सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

जलंधर



आज  जलंधर फिर आया है


हाहाकार          मचाने   को 


अट्टहास   करता   है    देखो

अपना  दम्भ   दिखाने   को .......     (1 )



अहंकार    के  आँगन  में 
    

त्रिदेवों  को  ललकार रहा   है ,


अनुनय- विनय  वचन   प्रार्थना  
  

सबको   ठोकर   मार   रहा   है। 
  

आज    बहुत चिंघाड़ रहा है 


बदला  -  भाव    दर्शाने     को ,


आज जलंधर फिर आया है


हाहाकार          मचाने     को।  ....... (2 )




नेत्र तीसरा खुला था शिव का


ज्वाला   का   अम्बार   लगा

सागर  में  बरसी  ज्वाला तो 


पानी   को   भी   भार   लगा 


उपजा असुर जलंधर जग में 


भय   का   राग   सुनाने  को


आज  जलंधर फिर आया  है


हाहाकार         मचाने     को।  ....... (3  )





आयोजन सागर- मंथन   का


सुर- असुर का साझा श्रम था 


रत्न   मिलेंगे   बाँट   बराबर 


असुरों  को  ऐसा  ही भ्रम था 


अमृत पर  संग्राम छिड़ा जब 


प्रकट  हुई  तब एक  मोहिनी


चालाकी     दिखलाने     को


आज जलंधर फिर  आया  है


हाहाकार         मचाने     को।  ....... (4 ) 




भेदभाव      से    अमृत   का

बंटबारा   होने    वाला     था 

भांप        गए        राहू-केतु  


पलभर  में बदला   पाला  था  


अमृतपान   किया   दोनों  ने 

भयमुक्त      हुए        असुर 


ग्रीवा   अपनी   कटवाने   को


आज   जलंधर  फिर आया है


हाहाकार         मचाने     को।  ....... (5 )
       





आज   जलंधर  मांग  रहा है 


रत्न-सम्पदा     सारी    लूट 


अहंकार    के   दर्प  में  डूबा 


हर  बंधन  से  गया  है  छूट 


पार्वती    को   पाना     चाहे 


शिव   का  क्रोध  जगाने को 


आज  जलंधर फिर आया है



हाहाकार       मचाने     को।  ....... (6 )





दे दी इसको शिव ने शक्ति


विष्णु  ने भी झोली भर दी 


ब्रह्मा  ने  भी   वरदानों से 


इसकी   मंशा   पूरी कर दी 


त्राहि-त्राहि  की गूँज उठी है 


आत्ममुग्ध हो जुटा हुआ है  


मन   का  रूप  सजाने   को


आज जलंधर  फिर आया है


हाहाकार         मचाने   को।  ....... (7 )




पतिवृत -धर्म     निभाने  वाली


इसकी      पत्नी      वृंदा      है


त्याग,  तपस्या   भार्या   की  है 


जिससे    अब    तक   ज़िंदा  है 


देने    अभयदान    सृष्टि     को
  

आये शिव रौद्र रूप दिखलाने  को


आज    जलंधर     फिर  आया है


हाहाकार                 मचाने  को।  ....... (8 )




विष्णु  ने  मायाजाल   रचा 

वृंदा   से   छल   करना  था 


जलंधर     की    मृत्यु   का


यक्ष-प्रश्न    हल   करना था 


वृंदा  को छल का भान  हुआ 


क्रोधित         हो    अकुलाई 


श्राप   के   बोल  सुनाने   को


आज  जलंधर  फिर  आया है


हाहाकार         मचाने     को।  ....... (9   )





भीषण   महासंग्राम में  शिव ने 


आतातायी  का  वध  कर  डाला 


वृंदा   ने   अपने  तप  बल    से


विष्णु   को   पत्थर   कर  डाला 


नारद   अब   आकर  प्रकट  हुए 


बिगड़ी     बात    बनाने       को 


आज    जलंधर   फिर   आया है


हाहाकार         मचाने         को।  ....... (10   )








वृंदा आज भी तुलसी बनकर

घर-घर  में   पूजी  जाती   हैं

शालिग्राम  बन   विष्णु   की 


श्रद्धा    से    पूजा    होती   है


रहे   जलंधर   ध्यान   हमारे 


युग-युग   को    समझाने को


आज   जलंधर  फिर आया है


हाहाकार             मचाने  को।  ....... (11)






सहज     संतुलन   सृष्टि  का

रखने   को    विष्णु- लीला  है 

पीते -पीते   तीक्ष्ण     हलाहल

शिव- कंठ  अभी  तक नीला है

छल, दम्भ, झूठ, पाखण्ड सभी 

छाये   हैं    सत्य    दबाने    को 

आज   जलंधर   फिर  आया  है

हाहाकार              मचाने   को।  ....... (12   )






उन्मादी   माहौल  में  दबकर 


कुछ   ऐसे   भी   न्याय  हुए 


मानवता   को  रौंद    डालने


शुरू    नए    अध्याय     हुए


अहंकार   के    अन्धकार  में 


आये  कोई   दीप  जलाने को


आज  जलंधर  फिर आया है


हाहाकार             मचाने को।  ....... (13)

@रवीन्द्र सिंह यादव 

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

ऐ हवा चल पहुँचा दे मेरी आवाज़ वहाँ

ताजमहल  को  देखते आगरा  क़िले  में क़ैद  शाहजहां  ने शायद  ये  भी  सोचा  होगा.........   ( मुग़ल  बादशाह  औरंगज़ेब  अपनी  क्रूरता  के लिए  कुख़्यात  हुआ।  बड़े  भाई   दारा  शिकोह  सहित  अपने  तीनों  भाइयों ( दो अन्य  शाह शुज़ा  व  मुराद बख़्श )  को    मौत  के घाट  उतार  कर वृद्ध  पिता  शहंशाह  शाहजहां  को  विलासता  पर जनता  का  धन   ख़र्चने ( ताजमहल का निर्माण सन 1632 में प्रारम्भ  हुआ जोकि  अगले 20  वर्षों  में पूरा हुआ )  के  आरोप में  सन  1658 में  आगरा  के लाल  क़िले ( मुग़ल सम्राट  अक़बर  द्वारा निर्मित 8  साल निर्माण कार्य  चलने के बाद सन  1573  में बनकर तैयार हुआ ) में क़ैद  कर  अति मानव  औरंगज़ेब  गद्दी  पर बैठा।  शाहजहां  द्वारा  कराये  गए  ताजमहल  के  निर्माण  का  औरंगज़ेब  ने तीखा  विरोध  किया था।
            हालांकि मुग़ल बादशाह  औरंगज़ेब  के बारे  में उल्लेख  मिलते  हैं कि  वह  अपने  निजी ख़र्च   के लिए  टोपियाँ  सिलने   और  क़ुरान  की नक़ल ( कॉपी )  तैयार  करने  से हुई  कमाई  का उपयोग  किया करता था।
          आगरा के लाल  क़िले  से  दक्षिण -पूर्व  दिशा  में( ढाई किमी  दूरी )  यमुना  के किनारे…

सैनिक की जली हुई रोटियाँ

सैनिक  ने

अंतर्जाल  पर   वीडियो  अपलोड  कर,

दिखाई  जली  हुईं   रोटियाँ,

सीमा  सुरक्षा  बल  ने  जाँच  कर  खंडन  किया।



सैनिक!

आप   नहीं  जानते,

आपकी   दिखाई

 अधजली   रोटी  ग्लोबल  ट्रेंड  बन  गयी।



हमने  तो  सिर्फ़

अपना  मन  मसोस  लिया,

ख़ुद  को  तिलमिला  लिया,

राष्ट्रीय-सुरक्षा   के  गंभीर  सवालों  से,

ख़ुद   को  खदबदा  लिया।


लेकिन........

जो-

 हमारी  राष्ट्रीय  एकता  और  अखंडता  के  लिए  ख़तरे   हैं,

उनकी   बाँछें     तो   खिल  गयी  होगीं,

अधजली   रोटी  खाने  वाली  सेना  को

दुश्मन   क्या  समझेगा ..?




सैनिक!

हमारी  चैन  की  नींद  न  उड़ाओ,

जो  मिले  वही  खाओ,

स्वदेश   के  लिए  क्या  कुछ  नहीं  सहना  पड़ता  है,

श्रम, लहू   के    साथ   यौवन    भी  वारना  पड़ता   है।



शिकायत-

 ईर्ष्या ,आक्रोश, बदलाभाव 

और  खलबली  पैदा  करती   है,

दुश्मन   को  रणनीति   का  इशारा   करती   है,

सब्र  रखो......

विमूढ़ता   और  विवेक   में  फ़र्क   रखो।




सर-ज़मीं   क़ुर्बानी    माँगती    है,

सैनिक   के   ख़ून    में  रवानी   माँगती  है,

दूसरों   का  हक़   मारने   वाले   बेनक़ाब   होंगे!

हम  बुलंद  हौसलों   के  साथ    क़ामयाब    …

मैं वर्तमान की बेटी हूँ

बीसवीं  सदी  में,

प्रेमचंद  की  निर्मला  थी   बेटी,

इक्कीसवीं  सदी   में,

नयना  / गुड़िया  या  निर्भया,

बन  चुकी   है   बेटी।




कुछ  नाम  याद   होंगे  आपको,

वैदिक  साहित्य   की  बेटियों  के-

सीता,सावित्री,अनुसुइया ,उर्मिला ;

अहिल्या ,     शबरी ,    शकुंतला ,

 गार्गी , मैत्रेयी , द्रौपदी  या राधा।




इतिहास  में

यशोधरा,  मीरा, रज़िया  या  लक्ष्मीबाई

साहित्य  में

सुभद्रा, महादेवी, शिवानी,इस्मत ,अमृता ,

 अरुंधति    या     महाश्वेता

  के   नाम  भी  याद  होंगे।



आज  चहुँओर   चर्चित  हैं-

सायना ,सिंधु ,साक्षी ,सानिया ;

जहाँ    क़दम   रखती   हैं ,

छोड़   देती   हैं  निशानियां।




घूंघट   से  निकलकर,

लड़ाकू - पायलट  बन  गयी  है  बेटी,

सायकिल  क्या  रेल-चालिका  भी  बन  गयी  है  बेटी,

अंतरिक्ष  हो  या  अंटार्टिका,

सागर   हो  या  हिमालय,

हो  मंगल  मिशन

या हो चुनौती भीषण ,

अपना  परचम   लहरा   चुकी   है  बेटी,

क़लम   से   लेकर  तलवार  तक  उठा  चुकी  है  बेटी,

फिर   भी   सामाजिक  वर्जनाओं  की  बेड़ियों  में जकड़ी  है बेटी।



सृष्टि   की   सौन्दर्यवान   कृति  को ,

परिवेश   दे  रहा   आघात   के   अमिट  चिह्न …