यह ब्लॉग खोजें

शनिवार, 12 नवंबर 2016

आशा

उन मासूमों के माता-पिता

आल्हादित थे

रेत के कलात्मक  घरौंदे  देखकर

जो नन्हे हाथों ने चटपट लगन से बनाये थे

हौसलों  की उड़ान  से

फूल और पत्तियों से  सजाये थे

बच्चों का श्रम और रचनात्मकता

औरों को भी आकर्षित कर रही थी

कुछ   और  बच्चे  आये

जुट  गये  घरौंदा  बनाने

नदी का किनारा

खुशनुमा माहौल से चहक रहा था

पक्षियों का कलरव

आसमान में गूँज रहा था

अचानक तेज़ हवा बही

नदी का जल

लहरों की शक्ल में

किनारे की ओर उमड़ा

पल भर में नज़ारा बदल गया

मुरझा गये सुकोमल चेहरे

श्रम ने जो शब्द सृजित किये थे

वे ख़ामोश  हो गये थे

माता-पिता आशावाद का पाठ पढ़ाते हुए घर लौट आये..........

विशिष्ट पोस्ट

सरिता

नदी  का  दर्द  कल-कल  करती करवटें  बदलती  बहती  सरिता का आदर्श  रूप हो गयी  अब   गए  दिनों  की  बात , स्वच्छ  जलधारा  का  मनभावन...