सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

संदेश

विशिष्ट पोस्ट

ऐ हवा चल पहुँचा दे मेरी आवाज़ वहाँ

हाल की पोस्ट

मैं मज़दूर हूँ

मैं       मज़दूर      हूँ

किंतु   मज़बूर   नहीं,

राह      मिल      गई

तो  मंज़िल  दूर  नहीं ।



बांध  बनाऊँ  सड़क  बनाऊँ,

बाजारों  की  तड़क-भड़क  बनाऊँ,

जीवन की राहें औरों  की आसान  बनाऊँ,

ख़ुद  पग-पग  पर अपमान सहूँ  ग़म  खाऊँ।




हथियार  बनाऊँ  साज़  बनाऊँ,

सुई       बनाऊँ  जहाज़  बनाऊँ ,

रेल   बनाऊँ   मंच    सजाऊँ,

न       कोई   प्रपंच     रचाऊँ। 



लोग  कहते  हैं -

बादशाहों  की  पसंद  निर्मम  थी

ख़ून -पसीना बहाने  के बाद

कटवा  दिए  मेरे हाथ ,

कैसा  क़ानून  है  ....... ?

न्याय  क्यों   लगता   नहीं  मेरे  हाथ।



मुझपर   आरोप  है

आबादी  बढ़ाने  का ,

कोई  नहीं  सोचता

मेरी  मुश्किलों  की परिधि  घटाने  का।



मेरी  झोपड़ी में

आज भी दिया जलता  है,

अँधेरे  महलों  को

मेरा  रोशन  चेहरा  खलता   है।



ईश्वर  के  नाम   पर

धूर्त  ठग   लेते   हैं  मुझे ,

पीढ़ी -दर -पीढ़ी  चक्रव्यूह  रचकर

शिक्षा और  साधन  से दूर  कर देते  हैं मुझे।




आ  गयी  मशीनें

छीनने  मेरे  मुँह  का  निबाला ,

हाथ   आया  जो  रुपया

बुलाकर  झपट   लेती   मधुशाला।



दबी  हुई  है  मेरी  चीख

 उन  महलों  के    नीचे,

आवाज़  बुलंद करके  रहूँगा

नहीं   …

पूँजीवाद का शिकंजा

भिखारी  बनाने पर तुला  है  पूँजीवाद, 
सिसकियाँ   भर  रहा   है  समाजवाद। 


इतिहास के नाज़ुक  मोड़  पर 
खड़े  होकर    हम 
भूमंडलीकरण  को  कोस  रहे  हैं, 
 देख  भूखे  पेट  सोतों   को 
अपना    मन      मसोस  रहे  हैं।  


युद्धग्रस्त  देशों  में   
भूख   का   तांडव
पिघलाता  नहीं  अब  दिल  हमारा,
आक्रोश  और क्षोभ  से भरा  मन 
अब  असहाय  के  लिए  खोलता  नहीं  सहयोग  का  पिटारा।  


आच्छादित   है  मानवीय - संवेदनाओं  पर 
स्वार्थ  का  मज़बूत     आवरण,  
थाम लेता  है  बार-बार 
मूल्यों    का   होने  से  जागरण । 


बढ़ती  ग़ैर -बराबरी ,
सामाजिक - ध्रुवीकरण,

अब ,
ग़रीब -अमीर  के बीच  स्थापित   
कालजयी  खाई  को  और चौड़ा  कर रहे  हैं, 
पूँजीवाद  का  विकराल  रूप  प्रकट  हो गया  है ,
दुनिया  की आधी  संपत्ति  पर  8  धनकुबेरों  का कब्ज़ा  हो गया है ,
भारत में अब 1 % लोगों का देश की 58%  संपत्ति  पर कब्ज़ा  हो गया  है। 



आजीविका  के  लिए  हर  दिन  
संघर्ष   करने  वाला 
हाथ   मल   रहा  है ,
सरकारों  का  सत्ता  में  बने रहने   की चिंताओं का  दौर  चल  रहा  है।


सरकारें  संचालित  हैं ,

धनकुबेरों  की  मंशा  से,  
ज़ेबें   हमारी …

आयी राम की अवध में होली

आयी   राम    की

अवध   में    होली ,

छायी  कान्हा  की

बृज    में   रंगोली।



पक   गयी  सरसों

बौराये    हैं   आम,

मनचलों  को  अब

सूझी   है  ठिठोली।

छायी   कान्हा  की

बृज    में   रंगोली।



भाये       मन      को

रंग    अबीर   गुलाल ,

मस्ताने    बसंत    में

कूक  कोयल   बोली।

छायी    कान्हा    की

बृज      में     रंगोली।





मिट     गए   मलाल

मलने     से   गुलाल,                                                                                                                                         
भरी मायूस मन  की

खुशियों   ने   झोली।

छायी    कान्हा   की

बृज     में     रंगोली।













खेलो     होली    बन


राधा     नन्द    लाल ,


पिचकारी    ने    बंद


राह    अब     खोली।


छायी     कान्हा   की


बृज      में      रंगोली।




@रवीन्द्र  सिंह यादव


इस रचना  का यू  ट्यूब पर  (चैनल - MERE SHABD--SWAR) लिंक -https://youtu.be/ufs7srNvtAU

Zindagi ka safar pagdandiyon par-1.

Dheere-dheere zakhm saare ab bharne ko aa gaye.

Ye kahaan se aa gayee bahar hai.