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कल और आज

आओ   अब   अतीत   में   झाँकें...

आधुनिकता   ने   ज़मीर

क्षत-विक्षत    कर   डाला   है.



भौतिकता   के   प्रति  

यह   कैसी   अभेद्य   निष्ठा

दर्पण   पर   धूल

छतों   पर   मकड़ी    के   जाले

कृत्रिम   फूल-पत्तियों    में  

जीवन  के   प्रवाह  का  अन्वेषण.



सपने   संगठित   हो    रहे

विखंडित   मूल्यों   की   नींव    पर

भूमि-व्योम   में

कलुषित   विचारों   का     विनिमय

मानवता  के   समक्ष   अबूझ  पहेली.



झूठा   आदर्श  मथ   रहा

मानस   हमारा

त्रासद  है

मन   का   बुझकर   विराम  लेना.



हो   रहे  विलुप्त

दैनिक   जीवन   से

सामाजिक  मूल्य

प्रेम, करुणा,  दया,  सहयोग, चारित्रिक-शुचिता

दूसरों  की   परवाह  में   प्रसन्नता

व्यक्ति  से  कोसों  आगे  चल   रहे  हैं .



आओ   ठिठककर   खोलें

बीते  कल  का  कोई  झरोखा

देखें  सौंदर्यबोध   की   व्यग्रता   से

कितनी  दूर  आ  गये  हैं  हम

पदार्थवाद   में

कितना   धंस   चुके   हैं   हम.

आजकल

राहत          की          बात  
 हवा       हुई,
मुश्किल         एक        से        
सवा      हुई।  .............  (1 )


कमाई     नौ     दो      ग्यारह      
हो    चली,
हथेली       तप-तप      कर     
तवा        हुई। 
मुश्किल         एक        से        
सवा      हुई।  .............  (2 )


भूख        से     ३६
अब      ६३      हुए.
गेंहूँ      की      मिगी     
मैदा     रवा      हुई । 
मुश्किल         एक        से        
सवा      हुई।  .............  (3)




चार      बाटी    दबाईं   
अलसाई  आँच   में,
अंगीठी        भड़ककर        
अवा         हुई। 
मुश्किल         एक        से        
सवा      हुई।  .............  (4)


आये   हैं  अमीर-फ़कीर    
हालात     बदलने,
खुशी      केवल      इनकी     
हमनवा      हुई। 
मुश्किल         एक        से        
सवा      हुई।  .............  (5 )


लाख   टके   की  बात  
दो  टके  की  न  करो,
ज़हर      की       गोली     
कब     दवा      हुई।  
मुश्किल         एक        से        
सवा      हुई।  .............  (6 )

 @ रवीन्द्र  सिंह  यादव

बादल

आवारा     बादल    हूँ     मैं

अपने  झुंड  से  बिछड़  गया  हूँ   मैं

भटकन   निरुद्देश्य   न  हो

इस  उलझन  में  सिमट  गया  हूँ   मैं।



सूरज  की  तपिश  से  बना   हूँ   मैं

धनात्मक  हूँ   या   ऋणात्मक   हूँ    मैं

इस ज्ञान  से  अनभिज्ञ  हूँ    मैं

बादलों   के  ध्रुवीकरण

और  टकराव  की  नियति   से   छिटक    गया  हूँ   मैं

बिजली   और   गड़गड़ाहट  से    बिदक    गया   हूँ   मैं।



सीमेंट-सरिया   के   जंगल   से   दूर

उस  बस्ती  में   बरसना   चाहता  हूँ    मैं

जहाँ.................................................

जल  की  आश  में

दीनू   का  खेत  सूखा  है  

रोटी   के   इंतज़ार   में  

नन्हीं   मुनिया    का  पेट   भूखा   है  

लहलहाती   फसलों   को

निहारने   सुखिया  की आँखें   पथराई   हैं

सीमा   पर  डटे  पिया   की  बाट   जोहती

सजनी  की  निग़ाहें    दर्पण   से  टकराई  हैं

गलियों   में  बहते  पानी  में

बचपन   छप-छप   करने    को  आकुल  है  

अल्हड़    गोरी   सखियों  संग

झूले  पर  गीत  गाने  को   व्याकुल   है।      




माटी   की  सौंधी   गंध

हवा   में  बिखर  जायेगी  

हरियाली  की चादर  ओढ़  

जलंधर

आज  जलंधर फिर आया है


हाहाकार          मचाने   को 


अट्टहास   करता   है    देखो

अपना  दम्भ   दिखाने   को ....... (1 )


अहंकार    के  आँगन  में 

त्रिदेवोंकोललकार रहा   है ,


अनुनय- विनय  वचन   प्रार्थना  

सबको   ठोकर   मार   रहा   है। 

आज    बहुत चिंघाड़ रहा है 


बदला  -  भाव    दर्शाने     को ,


आज जलंधर फिर आया है

हाहाकार          मचाने     को।  ....... (2 )




नेत्र तीसरा खुला था शिव का


ज्वाला   का   अम्बार   लगा

सागर  में  बरसी  ज्वाला तो 


पानी   को   भी   भार   लगा 


उपजा असुर जलंधर जग में 


भय   का   राग   सुनाने  को


आज  जलंधर फिर आया  है


हाहाकार         मचाने     को।  ....... (3  )




लकड़हारा

सर पर  सूखी  लकड़ियों  का 

भारी   गट्ठर    लादे 

शहरों    कस्बों   की  गलियों  में  

दीखता   था   

अंगौछे   की   कुंडली   बनाकर  

सर  और   सख़्त  सूखी  टहनियों  के  गट्ठर   के केन्द्र  में   रखता  था

खोपड़ी   की   खाल   में  

लकड़ियों   की  चुभन   कम   होती   होगी...

कुल्हाड़ी   भी  गट्ठर    में  मुँह   छिपाये   रहती  थी

लकड़ियाँ   बेचता   था  

उसी   को   जो   उसे   बुला   ले   

करता   सौदा   उसी    से    

जो   दाम   ठहरा  ले  

गट्ठर   से   कुल्हाड़ी   निकाल 

रख  देता   था   लकड़ियाँ 

ख़रीदार   की  बांच्छित   जगह   पर  

बोझ   उतर   जाने पर   

लेता  था   पुरसुकून   की   सांस 

पल  दो  पल  बीतने   के   उपरान्त 

सालने  लगती 

भीतर   दबी  हुई   फाँस 

कमाई   को   गिन-गिन   दोहराता 

अंगौछे  से  पसीना  पौंछता  

आटा   दाल    सब्ज़ी  

नमक   मिर्च  तेल

माँ   की  दवाई   

बच्चों   की जलेबी ...

पैसा  मिला   लेकिन   बाज़ार  ने  ले  लिया 

बदले  में  थोड़ा  सामान  दे दिया

लौटता  था  घर   अपने  

बुदबुदाता   हुआ 

कुछ और  वृक्ष   सूख जाएं  .....

आधुनिकता  के  अंधड़   में

अब …

बहुरुपिया

बहुरुपिया आया.............बहुरुपिया आया..........

शोर  सुनकर  कौतूहलवश

बच्चे, बूढ़े, अधेड़, जवान  सभी

देखने  आये  लपककर

पहले  वह  धवल  वस्त्र  धारण  कर

योगी  के  वेश  में  आया

सड़क  के  दोनों  ओर

बनी दुकानों, छतों  और  बालकनी  से  देख  रहे  लोग

सत्कार भाव से

सराह  रहे  थे  निहार  रहे  थे  उसका  वियोग

अगले  दिन  हाथ  में  लाठी  लिये

शीटी  बजाता  हुआ  चौकीदार  बनकर  आ  गया

बच्चों  को  खूब  भा  गया

कभी  भगवान  बनकर  आया

कभी  कसाई  बनकर  आया

एक  दिन  मजनूं   बनकर  आ  गया

फिर  सैनिक  बनकर  आया

अगले  दिन  डॉक्टर  का  आला  गले  में  डालकर  आ  गया

सात  दिन  जनता  का  मनोरंजन  किया

आठवें  दिन   नाटकीयता  के बदले  आशीर्वाद  मांगने आ गया

लोगों ने  यथाशक्ति  उसे  नोट  दिये

ज़हन  में  बहुरुपिया  के  नकली  रूप  नोट  किये.......

बच्चों  को  बड़ों  ने  सीख  दी

यह  शख़्श  केवल  मनोरंजन  के  लिये  है

इतने  रूप  अनापेक्षित  हैं  एक   जीवन  के  लिये.................






आशा

उन मासूमों के माता-पिता

आल्हादित थे

रेत के कलात्मक  घरौंदे  देखकर

जो नन्हे हाथों ने चटपट लगन से बनाये थे

हौसलों  की उड़ान  से

फूल और पत्तियों से  सजाये थे

बच्चों का श्रम और रचनात्मकता

औरों को भी आकर्षित कर रही थी

कुछ   और  बच्चे  आये

जुट  गये  घरौंदा  बनाने

नदी का किनारा

खुशनुमा माहौल से चहक रहा था

पक्षियों का कलरव

आसमान में गूँज रहा था

अचानक तेज़ हवा बही

नदी का जल

लहरों की शक्ल में

किनारे की ओर उमड़ा

पल भर में नज़ारा बदल गया

मुरझा गये सुकोमल चेहरे

श्रम ने जो शब्द सृजित किये थे

वे ख़ामोश  हो गये थे

माता-पिता आशावाद का पाठ पढ़ाते हुए घर लौट आये..........

नई सुबह

इठलाती  शाम  चली  है

 गुज़रने   के   लिये

परिंदे  तैयार  हैं  फिर

 बिखरने   के  लिये



आदमी  लगा  है  रात-दिन

 कुछ  न  कुछ  करने  के  लिये

नन्हीं  चिड़िया  सो  गयी  है

सपनों  में  बिचरने  के  लिये



नियति-चक्र  नहीं  बना  है

पलछिन  भी  ठहरने  के लिये

दुनिया  ने  इंतज़ाम  किये  हैं

 सन्नाटा  पसरने  के  लिये



सुमन  से  आज़ाद  है  सुगंध

हवाओं  में  बिखरने  के लिये

हम आज  बेक़रार  हैं  क्यों

भाव  रिश्तों  का परखने  के लिये 



नई  सुबह  का  इंतज़ार  है

जब  कुछ  न  हो  अखरने  के  लिये

प्यास  बुझ  जायेगी  अब

आई  है  बदली  बरसने  के  लिये