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December, 2016 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

कल और आज

आओ   अब   अतीत   में   झाँकें...

आधुनिकता   ने   ज़मीर

क्षत-विक्षत    कर   डाला   है.



भौतिकता   के   प्रति  

यह   कैसी   अभेद्य   निष्ठा

दर्पण   पर   धूल

छतों   पर   मकड़ी    के   जाले

कृत्रिम   फूल-पत्तियों    में  

जीवन  के   प्रवाह  का  अन्वेषण.



सपने   संगठित   हो    रहे

विखंडित   मूल्यों   की   नींव    पर

भूमि-व्योम   में

कलुषित   विचारों   का     विनिमय

मानवता  के   समक्ष   अबूझ  पहेली.



झूठा   आदर्श  मथ   रहा

मानस   हमारा

त्रासद  है

मन   का   बुझकर   विराम  लेना.



हो   रहे  विलुप्त

दैनिक   जीवन   से

सामाजिक  मूल्य

प्रेम, करुणा,  दया,  सहयोग, चारित्रिक-शुचिता

दूसरों  की   परवाह  में   प्रसन्नता

व्यक्ति  से  कोसों  आगे  चल   रहे  हैं .



आओ   ठिठककर   खोलें

बीते  कल  का  कोई  झरोखा

देखें  सौंदर्यबोध   की   व्यग्रता   से

कितनी  दूर  आ  गये  हैं  हम

पदार्थवाद   में

कितना   धंस   चुके   हैं   हम.

आजकल

राहत          की          बात        हवा       हुई.

मुश्किल         एक        से         सवा      हुई.



कमाई     नौ     दो      ग्यारह      हो    चली.

हथेली       तप-तप      कर     तवा        हुई.



भूख        से     ३६    अब      ६३      हुए.

गेंहूँ      की      मिगी     मैदा     रवा      हुई.



चार      बाटी    दबाईं   अलसाई  आँच   में

अंगीठी        भड़ककर        अवा         हुई.



आये   हैं  अमीर-फ़कीर    हालात     बदलने.

खुशी      केवल      इनकी     हमनवा      हुई.



लाख   टके   की  बात  दो  टके  की  न  करो

ज़हर      की       गोली     कब     दवा      हुई.

                                 - रवीन्द्र  सिंह  यादव

बादल

आवारा     बादल    हूँ     मैं

अपने  झुंड  से  बिछड़  गया  हूँ   मैं

भटकन   निरुद्देश्य   न  हो

इस  उलझन  में  सिमट  गया  हूँ   मैं



सूरज  की  तपिश  से  बना   हूँ   मैं

धनात्मक  हूँ   या   ऋणात्मक   हूँ    मैं

इस ज्ञान  से  अनभिज्ञ  हूँ    मैं

बादलों   के  ध्रुवीकरण

और  टकराव  की  नियति   से   छिटक    गया  हूँ   मैं

बिजली   और   गड़गड़ाहट  से    बिदक    गया   हूँ   मैं



सीमेंट-सरिया   के   जंगल   से   दूर

उस  बस्ती  में   बरसना   चाहता  हूँ    मैं

जहाँ.................................................

जल  की  आश  में

दीनू   का  खेत  सूखा  है  

रोटी   के   इंतज़ार   में  

नन्हीं   मुनिया    का  पेट   भूखा   है  

लहलहाती   फसलों   को

निहारने   सुखिया  की आँखें   पथराई   हैं

सीमा   पर  डटे  पिया   की  बाट   जोहती

सजनी  की  निग़ाहें    दर्पण   से  टकराई  हैं

गलियों   में  बहते  पानी  में

बचपन   छप-छप   करने    को  आकुल  है  

अल्हड़    गोरी   सखियों  संग

झूले  पर  गीत  गाने  को   व्याकुल   है      




माटी   की  सौंधी   गंध

हवा   में  बिखर  जायेगी  

हरियाली  की चादर  ओढ़  

जलंधर

आज जलंधर फिर आया है

हाहाकार  मचाने   को 

अट्टहास   करता  है  देखो 

अपना   दम्भ   दिखाने  को 



अहंकार    के  आँगन  में     

त्रिदेवोंकोललकार रहा   है 

अनुनय- विनय  वचन   प्रार्थना    

सबको   ठोकर   मार   रहा   है   

आज बहुत चिंघाड़ रहा है 

बदला-  भाव    दर्शाने को ........

आज जलंधर फिर आया है....

नेत्र तीसरा खुला था शिव का


ज्वाला का अम्बार लगा 

सागर में बरसी ज्वाला तो 

पानी को  भी  भार लगा 

उपजा असुर जलंधर जग में 

भय का राग सुनाने को...........

आज जलंधर फिर आया है.......





आयोजन सागर- मंथन का

सुर- असुर का साझा श्रम था 

रत्न मिलेंगे बाँट बराबर