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शनिवार, 12 नवंबर 2016

आशा


उन मासूमों के माता-पिता

आल्हादित थे

रेत के कलात्मक  घरोंदे   देखकर

जो नन्हे हाथों ने चटपट लगन से बनाये थे

हौसलों  की उड़ान  से

फूल और पत्तियों से  सजाये थे।



बच्चों का  रचनात्मक श्रम 

औरों को भी आकर्षित कर रहा था  

कुछ   और  बच्चे  आये

जुट  गये उमंगोल्लास से  घरौंदा  बनाने

नदी का किनारा

खुशनुमा माहौल से चहक रहा था

पक्षियों का कलरव मोहक हो 

आसमान में गूँज रहा था।



अचानक तेज़ हवा बही

नदी का जल

लहरों की शक्ल में

किनारे की ओर उमड़ा

पल भर में नज़ारा बदल गया

मुरझा गये सुकोमल मासूम चेहरे

श्रम ने जो शब्द सृजित किये थे

वे ख़ामोश  हो गये थे....... !

माता-पिता आशावाद का पाठ पढ़ाते हुए
नन्हें छौनों के आँसू पौंछते घर लौट आये..........!!

#रवीन्द्र सिंह यादव 

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