   का  द्वार  है।




नफ़रतों        के        तीर

छलनी  कर   गए   जिग़र   ,

वक़्त    लाएगा     मरहम

जिसका     इंतज़ार      है।

बंद                     तो

मेरी   गली   का  द्वार  है।




बदल         गए       हैं

इश्क़     के   अंदाज़   अब,

उल्फ़तों                   का

सज   गया    बाज़ार   है।

बंद                     तो

मेरी   गली   का  द्वार  है।




अरमान  बिखर  जाएँ  तो

संभाल     लेना         दिल,

छीनता       है           एक

वो      देता      हज़ार    है।  

बंद                     तो

मेरी   गली   का  द्वार  है।



टूटते       हैं     रोज़-रोज़

तारे      आसमान      में ,

"रवीन्द्र "      को       तो

ज़िन्दगी    से  प्यार   है।

बंद                     तो

मेरी   गली   का  द्वार  है।



   @रवीन्द्र  सिंह  यादव

इस  रचना  का  यू  ट्यूब   विड…

धीरे - धीरे ज़ख़्म सारे

धीरे -  धीरे     ज़ख़्म       सारे

अब      भरने    को   आ   गए ,

एक  बेचारा  दाग़ -ए -दिल  है

जिसको   ग़म   ही   भा    गए।



ज़िन्दगी   को    जब    ज़रूरत

उजियारे   दिन   की   आ    पड़ी,

लपलपायीं                बिजलियाँ

गरजकर  काले  बादल  छा  गए। 

एक  बेचारा  दाग़ -ए -दिल  है

जिसको   ग़म   ही   भा    गए।




बाँसुरी      की    धुन    पे  थिरका

बृज   के    साथ    सारा  ज़माना,

श्याम   जब    राधा   से  मिलने

यमुना    तट   पर     आ      गए।

एक  बेचारा  दाग़ -ए -दिल  है

जिसको   ग़म   ही   भा    गए।




आज    फिर   आँगन    में    मेरे

नन्हीं     कलियाँ     खिल     रहीं,

गीत     फिर    इनको     सुनाओ

जो    दादी    नाना     गा      गए।

एक  बेचारा  दाग़ -ए -दिल  है

जिसको   ग़म   ही   भा    गए।




क्या      मनाएं      जश्न       हम

ज़िन्दगी       की     जीत       का,

बाँटने     को    थीं    जो      चीज़ें

हम     उन्हीं     को     खा     गए।

एक  बेचारा  दाग़ -ए -दिल  है

जिसको   ग़म   ही   भा    गए।

@रवीन्द्र  सिंह  यादव

इस रचना  को सस्वर  सुनने के लिए  लिंक - https://youtu.be/QdAzRuiZa8

आया ऋतुराज बसंत

शिशिर   का    प्रकोप    ढलान   पर

आया  ऋतुराज  बसंत  दालान  पर

खेत-खलिहान  / बाग़ -बग़ीचे

पीलिमा     का   सुरभित   आभामंडल,

गुनगुनी  धूप

पुष्प-पत्तों  ने  पहने  ओस  के  कुंडल।

सरसों    के    पीले     फूल

गेंहूँ-जौ    की  नवोदित  बालियां / दहकते  ढाक - पलाश,

सृष्टि  का  साकार  सौंदर्य

मोहक     हो        पूरी        करता    मन     की     तलाश।

पक्षियों  का  कर्णप्रिय  कलरव,  

गा   रहा   कोई

राग                              भैरव।



आ   गया   बसंत

अल्हड़  मन  पर  छा  गया  बसंत ,

प्रकृति  के  प्रवाह   में

होता    नहीं    कोमा   या   हलंत।  



उत्सव   मनाओ  कुदरती  मेलों  में

जिओ              सजीव                बसंत ,  

पोस्टर ,कलेंडर ,फिल्मांकन,अंतर्जाल  में

हम  ढूँढ़ते   हैं  आभासी   निर्जीव  बसंत।

@रवीन्द्र  सिंह यादव








रवीन्द्र  सिंह यादव

वागीश्वरी जयंती

जय   हो   वीणावादिनी

जय   हो   ज्ञानदायिनी

विद्या ,बुद्धि ,ज्ञान की देवी

करो   मेधा  प्रखर  वाग्देवी।



माघ   मास  शुक्लपक्ष  पंचमी

वागीश्वरी जयंती

पूजा-आराधना  शाश्वत  ज्ञान  हेतु

शीश  नमन्ति !



हे   माँ !

उन   मस्तिष्क   का  विवेक

जाग्रत   रखना

जिनकी   अँगुलियों   को

भोले  जनमानस   ने

परमाणु - बटन   दबाने  का  अधिकार  सौंप  दिया  है ,

उन  स्वार्थ   की  परतों  को  उधेड़   देना

जिन्होंने   मानवता  की  पीठ  में  खंज़र  घौंप  दिया  है।

उन  मनीषियों  की  प्रतिभा  प्रचंड  प्रखर  करना

जो  स्वयं   को   जलाकर

रोशनी     के      हेतु   हैं ,

कल   और  आज   के

धवल -   सबल   सेतु   हैं।

उन  दीन -दुखी , निबल, जर्जर   को  संबल  देना

जो       मूल्यों     की     धरोहर     सहेजे  हैं,

वक़्त   के   ज़ुल्म-ओ-सितम    सहकर

निष्ठा   को    आज   भी   लगाए   कलेज़े   हैं।

उन   दिमाग़ों    में  स्त्री-गरिमा   की  ज्योति  प्रदीप्त  करना

जो  भोग-उपभोग   का    मानस  लिए  भटकते  हैं,

असहाय   समाज   की  आँख   में

यदाकदा     नहीं       अब       रोज़        खटकते   हैं।



हे  माँ !

भटके  हुए   जीव - जगत   को

स…

ओस

जब

वातावरण में

समाहित  वाष्प  को

सिकोड़   देती  है  सतह  की  ठंडक,

तब

शबनम  के दाने / ओस के मोती,

फूल -पत्तियों      पर      आसन     जमाते    हैं,

हमारे  मरने -मिटने  के  भय  को  लजाते   हैं।




मुनिया    समझदार    हुई,

पाँच    बसंत      पार    हुई,

बोली  एक   इतवार  को -

"पार्क  में  मैं  भी  चलूँगी,

कुलाँचें      मैं  भी  भरूँगी ".. ... ।



सवालों-जवाबों  के  बीच  पहुँचे  पार्क,

चमका   रही    थीं  ओस - कणों   को,

भोर           की     मनहर      रवीना,

ये   कुदरत  के आँसू   हैं  या  पसीना........?

कवितामयी / छोटे  मुँह   बड़ी  बात........!

सीधा  मन -मस्तिष्क   पर  आघात।

........ज़ारी........






मैंने   कहा -

यह   ओस   है,

उसने कहा -

"ENGLISH  में   बताओ"

DEW......जवाब  मैंने  दिया,

इसे  तो  मेरे  टीचर  ने  विडियो  में  दिखाया  था......

सुनकर  मेरे  सपनों  पर  ओस  पड़   गयी !

घर    आते-आते   सारी   ओस  झड़  गयी !!

@रवीन्द्र  सिंह यादव

दोपहर बनकर अक्सर न आया करो

दोपहर   बनकर

अक्सर  न   आया   करो,

सुबह-शाम   भी

कभी  बन   जाया   करो। ......(1 )




चिलचिलाती   धूप    में

तपना   है दूर  तक,

कभी  शीतल  चाँदनी

में  भी  नहाया  करो।

सुबह-शाम   भी

कभी  बन   जाया   करो। ......(2  )



सुबकता है  दिल

यादों  के  लम्बे  सफ़र  में,

कभी  ढलते  आँसू

रोकने  आ  जाया  करो।

सुबह-शाम   भी

कभी  बन   जाया   करो। ......(3  )




बदलती   है   पल-पल

चंचल   ज़िन्दगानी ।

हमें  भी  दुःख-सुख  में

अपने  बुलाया  करो।

सुबह-शाम   भी

कभी  बन   जाया   करो। ......(4  )



दरिया    का   पानी

हो  जाय   न   मटमैला,

झाड़न   दुखों   की धारा  में

यों   न    बहाया    करो।

सुबह-शाम   भी

कभी  बन   जाया   करो। ......(5   )

                                  @रवीन्द्र  सिंह  यादव

नेताजी सुभाष चंद्र बोस

(23  जनवरी  जन्मदिन  पर  स्मरण ) 


एक   सव्यसाची   फिर   आया,  
48  वर्ष  सुभाष  बनकर  जिया,  
जीवट  की  नई  कसौटी  स्थापित  कर,  
रहस्यमयी  यात्रा  पर  चल  दिया ,
ज़ल्दी  में  था   भारत    माता    का     लाल, 
बिलखता  दिल  हमारा  भावों  से  भर  दिया।  



"तुम मुझे  ख़ून  दो  मैं  तुम्हें  आज़ादी  दूंगा" 
"दिल्ली  चलो " 
"जय हिन्द"  
नारे         दिए         सुभाष   ने , 
जाग   उठी   थी   तरुणाई  
उभारे  बलिदानी  रंग  प्रभाष  ने।  



भारतीयों  के  सरताज,   
युवा       ह्रदय -सम्राट, 
सुभाष   बेचैन   थे,  
देखकर  हमारी  अंग्रेज़ों   का   दमन   सहने  की  परिपाटी,  
बो  दिए  वो  बीज,  
महकने/उगलने   लगी   क्रांति-क्रांति        देश   की  माटी। 



आज़ाद  हिन्द  फ़ौज  बनी,  
अंग्रेज़ों  से   जमकर   ठनी,  
1943   से  1945   तक  ,
देश  की पहली  आज़ाद हिन्द  सरकार  बनी,  
छूटा  साथ  जापान  का,  
मिशन  की  ताक़त  छिनी,   
18  अगस्त  1945  को,  
ताइपे  विमान  दुर्घटना  हर भारतवासी  का दुःख-दर्द  बनी.... .(?) 



नेताजी   की   मृत्यु   का    रहस्य,  
आज   भी   एक  अबूझ  पहेली   है,  

मैं वर्तमान की बेटी हूँ

बीसवीं  सदी  में,

प्रेमचंद  की  निर्मला  थी   बेटी,

इक्कीसवीं  सदी   में,

नयना  / गुड़िया  या  निर्भया,

बन  चुकी   है   बेटी।




कुछ  नाम  याद   होंगे  आपको,

वैदिक  साहित्य   की  बेटियों  के-

सीता,सावित्री,अनुसुइया ,उर्मिला ;

अहिल्या ,     शबरी ,    शकुंतला ,

 गार्गी , मैत्रेयी , द्रौपदी  या राधा।




इतिहास  में

यशोधरा,  मीरा, रज़िया  या  लक्ष्मीबाई

साहित्य  में

सुभद्रा, महादेवी, शिवानी,इस्मत ,अमृता ,

 अरुंधति    या     महाश्वेता

  के   नाम  भी  याद  होंगे।



आज  चहुँओर   चर्चित  हैं-

सायना ,सिंधु ,साक्षी ,सानिया ;

जहाँ    क़दम   रखती   हैं ,

छोड़   देती   हैं  निशानियां।




घूंघट   से  निकलकर,

लड़ाकू - पायलट  बन  गयी  है  बेटी,

सायकिल  क्या  रेल-चालिका  भी  बन  गयी  है  बेटी,

अंतरिक्ष  हो  या  अंटार्टिका,

सागर   हो  या  हिमालय,

हो  मंगल  मिशन

या हो चुनौती भीषण ,

अपना  परचम   लहरा   चुकी   है  बेटी,

क़लम   से   लेकर  तलवार  तक  उठा  चुकी  है  बेटी,

फिर   भी   सामाजिक  वर्जनाओं  की  बेड़ियों  में जकड़ी  है बेटी।



सृष्टि   की   सौन्दर्यवान   कृति  को ,

परिवेश   दे  रहा   आघात   के   अमिट  चिह्न …

सैनिक की जली हुई रोटियाँ

सैनिक  ने

अंतर्जाल  पर   वीडियो  अपलोड  कर,

दिखाई  जली  हुईं   रोटियाँ,

सीमा  सुरक्षा  बल  ने  जाँच  कर  खंडन  किया।



सैनिक!

आप   नहीं  जानते,

आपकी   दिखाई

 अधजली   रोटी  ग्लोबल  ट्रेंड  बन  गयी।



हमने  तो  सिर्फ़

अपना  मन  मसोस  लिया,

ख़ुद  को  तिलमिला  लिया,

राष्ट्रीय-सुरक्षा   के  गंभीर  सवालों  से,

ख़ुद   को  खदबदा  लिया।


लेकिन........

जो-

 हमारी  राष्ट्रीय  एकता  और  अखंडता  के  लिए  ख़तरे   हैं,

उनकी   बाँछें     तो   खिल  गयी  होगीं,

अधजली   रोटी  खाने  वाली  सेना  को

दुश्मन   क्या  समझेगा ..?




सैनिक!

हमारी  चैन  की  नींद  न  उड़ाओ,

जो  मिले  वही  खाओ,

स्वदेश   के  लिए  क्या  कुछ  नहीं  सहना  पड़ता  है,

श्रम, लहू   के    साथ   यौवन    भी  वारना  पड़ता   है।



शिकायत-

 ईर्ष्या ,आक्रोश, बदलाभाव 

और  खलबली  पैदा  करती   है,

दुश्मन   को  रणनीति   का  इशारा   करती   है,

सब्र  रखो......

विमूढ़ता   और  विवेक   में  फ़र्क   रखो।




सर-ज़मीं   क़ुर्बानी    माँगती    है,

सैनिक   के   ख़ून    में  रवानी   माँगती  है,

दूसरों   का  हक़   मारने   वाले   बेनक़ाब   होंगे!

हम  बुलंद  हौसलों   के  साथ    क़ामयाब    …

फूल से नाराज़ होकर तितली सो गयी है

फूल   से  नाराज़   होकर

तितली    सो      गयी     है,

बंद   कमरों   की  अब

ऐसी  हालत   हो   गयी   है।.........(1 )




हो   चला   सयाना    फूल  

ज़माने   के    साथ-साथ ,

मुरझाई    हैं    पाँखें  

महक   भी    रो    गयी  है।

बंद   कमरों   की  अब

ऐसी  हालत   हो   गयी   है।.........(2  )





नसीहत  अब  कोई

हलक़   से  नीचे  जाती   नहीं,

दिल्लगी   की   प्यारी  खनक

अब   हमसे   खो  गयी   है।

बंद   कमरों   की  अब

ऐसी  हालत   हो   गयी   है।.........(3  )





आशियाँ    दिलक़श   बने

जो    तेरी   शोख़ियाँ  हों,

ताज़ा  हवा  आँगन  में

बीज-ए -ख़ुलूस  बो  गयी  है।

बंद   कमरों   की  अब

ऐसी  हालत   हो   गयी   है।.........(4 )





यादों   के   आग़ोश   में

बैठा   हुआ  है  बोझिल  दिल,

एक   मुलाक़ात  मैल  मन  का

मनभर   धो     गयी    है।

बंद   कमरों   की  अब

ऐसी  हालत   हो   गयी   है।.........(5 )


 @रवीन्द्र  सिंह  यादव






दूब

तूफ़ान  आएंगे,

सैलाब     आएंगे,

उखाड़ेंगे,

उन्नत , उद्दंड    दरख़्तों    को।



दूब    मुस्कायेगी,

अपनी  लघुता / विनम्रता  पर ,

पृथ्वी    पर    पड़े-पड़े   पसरने    पर।



छाँव     न   भी  दे    सके    तो   क्या,

घात-प्रतिघात    की,

रेतीली     पगडंडी    पर,

घाम  की   तपिश  से,

तपे     पीड़ा     के    पाँव,

मुझपर     विश्राम     पाएंगे,

दूब  को  दुलार  से  सहलायेंगे।

@रवीन्द्र  सिंह यादव

नैसर्गिकता

सभ्यता    के    सशंकित    सागर    में,

नत -नयन    नैसर्गिकता    की     नाव,

डूबने      न    पाए,

सुदूर      है   किनारा      तो    क्या,

आज     मांझी    को,

सरलता      का    सुरीला     संगीत     सुनाओ,

आई  है भौतिकता

शो-केस  बनकर ,

बज  रही  है ढोलक

अक्खड़  स्वभाव   की  तनकर।



मृत्यु    का  भय   त्यागकर,

साहस, संयम   और    पुरुषार्थ   के,

पंख     पतवार    में   लगाओ,

बैठकर  नियति  की गोद  में,

सोई   हुई    करुणा    जगाओ।  


लौट  आएंगे

हमारे  खोये  अलंकरण,

खड़े  होकर

अपनी  छत  पर

दाना  चुगने  चिड़िया  को बुलाओ।

@रवीन्द्र  सिंह  यादव

पिता

समाचार  पढ़ा-

"बेटे   ने   सर्द   रात  में   बाप   को  घर  के   बाहर   सुला  दिया " 

संवेदनाशून्य   होते   समाज  का

यह  सच

अब   किसी   आवरण   में  नहीं   ढका   है,

अंतर्मन  आज    सोच-सोचकर   थका    है,

अपनी   ही  लाश  ढोता  आदमी,

अभी   नहीं  थका    है।



हम   क्यों   भूल   जाते  हैं,

जीवन   में   पिता   का   अतुल्य   योगदान,

क्यों   विस्मरण   हुआ  यक्ष   का   प्रश्न,

और   युधिष्ठिर   का   दिया  उत्तर  ?



दुनिया   के   दस्तूर  हों

या  अपने  पैरों  पर   खड़े   होने  की   दक्षता,    

क्षमादान   हो  या   हारी-बीमारी,

सपनों    को   पंख    लगाने   की   ललक    हो

या     तुम्हारे   टूटकर    बिखरने   पर   संबल   देना,

पिता    ने   कब   अपनी    निष्ठुरता   दिखाई ???



जानते    हो

ठण्ड   की  अकड़न  और   ठिठुरन    क्या   होती   है ?                                  

किसी   ख़ानाबदोश     परिवार   को   देखो,

कैसे   सहअस्तित्व   की  परिभाषा   गढ़ते   हैं   वे,

सभ्य-सुसंस्कृत    समाज    को,

अपने    मूल्यों   के   सिक्कों  की    खनक /चमक   से,

चौंधियाते    रहते    हैं।

@रवीन्द्र  सिंह  यादव

नव वर्ष

Welcome  2017

Happy  New  Year


बीता  शताब्दी   का  सोलहवाँ   साल,

आ  गया   सदी   का  सत्रहवाँ   साल।



अब    छोड़ो   मन  के   मलाल,

आज    पूछो   सभी   का   हाल,

सब  हों  आबाद, रहें   खुशहाल,

हो मुबारक  सबको  नया  साल।



गत वर्ष   देश-दुनिया  में   तख़्त-ओ-ताज   बदले,

भारत   में   हज़ार    पाँच   सौ    के    नोट    बदले,

जो  मना रहे  होते  आज  परिवार  के साथ  जश्न,

वे   किसी और  दुनिया  में जाकर   बन गए   प्रश्न।  





बुज़ुर्ग   दे  गये    समय   नापने   का  तोहफ़ा,

समय    रुकता  नहीं   समझो   ये   फ़लसफ़ा* ।


जश्न   में   डूबी  रात    के   बाद,

उगता  है   प्राची*   में   सूरज     लेकर   नई   उमंगें,

उल्लास  से  भर  देती  हैं  गुनगुनी   धूप   की  तरंगें,

चलता  है  दिनभर  हाय   डियर  ....हैप्पी   न्यू   ईयर!

दीवार  पर  टाँग  दिया  जाता  है   एक   और  कलेण्डर !!

@रवीन्द्र  सिंह यादव



प्राची *  =  पूर्व  दिशा (East)
फ़लसफ़ा*  = दर्शन (Philosophy)