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गुरुवार, 20 जुलाई 2017

ख़त


ख़त  मिला
आपके  रुख़्सत  होने के बाद,
कांधा गया
सर  रखूँ  कहाँ  रोने  के  बाद।


ख़्वाब पहलू से
उठकर चल दिए,
जागती रहेंगी
तमन्नाएँ रातभर सोने के बाद।


नयन के पर्दे से
बाहर आएगी  ख़ामोशी,
पिघलेंगे जज़्बात
अश्क़ों से रुख़सार धोने के बाद।


वीरान राहें
चुपचाप सो गयीं हैं ,
हवाऐं उड़ा ले गयीं वो बीज
खुश थे हम जिन्हें बोने के बाद।


आपकी तस्वीर
बादल में बन रही है ,
तड़प बिजली सी
बढ़ती जाएगी हमसफ़र खोने के बाद।

@रवीन्द्र सिंह यादव

शब्दार्थ / Word Meanings 

ख़त = पत्र ,चिट्ठी ,Letter 

रुख़्सत  =बिछड़ना,चले जाना ,To Leave 

कांधा =कंधा, Shoulder 

सर =मस्तक, Head 

ख़्वाब =स्वप्न,सपना, Dream(s)  

पहलू =पार्श्व ,बग़ल ,Side ,Aspect 

तमन्नाऐं = इच्छाएं ,अरमान ,Desires 

नयन =आँख ,चक्षु ,नेत्र ,Eye 

पर्दे /पर्दा =चिलमन ,आड़,Curtain(s) 

ख़ामोशी =नीरवता,सन्नाटा, Silence 

जज़्बात = भाव ,मनोभाव, Feelings ,Emotions 

अश्क़ों /अश्क़ =आँसुओं /आँसू ,Tear(s)

रुख़सार =गाल ,Cheek(s)  

वीरान =सुनसान ,Deserted ,Lonely 

हमसफ़र = हमराही ,साथी ,Companion, A Fellow Traveller 

गुरुवार, 13 जुलाई 2017

तितली


जागती है
रोज़ सुबह
एक तितली,
बाग़ में खिले
फूलों-कलियों से
है बाअदब मिलती।


खिले रहो
यों ही
संसार को देने
आशाओं का सवेरा,
मुस्कराकर
अपना दर्द छिपाये
फूलों-कलियों में
दिनभर है  करती बसेरा।



फूलों से  कहती है -
तुम्हारी
कोमल पंखुड़ियों के
सुर्ख़  रंग
केवल मुझे
ही नहीं लुभाते हैं,
मधुर  रसमय राग
जीवन संगीत का
ये सबको सुनाते  हैं।


फूल तुम
यों ही
खिले रहना,
मदमाती
ख़ुशबू से
कल सुबह तक ...
यों ही
महकते रहना।



अनमना होता है
फूल उस पल
वक़्त आ  खड़ा
होता है जब
मुरझाने की
नियति  का
सवाल होकर ,
कलियाँ
कल तुम्हारा हैं
बीज परसों तुम्हारे हैं
कहती मूक  तितली
फूल से वाचाल  होकर।



कल फिर मैं आऊँगी
तुम इंतज़ार करना,
सब्र के साथ
अँधेरी रात पार करना।

@रवीन्द्र सिंह यादव


बुधवार, 12 जुलाई 2017

ख़ालीपन से दूर .....


        

     उठो चलो
     जी चुके बहुत
     सहारों में,
     ढूँढ़ो  न आसरा
     धूर्तों-मक्कारों में।


      सुख के पलछिन

      देर-सवेर
      आते तो हैं ,
      पर ठहरते नहीं
      कभी  बहारों में।


     मतवाली हवाओं

     का आना -जाना
     ब-दस्तूर ज़ारी है ,
     ग़ौर  से देखो
     छायी है धुंध
     दिलकश नज़ारों में।


     फ़ज़ाओं की

    बे-सबब  बे-रुख़ी से
     ऊब गया है मन ,
     फुसफुसाए जज़्बात
     दिल की
     दीवारों में।


     रोने से

     अब   तक   भला 
     किसे क्या मिला,
     मिलता है
     जीभर सुकूं
     वक़्त के मारों में।


     हवाऐं ख़िलाफ़

     चलती हैं
     तो चलने दे ,
     जुनूं लफ़्ज़ों से
     खेलने का
     पैदा कर क़लमकारों  में।


    मझधार की

    उछलती  लहरें
    बुला रही हैं,
    कब तक
    सिमटे  हुए 
    बैठे रहोगे  किनारों में।


     परिंदे भी

    चहकते ख़्वाब
    सजाते रहते हैं ,
    उड़ते हैं
    कभी तन्हा
    कभी क़तारों  में।

    @रवीन्द्र  सिंह  यादव

मंगलवार, 11 जुलाई 2017

सामाजिक समरसता


29 जून 2017 का 
एक चित्र 
मुझे परेशान किये था। 
राजकोट में 
प्रधानमंत्री का 
9 किलोमीटर लम्बा 
रोड शो 
लोग अनुमानित ख़र्च 
70 करोड़ रुपये तक बता रहे हैं। 



9 जुलाई 2017 का 

दूसरा चित्र 
गाँव बसंतपुर पांगरी 
ज़िला सीहोर म. प्र. 
राधा 14 वर्ष 
कुंती 11 वर्ष 
घर में रुपयों का टोटा 
बैल  नहीं थे 
दोनों बेटियों को 
पिता  ने हल में जोता। 



सामाजिक समरसता की 

पोल खोलते ये चित्र 
क्या आपकी भी नींद 
हराम करते हैं .... ?
या फिर हम भी 
संवेदनाविहीन  होते 
समाज का 
दुखड़ा रोने की 
औपचारिकता पूरी करेंगे... ?



विराट भव्यता
और क्रूर अभावों का 
बोलबाला 
मेरे भारत में 
शुतुरमुर्गी सोच का
रहबर  
पी रहे प्याला 
मेरे भारत में।  


बस नारे गूँजते हैं 
हमारे कानों में 
किसे पड़ी है 
नज़र दौड़ाये 
खेत-खलिहानों में। 


हो सकता है ...... !

इन बच्चियों के 
और भी बुरे दिन 
आ जाएँ ..... !!
जब क़ानून के लम्बे हाथ 
इनके पिता को 
सलाख़ों के पीछे 
ले जायें ......!!! 

@रवीन्द्र सिंह यादव 


सूचना -

दोनों चित्र अंतर्जाल पर उपलब्ध हैं। 

बुधवार, 28 जून 2017

मैं भारत का किसान


मैं  भारत  की शान, 
कहते मुझे किसान। 


पढ़ना -लिखना सब चाहें ,
अफ़सर बनना सब चाहें ,
अन्न उगाने माटी में सनकर, 
मैं  देखूँ   खेत-खलिहान,
मैं  भारत  की शान ,
कहते मुझे किसान। 


सूरज उगने से पहले जागूँ ,
पशुओं का चारा लेने भागूँ ,
रूखी -सूखी खाकर ,
है  ऊँचा स्वाभिमान,
मैं  भारत  की शान ,
कहते मुझे किसान। 


मानसून   की  मर्ज़ी   पर ,
मेरी  फ़सलें   उग पाती हैं ,
देख - देखकर अम्बर को ,
मेरी आँखें पथरा जाती हैं ,
पानी  भर जाए  खेतों  में ,
तब   रोपूँ   अपना   धान ,
मैं  भारत  की शान ,
कहते मुझे किसान। 


खाद -बीज ,बिजली ,डीज़ल, 
सब  ख़र्चे  मुझे  सताते  हैं ,
शहरों में बैठे डॉक्टर /व्यापारी, 
माल  लेकर मुझे बुलाते हैं,
रेत सी फिसले मेरी कमाई,  
मैं कहाँ इतना धनवान ,
मैं  भारत  की शान ,
कहते मुझे किसान। 


बैंक मुझे क़र्ज़ा  दे  देकर ,
ठगने का जाल रचाते हैं ,
कट जाता खाते से पैसा ,
मौसम का हाल बताते हैं ,
फसल-बीमा की ठग-विद्या से, 
समझो सरकारी ईमान,
मैं  भारत  की शान ,
कहते मुझे किसान। 


सरकारों के यार -दोस्त हैं, 
गाँवों  के चतुर साहूकार ,
बुला- बुलाकर क़र्ज़ा  देते ,
बसूली में होती  हाहाकार ,
देते -देते ब्याज क़र्ज़ का ,
लुट जाते गहने ,खेत - मकान,
मैं  भारत  की शान ,
कहते मुझे किसान। 


शोषण के चक्रव्यूह में,
फंसते जाते ग़रीब किसान, 
झूठे वादे करते -करते ,
सरकारें बन जातीं निष्ठुर - अनजान ,
लाखों ज़हर की गोली खाकर,
तज गए अपने प्राण ,
फाँसी के फंदे पर बेचारे लटके मिले किसान, 
मैं  भारत  की शान ,
कहते मुझे किसान। 


किसान क़र्ज़ माफ़ी को ,
फ़ैशन बता रही सरकार ,
हैं वे किसके  यार दो चार ,
बैंकों का जो लाखों करोड़ गए डकार ?
करोड़ों वोट हमारे हैं ,
हम क्यों करें जान क़ुर्बान, 
मैं  भारत  की शान ,
कहते मुझे किसान। 




ओले ,बारिश ,तूफ़ान ,तुषार, 
कीड़े    और    सूखे   की  मार, 
फ़सल बोऊँ तो न बरसे पानी ,
फ़सल  पके  तो   बरसे  पानी ,
कभी - कभी होता है ,
मौसम मुझपर मेहरबान, 
मैं  भारत  की शान ,
कहते मुझे किसान। 


भरपूर  हुई जब पैदावार, 
खींचे पाँव पीछे सरकार ,
फ़सल में खोट बताकर ,
एमएसपी पर लेने से करती इंकार, 
मौज़ करते मोज़ाम्बिक  के किसान, 
मैं  भारत  की शान ,       
कहते मुझे किसान। 


संसद से पास हुए ,
क़ानून की इज़्ज़त रख लेता हूँ, 
"मैं ग़रीब परिवार से हूँ , मेरा नाम रमुआ......... सुखिया है,
मैं एनएफएसए से सस्ता राशन लेता हूँ "
मेरे घर की दीवार पर ,
लिखवा दिया है सरकारी फ़रमान, 
मैं  भारत  की शान ,       
कहते मुझे किसान। 


सीमा पर किसान का बेटा, 
दुश्मन की गोली खाता है ,
मंदसौर में किसान का बेटा, 
पुलिस की गोली खाता है ,
धोती -कुर्ता और अंगौछा ,
थी कभी मेरी पहचान ,
बदले वक़्त में मैंने भी ,
अब बदल दिए परिधान। 
मैं  भारत  की शान        
कहते मुझे किसान। 


लदाई-उतराई, ढुलाई-तुलाई का,
न जाने हिसाब सरकार ,
ई-मंडी और लैस कैश का, 
करती दिन-रात धुआँधार प्रचार ,
दे-दे पैसा अभिनेता को, 
अक़ल मुझे सिखायी जाती है, 
मेरे नाम पर धूर्तों को,  
मलाई ख़ूब खिलायी जाती है,  
ऐसे बनेगा मेरा देश महान?
मैं  भारत  की शान ,       
कहते मुझे किसान। 


माल मेरा खेतों में सड़ता ,
या सड़कों पर बिखरा मिलता, 
मिलता नहीं पूरा- ड्यौढ़ा दाम, 
मेरे पास कहाँ  होती है ,
अमीरों सी शहरों में सजी दुकान, 
मैं  भारत  की शान ,       
कहते मुझे किसान। 



हमें मिलेगा फ़सल का, 
अपनी पूरा-पूरा  दाम ,
साथ चलेंगे जब हम सब, 
हाथ एक-दूजे का थाम  ,
तिलहन , अनाज या दालें, 
फल , सब्ज़ी ,दूध ,मसाले ,
ये सब मेरी पहचान ,
क्यों करते हो मेरा अपमान ?
मैं  भारत  की शान  ,      
कहते मुझे किसान। 

@रवीन्द्र सिंह यादव 
 
इस रचना को सस्वर सुनने के लिए मेरे You Tube  चैनल "मेरे शब्द-स्वर "(Mere Shabd -Swar ) का लिंक - https://youtu.be/342PrqwLWJw








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ख़त  मिला आपके  रुख़्सत  होने के बाद, कांधा गया सर  रखूँ  कहाँ  रोने  के  बाद। ख़्वाब पहलू से उठकर चल दिए, जागती रहेंगी तमन्नाएँ रात...