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गुरुवार, 24 अगस्त 2017

जिओ और जीने दो

खुद जिओ 

अपने जियें 

और 

काल-कवलित 

हो जायें। 




कितना नाज़ां 

और वहशी है तू 

तेरे रिश्ते 

रिश्ते हैं 

औरों के फ़ालतू 

चलो अब फिर 

समझदार 

नेक हो जायें 

अपनी ज़ात 

फ़ना होने तक 

क्यों बुड़बक हो जायें। 



क़ुदरत  की 

करिश्माई कृति = इंसान 

सृजन को 

विनाश के 

मुहाने पर 

लाने वाला =इंसान। 




महक फूलों की 

दिशा कब 

तय कर पाती 

आबोहवा 

सरहदों के

नक़्शे न पढ़ पाती 

अंडे रखने को 

तिनके 

चिड़िया 

कुछ इधर से 

कुछ उधर से लाती। 




नदी बहती है 

ख़ुद क्या ले पाती 

रौशनी सूरज की 

जग को जगमगाती 

तब हरी पत्तियां 

भोजन बनातीं 

चाँदनी में  रातें 

  खुलकर खिलखिलाती। 




ऑक्सीजन 

पेड़ देते 

कभी न हारे हैं 

इंसान तेरी 

हवस ने 

मासूम मारे हैं 

तमसभरी  राह में 

कोई लड़खड़ा गया है 

अँधेरा बहुत 

अब तो  गहरा गया है 

आओ अब एक दीपक जलायें  

सोने तक दादी से सुनें कथाऐं। 

#रवीन्द्र सिंह यादव 


शब्दों के अर्थ / Word Meaning
काल-कवलित = मृत ,मर चुका ,निष्प्राण / Dead
नाज़ां = घमंड /Proud ,Arrogant
वहशी =जंगली , सनकी ,Crazy ,Wild
फ़ालतू = अनावश्यक ,अतिरिक्त / Extra ,over
नेक = दयालु ,भला /Kind ,Noble -Natured
फ़ना = नष्ट होना ,Destruction
ज़ात = जाति ,नश्ल / Caste ,Race 

सोमवार, 21 अगस्त 2017

गुरु


डॉक्टर  को

उसके  गुरु

सिखाया  करते  थे-

"मौत से घृणा करो"

वे  आज

विश्वास के क़ातिल /

मौत के

सौदाग़र हो गए

पैसे के भारी

तलबग़ार हो गए।




नेता   को

उसके    गुरु

सिखाया करते थे-

"राजनीति का ध्येय

समाज-कल्याण है

उसूलों पर खरे उतरना "

वे आज

लाशों पर

रोटियां सेकने में

माहिर हो गए

भ्रष्टाचारी / अवसरवादी  दुनिया के 

मुसाफ़िर  हो  गए।




शिक्षक  को

उसके गुरु


सिखाया करते थे-

"चरित्र-निर्माण ही

राष्ट्र-निर्माण है"

वे  आज 

वैचारिक दरिद्रता के

क़ायल   हो  गए

अपनी ही शिक्षा के

तीरों से घायल हो गए ।




संत को 

उसके गुरु 


सिखाया करते थे -


"मोह माया से दूर रहो 


आध्यात्मिक ज्ञान से 


समाज-सुधार करो"


वे आज 


बड़े व्यापारी हो गए 


भोली जनता की 


गाढ़ी कमाई खाकर 


समाज पर 


बोझ भारी हो गए। 






कलाकार को 

उसके गुरु ने 

यह कहते हुए तराशा -

"कला का मक़सद 

सामजिक-चेतना को 

उभारना है

दरबारी कृपामंडल में 

चमकना नहीं 

रूह को वीरान 

होने देना नहीं

जितना तपोगे 

उतना निखरोगे "

वे आज 

भोगवादी विचार के  

शिकार हो 

विलासता में सिमट गये 

सरकारी ओहदे /अवार्ड / अनुदान की 

परिधि में 

कलात्मक -विद्रोह से 

महरूम हो 

सत्ता के हाथों 

लुट-पिट गये।  





नैतिक पतन के दौर में

हम अपनी ग़लतियों 

के  लिए  

प्रायश्चित नहीं करते 

न ही कभी

अपने भीतर झाँकते

परिणाम सामने हैं

दोषारोपण के और कितने

मील  के पत्थर गाढ़ने हैं ?

सामाजिक मूल्य गहरी नींद सो गए. ......!

गुरु क्यों अब अप्रासंगिक हो गए ?

#रवीन्द्र सिंह यादव

मंगलवार, 15 अगस्त 2017

इकहत्तरवां स्वाधीनता-दिवस



अँग्रेज़ी हुक़ूमत के

ग़ुलाम  थे  हम


15 
अगस्त 1947 से पूर्व


अपनी नागरिकता


"ब्रिटिश-इंडियन"


लिखते थे हम 


आज़ादी मिलने  से पूर्व।



ऋषि-मुनियों का


दिया परिष्कृत ज्ञान


शोध / तपस्या से


विकसित विज्ञान


राम-कृष्ण का


जीवन दर्शन


पतंजलि का योग-दर्शन 

कपिल का सांख्य-दर्शन 

नियत-नीति-न्याय  में


विदुर-चाणक्य का आकर्षण


बुद्ध-महावीर के अमर उपदेश


करुणा और अहिंसा के संदेश


जन-जन  तक  पहुँचा सके हम


सूत्र एकता का अटूट  बना सके हम।




अहंकार  के अस्त्र -शस्त्र


और स्वहित  की परिधि


खींचते गए  लकीरें सरहदी


बनते गए क़िले


बंटती रही झील-नदी


राष्ट्रीयता का भाव


रियासती हो गया


सूरमाओं का मक़सद


किफ़ायती हो गया


सरहदी मुल्क़ों  से


आक्रांता / लुटेरे आते-जाते रहे


कुछ बस गए


कुछ माल-दौलत ले जाते रहे


कुछ जनता के अज़ीज़ हो गए


कुछ  इश्क़  के  मरीज़ हो गए।




कारवां अनवरत 


चलते  रहे

लोग वक़्त की 


माँग में ढलते रहे

व्यथित जनमानस 


को राह दिखाने

सूर-तुलसी-कबीर-चिश्ती-रहीम  आये


प्रेम और ज्ञान का 


संदेश  लेकर

नानकरैदास -मीरा-जायसी भी छाये।





चतुर व्यापारी 

देश के 

हुक्मरान  हो गए 

हमारे जज़्बात भी 

पहरों में 

लहूलुहान हो गए 

कश्मीर की वादियों से


कन्याकुमारी में


समुंदर की लहरों तक


एक अन्तः सलिला  बही

स्वाधीनता की 


क्रांतिमय  पावन बयार

देशभर में अलख जगाती रही। 




यातना के दौर


आज़ादी के दीवानों ने सहे


अनगिनत किस्से हैं


अपने  कहे-अनकहे


उपलब्धियों पर आज 

फिर नाज़ होने लगा है 

स्वराज के  मिशन पर 

असमानता और चालाकी का

फिर  राज होने लगा है।



हिन्दू-मुस्लिम-सिख-ईसाई

मिल जाओ सब छोड़ बुराई  

हो  गए  मुक़म्मल  

आज़ादी  के  सत्तर बरस

आओ मनाएं इकहत्तरवां  

स्वाधीनता-दिवस। 

जय हिन्द ! 

रवीन्द्र सिंह यादव


सोमवार, 14 अगस्त 2017

ग़रीब की अकाल मौत



सीवर / गटर में मौत

सरकारी अस्पताल में मौत

खेत -खलिहानों में मौत

जंगलों /अरण्यों में मौत

सरहद  पर मौत

सड़क  पर  मौत।




बच्चों की मौत

बुज़ुर्गों की मौत

अजन्मों की मौत

जवानों की मौत

मरीज़ों की मौत

पर्यटकों की मौत

श्रद्धालुओं की मौत

राहगीरों की मौत

गवाहों की मौत

नेताओं  की मौत

अभिनेताओं की मौत

नाम वालों की मौत

गुमनाम की  मौत

अपनों  की मौत

परायों की मौत।




शहरों में मौत

गावों में मौत

अफ़वाहों में मौत

दंगों में मौत

पंचायती फ़रमानों में मौत

अदालती आदेशों में मौत

आतंकी हमलों में मौत

युद्धों में मौत

हादसों में मौत।





षड़यंत्र में मौत

लापरवाही में मौत

सनक में मौत

हनक में मौत

सेल्फ़ी में मौत

लालच में मौत

स्वाभाविक मौत

असमय मौत

राजनैतिक मौत

बलिदानी मौत

बे-मौत मौत

बदले में  मौत

धोखे में मौत।




पृथ्वी  पर मौत

जल  में मौत

नभ  में मौत

अंतरिक्ष में मौत

झोपड़ी में मौत

महलों में मौत

पिंजड़े में मौत

कसाईखाने  में मौत

गलियों में मौत

घरों में मौत

एकल मौत

सामूहिक मौत।





शब्द की मौत

सपनों की मौत

रिश्तों की मौत

भावों की मौत

रोक पाया कोई  मौत ?

अटल सत्य है मौत!

बस न हो संवेदना की मौत !!

कचोटती है निरीह / ग़रीब की अकाल मौत !!!

#रवीन्द्र  सिंह यादव

रविवार, 6 अगस्त 2017

मित्रता -दिवस


दोस्त ! 
आपकी ज़िन्दगी 
ख़ुशियों  से 
रहे गुलज़ार 
राहें रौशन हों  सदा 
घर-आँगन रहे बहार। 


मनहर पयाम 
लाती  रहे  पवन 
बग़िया में 
क़ाएम  रहे 
फूल और 
माली-सी लगन
सुदूर तक 
ग़मों का 
साया न हो 
साँसें हैं अपनी 
तब तक 
जुड़ें रहें तार-बेतार । 



पिछला ज़माना 
याद है हमको 
जब उलझे थे 
तूफ़ानों में 
लाये थे हम 
खे कर कश्ती 
है कशिश कितनी 
अपने अफ़्सानों में  
आते हैं याद 
पल वो बार-बार। 


दोस्ती के लिए 
बाज़ारवाद ने 
मुक़र्रर  किया 
एक दिन 
हम करते हैं 
इक़रार 
बाबरा मन 
करता है याद 
सुबह-शाम 
हर घड़ी-पलछिन 
आबाद रहें 
रिश्तों के आशियाँ 
बहती रहे 
भावों की 
कल-कल धार। 

#रवीन्द्र सिंह यादव 

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